खनन की शर-शैय्या पर टिकी अरावली की पुकार

सुरेन्द्र बांसल
अपने यहाँ यह बात युगांतरों से ज्ञात है कि समस्त जीवन प्रकृति पर ही निर्भर है। हमारे देश का जो भी श्रेष्ठ है, वह नदियों, सरोवरों, पहाड़ों, वनों के सानिध्य से ही आया है। यानी अपने यहां जो कुछ भी जीवनदायी है, वह सब पूजनीय है, और यही भारत की आत्मा का सार है - पूजा की थाली में रखी दूर्वा से लेकर नवग्रहों तक - सब वंदनीय है । इसीलिए युगों से हमारे ऋषि ( शिक्षक ) और समाजचिंतक निजी और सार्वजनिक जीवन में प्रकृति से सामंजस्य बैठाने का ही चिंतन करते आए हैं।
हमारी अधिकाँश परंपराएं, रीति-रिवाज, हमारे संस्कार, हमारा दर्शन,सामाजिक ढाँचा आदि सब कुछ प्रकृति की लय में लयबद्ध रहा है। पंच तत्व उसी लयबद्ध दर्शन की निष्पत्ति हैं । दिनचर्या से लेकर ऋतुचर्या तक, भवन-निर्माण से लेकर कृषि पद्धति तक हर व्यवस्था प्रकृति की समझ पर आधारित रही। अपने यहाँ गाँवों और नगरों का निर्माण इस प्रकार किया गया कि जल, वायु और भूमि का संतुलन बना रहे। अपने शहर-कस्बों को हमने प्रकृति से दूर नहीं होने दिया। पेड़-पौधों और वनों-उपवनों की ऐसी व्यवस्था की जाती रही कि हम जहाँ भी रह रहे हों, वहाँ प्राकृतिक वातावरण बना रहे। हमने कभी स्वयं को प्रकृति का स्वामी नहीं, उसका अभिन्न अंग माना।
लंबे समय तक भारत की अर्थव्यवस्था कुटीर उद्योगों और स्थानीय संसाधनों पर आधारित रही। इसीलिए हमने गाँव-गाँव अपने उद्योग-धंधों का विकास इसी तरह किया कि रोज़गार का सृजन भी हो और प्रकृति पर उनका कोई बोझ भी न पड़े। हमने हमेशा यही कोशिश की कि जीवन की रफ्तार प्रकृति से समरस रहे। इसके लिए छोटे-बड़े सभी उद्योगों को मनुष्य के हस्त-कौशल से जोड़े रखा। ऐसा नहीं होने दिया कि हमारे उद्योग प्राकृतिक साधनों पर बोझ बनते चले जाएँ और प्राकृतिक वातावरण को नष्ट करने लगें।
हज़ारों - हज़ार वर्ष तक प्रकृति संग तालमेल की ये मर्यादाएं अक्षुण्ण बनी रहीं। युगों-युगों हम प्रकृति के हर कण को भगवत्ता समझते रहे, लेकिन जैसे-जैसे तथाकथित विकास की अवधारणा हावी होती गई, संतुलन टूटता चला गया। आज हमारी और हमारे नीति नियंताओं की समझ उथली हो चली है। हम सब ग़ैर ज़रूरी और कथित विकास के रोगी बन चुके हैं। हम संसार के स्थूल रूप में सूक्ष्म देखना भूल चुके हैं। दृश्य के पीछे अदृश्य देखने की आदत हमारी नहीं बची और प्रकृति से कटे इस ज्ञान के आधार पर प्रकृति के इस विराट वैभव से हमारा कोई वास्तविक संबंध नहीं बन पा रहा। हमारी उपभोगवादी दृष्टि मात्र इतना ही सोच पा रही है कि ये नदी, पहाड़, पशु, परिंदे, जल, जंगल हमारे किसी काम आ सकते हैं या नहीं ? हम इन्हें डकार सकते हैं या नहीं ?
जैसे-जैसे विज्ञान और अर्थशास्त्र ने प्रकृति के शोषण के नए-नए द्वार खोले तो हम प्रकृतिसम्मत व्यवस्थाओं को भूल अंधाधुंध प्रकृति के शोषण में जुट गए। मज़े की बात यह है कि संसार के तमाम अर्थशास्त्रीय सिद्धांत प्राकृतिक संसाधनों की लूट पर ही आधारित हैं और इनका सहारा लेकर दुनियाभर के नीति निर्धारक पुरखों द्वारा सहेजे तमाम प्राकृतिक संसाधनों की अंधाधुंध लूट की नीतियां बनाने में जुट गए। विकास के इस ग़ैर ज़रूरी मॉडल ने दुनिया के लगभग देशों में प्राकृतिक संतुलन नष्ट कर दिया, समाज उजाड़े, संस्कृतियां तहस-नहस कीं और सभ्यताओं में उथल-पुथल कर डाली। आज हमारा अरावली पर्वत भी उन्हीं षड्यंत्रों के समक्ष आन खड़ा है।
काका साहब कालेलकर ने कभी अरावली को 'पहाड़ों का पितामह' कहा था। वे अरावली की अद्भुत व्याख्या करते हुए कहते हैं,'' लोगों को आश्चर्य होता है, जब हम कहते हैं कि पहाड़ों की जमात में सबसे युवा है हिमालय। दुनिया में यह कितना ही ऊँचा क्यों न हो, उसकी उम्र कुछ ही लाख वर्षों की है। विंध्य और पारियात्र जैसे बुड्ढों के सामने वह कल का बच्चा ही है। भारत के कुल पर्वतों की सूची में उसे स्थान तक नहीं है- महेन्दरो (उत्कल), मलयः(केरल) सह्यः (कोंकण), शुक्तिमान्, ऋक्षपर्वतः (सौराष्ट्र), विन्ध्यश्च (मध्य भारत), पारियात्रश्च (राजस्थान) सप्तैते कुलःपर्वताः।
यह प्राचीन पारियात्र ही आज का अरावली पर्वत है। लाखों वर्ष की गरमी और बारिश के कारण और केवल काल बल से यह प्राचीन पहाड़ छिन्न-भिन्न हो गया है। अब उसके अवशेष ही पाए जाते हैं। राजस्थान में यह पहाड़ नैऋत्य दिशा से चलता हुआ ईशान्य दिशा में करीब दिल्ली तक पहुँचता है। गुजरात के किनारे अर्बुद् या आबू का पहाड़ उसका एक सिरा है तो दिल्ली के पास की छोटी-छोटी पहाड़ियां, जिन्हें अंग्रेजों ने द रिज (The Ridge) नाम दिया और हमारी भोली जनता ने जिसका धीरज रूप बना दिया, वह दूसरा सिरा। आबू के पहाड़ का सबसे ऊँचा शिखर गुरुशिखर पाँच हजार फुट से भी अधिक ऊँचा है और द रिज की ऊँचाई पचास फुट की भी नहीं होगी!
वैसे इस पर्वत श्रृंखला का असली नाम आडावली है। सिंधु को लांघकर मध्य प्रदेश की ओर जाते यह पहाड़ और इसकी अनेक शाखाएं आड़ी आती हैं, इसलिए इसका आडावली नाम पड़ा। लेकिन कुछ लोग कहते हैं कि चर्मकार लोग चमड़े को काटने के लिए जिस आर या आरी का उपयोग करते हैं इस पहाड़ का आकार उस जैसा है, इसलिए आरावली या अरवल्ली नाम पड़ा ।
जो हो, यह प्राचीनतम पहाड़ ग़ैर ज़रूरी विकास की शत्रु सेना के आक्रमण को तो रोक नहीं सकता, और पश्चिम की ओर से आने वाली रेत की बाढ़ को भी पूरी तरह से रोक नहीं पाता। इसका दक्षिण का सिरा, जिसे आबू या अबुर्द कहते हैं वह जरूर पश्चिमी समुद्र से आने वाले बादलों को रोककर उनसे बारिश का भार अब भी सह लेता है। आडावली के पहाड़ बड़े हों या छोटे, वनस्पति-सृष्टि को आज भी प्रश्रय देते हैं और उन जंगलों की छाँव में नाना प्रकार के वन्य पशुओं को भी जीवन मिलता है। यहाँ कई पहाड़ी वन्य जातियाँ भी उसके आश्रय से कृतार्थ होकर लोकगीतों में अपनी कृतज्ञता व्यक्त करती हैं।
अरावली की कोख कई सलिलाओं की भी जन्मस्थली है। केन, बेतवा, धसान, सिंध, पार्वती, काली सिंधु, बनास और सबसे अधिक पुरानी और अधिक महत्त्व की चर्मण्वती ये सब नदियां, एक ओर अरावली और दूसरी ओर विंध्य पर्वतमाला के समकोण में जन्म लेकर अपना जीवनकार्य सफल करती है और इन सब नदियों का करभार एकत्र करने का काम यमुना ईमानदारी से करती है। कोटा, टोंक और सांभर ये सब प्रदेश इन्हीं नदियों की कृपा से उपजाऊ होते हैं। लावण्यवती लूनी, सुक्री और बनास आदि नदियां भी अरावली की ही लड़कियां हैं, लेकिन वे अपना पानी पश्चिम की ओर ले जाती हैं। साबरमती और मही, ये दो गुजरात की नदियां अपनी अनेक सखियों की मदद से आबू के पहाड़ का दक्षिणी पानी इकट्ठा करके स्तम्भतीर्थ-खम्भात की ओर ले जाती हैं।
लेकिन बरसों से अरावली की ख़ामोश छाती खौफ़नाक क्रशर मशीनों के शोर से कांप रही है। अरावली पृथ्वी की उस पहली करवट का नाम है, जिसने इंसान के पैदा होने से भी करोड़ों साल पहले अपनी रीढ़ सीधी करके आसमान को छूना सीखा था। इतिहास गवाह है कि अरावली ने डायनासोरों की धमक भी सुनी, प्रतापी राजपूतों का शौर्य और आक्रांताओं की क्रूरता से बचने के लिए क्षत्राणियों के जौहर और सभ्यताओं का बनना-बिगड़ना भी देखा होगा।
अरावली को अब 'पर्वत' भी नहीं कह सकते, क्योंकि पर्वत तो अचल होते हैं, लेकिन अरावली का तो पल-पल पिघल और मिट रहा है। अरावली ने सदियों तक रेगिस्तान को अपनी दहलीज़ लांघने नहीं दिया। जब पश्चिम से थार का रेगिस्तान अपनी गर्म, रेतीली आंधी लेकर इस ओर बढ़ता है, तो अरावली एक जिद्दी पहरेदार की तरह सीना तानकर खड़ी हो जाती है। लेकिन शिक्षित समाज की कृतघ्नता देखिए, जिस दीवार ने उसे सदियों रेतीले अंधड़ों से बचाया, उसी दीवार की ईंटें नोच-नोचकर अपने लिए वातानुकूलित कब्रें बना लीं। दिन- रात कोटा - स्टोन निकालने और लगाने वाले नहीं जानते कि दिल्ली और गुरुग्राम की साँसों का 'वेंटिलेटर' अरावली ही है ।
आज अरावली के सीने पर अवैध खनन से हुए गहरे गड्ढे आसमान और नीति निर्धारकों की ओर देखकर पूछ रहे हैं कि "मेरा कसूर क्या है ?" आख़िर आप लोगों ने मेरे जंगल, तालाब तो छीने ही, हज़ारों क़िस्म के जीव-जंतु क्यों बेघर कर दिए, मेरे झरनों को सुखाकर उन पर 'फार्म हाउस' और 'हाई-राइज़ सोसाइटी' के बोर्ड क्यों लगा दिए ? आख़िर क्यों सभी को मेरा सीना खोद कोटा स्टोन ही चाहिए? ऊपर से यह प्रपंच भी क्यों, कि घर के कोने-कोने में कोटा स्टोन लगाने की हसरत रखने वाला भी ' सेव अरावली ' के नारे लगा रहा है? अरावली पूछ रही है कि आख़िर वो विकास नामक कौन सी रतौंधी है, जिसके चलते तुमने मेरे पत्थरों को पीसकर कंक्रीट बनाया और अब उसी कंक्रीट के जंगलों में बैठकर तुम 'शुद्ध हवा' न मिलने की शिकायत करते हो ? यह कैसी विडंबना है कि मेरी छाती को छलनी करके जो धूल तुमने उड़ाई है, वही धूल अब तुम्हारे फेफड़ों में जम रही है। और तुम अपनी ही साँसों का सौदा करके अपनी बैंक की पासबुक ख़ाली कर रहे हो।
आज अरावली कराह रही है। आर्त स्वर में पुकार रही है - मैं थक चुकी हूँ। मेरी गोद में खेलने वाली सदानीरा नदियाँ अब नाला बन चुकी हैं। बादलों को आसमान से नीचे खींच लाने वाले मेरे पहाड़ अब सपाट मैदान बन चुके हैं और वहाँ सिर्फ गाड़ियों का शोर ही शोर है। शायद तुम भूल रहे हो कि प्रकृति जब अपना क़र्ज़ वसूलने पर आएगी, तो तुम्हारे पास कोई प्रार्थना और दुआ तक नहीं बचेगी ? और हाँ जिस दिन मैं मिट गई, उस दिन तुम्हारे बेतरतीब शहरों के पास पानी तो क्या, गज़ भर छाया भी नहीं बचेगी। तुम रेगिस्तान को नहीं रोक पाओगे, क्योंकि उसे रोकने की कूव्वत मुझमें ही है और तुम मेरी कूव्वत को दिन-रात मिटाने पर आमादा हो! तुम आज मेरे सीने पर टिकी पहाड़ियों को डायनामाइट लगाकर उड़ा रहे हो, पर उन्हें तुम वापस नहीं उगा सकोगे।
कभी-कभी काका साहब कालेलकर और अनुपम मिश्र जैसे ' जागते रहो की अलख जगाने वाले मेरे कुछ अच्छे सपूत तुम लोगों को यह कह कर समझाने आते हैं कि, '' हे मेरे भारत के लोगो! नदी, पहाड़, पर्वत श्रेणी और उसके उत्तुंग शिखरों से तथा इन सबसे ऊपर चमकने वाले तारों से परिचय बढ़ाकर हमें भारत-भक्ति में अपने पूर्वजों के साथ होड़ चलानी चाहिए। हमारे पूर्वजों की साधना के कारण गंगा के समान नदियां, अरावली, विंध्य और हिमालय के समान पहाड़, जगह-जगह फैले हुए हमारे धर्म क्षेत्र, पीपल या बड़ के समान महावृक्ष, तुलसी के समान पौधे, गाय जैसे ममत्व भरे जीव, गरुड़ या मोर जैसे पक्षी, गोपीचंदन या गेरू जैसी मिट्टी, आयुष्मान के आशीर्वाद को सार्थक करने वालीं करोड़ों जड़ी-बूटियों के प्रकार- सब जिस देश में भक्ति और आदर के विषय हों, उस देश में संस्कारों और भावनाओं की समृद्धि को बढ़ाना हमारे ज़माने का कर्तव्य है। हम अपने प्रिय-पूज्य देश की प्रकृति को समृद्ध करके और प्रकृति के सामंजस्य से कुटीर उद्योगों द्वारा और दूसरे अनेक रचनात्मक कामों से सजाएंगे और नई पीढ़ी को भारत-भक्ति की दीक्षा देंगे”, क्योंकि “देश का मतलब केवल ज़मीन और उसके ऊपर का आकाश ही नहीं है, बल्कि देश में बसे हुए मनुष्यों के संगी- साथी पहाड़,जंगल, नदियाँ, तालाब और पशु-पक्षी,जैसे हमारे स्वजन भी हैं। उन्हें हमें जिस तरह जानना चाहिए, उसी तरह हमारी देशभक्ति में केवल मानव-प्रेम ही नहीं, बल्कि हमारे समस्त स्वजनों का प्रेम भी शामिल होना चाहिए। ''
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