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दुखी ही दुखी से दुआ माँगता है।

दुखी ही दुखी से दुआ माँगता है।

डॉ. मेधाव्रत शर्मा, डी•लिट•
(पूर्व यू.प्रोफेसर)
दुखी ही दुखी से दुआ माँगता है।
गसफ़ ही गसफ़ से ज़िया माँगता है।
दहलीज़ पे मुंतजिर रूहे जन्नत,
तबायफ़ से जोबन फ़ता माँगता है।
तिरसूल डमरू दिखा के फुसूँगर,
नाबीनेअक़्लों से क्या माँगता है।
राहे चुलिस्ताँ में तिश्ना मुसाफिर,
खुदा से नहीं कुछ,कज़ा माँगता है।
अमृत बना के जो पीता जहर को,
नहीं वो किसी से दुआ माँगता है।
इंसानियत का नमूना हक़ीक़ी,
मुहब्बत का जग में फिज़ा माँगता है।
सियासत हुई मुज़्रिमों का तमाशा,
मिराक़ी जो उनसे वफ़ा माँगता है।
( ज़िया =प्रकाश ।चुलिस्ताँ =वह जंगल जहाँ न पेड़ हो,न पानी। फ़ता =जवाँमर्द।मिराक़ी =पागल। )
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