शकुनि का सौगंध
जय प्रकाश कुवंर
महाभारत के पात्रों में शकुनि एक अत्यंत महत्वपूर्ण नाम है। तो आइये जानते हैं कि आखिर ये शकुनि कौन थे और उनका सौगंध क्या और क्यों लिया गया था। सबसे पहले हम जानते हैं कि सौगंध क्या होता है, और किस परिस्थिति में कोई सौगंध लेता है।
सौगंध का मतलब कोई शपथ, कसम अथवा प्रतिज्ञा होता है, जो किसी खास काम को पूरा करने के लिए लिया जाता है। सौगंध की अवधि तब तक कायम रहती है जब तक वह काम पूरा न हो जाये या फिर सौगंध लेने वाला व्यक्ति स्वयं खत्म न हो जाये या फिर किसी कारणवश उस सौगंध को वह खुद ही निरस्त न कर दे।
शकुनि का सौगंध मुख्यरूप से कौरव वंश के विनाश के लिए शकुनि की प्रतिज्ञा थी जिसे शकुनि ने अपने परिवार का अपमान और परिवार की मृत्यु का बदला लेने के लिए लिया था। वह कुटिल बुद्धि और जुआ खेलने में माहिर था। शकुनि महाभारत युद्ध के प्रमुख कारणों में से एक अहम साबित हुए।
शकुनि गांधार देश के राजा सुबल के बेटे थे। शकुनि के अलावा राजा सुबल को एक बेटी भी थी जिसका नाम गांधारी था। गांधारी परम शिव भक्त थी। वह पतिनिष्ठा के लिए भी जानी जाती थी।
इधर भीष्म पितामह ने कौरव वंश को चलाने के लिए धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर, इन तीनों के विवाह का जिम्मा ले रखा था। धृतराष्ट्र जन्म से ही द्रृष्टिहीन थे लेकिन सर्वाधिक बलवान थे। भीष्म को ज्ञात हुआ कि गांधार नरेश की पुत्री गांधारी अत्यंत सुंदर और सभी गुणों से परिपूर्ण है। वह धृतराष्ट्र के लिए एक सर्वाधिक उपयुक्त पत्नी साबित होगी।
यह जानकारी होने के बाद भीष्म ने गांधार नरेश सुबल के पास गांधारी का विवाह धृतराष्ट्र से करने के लिए संदेश भेजा। गांधारी को धृतराष्ट्र के दृष्टिहीन होने की बात नहीं बताई गई। लेकिन जब यह बात शकुनि को ज्ञात हुआ तब वह नहीं चाहता था कि उसके बहन की शादी एक दृष्टिहीन से हो। भीष्म के प्रस्ताव को उसने अपने पिता, अपना और अपने परिवार का अपमान समझा। लेकिन राजा सुबल ने धृतराष्ट्र के बारे में सब जानते हुए भी शादी के इस प्रस्ताव को कुछ कारणों से स्वीकार कर लिया। शादी के लिए जब गांधारी को यह बात मालूम हुई कि उसका पति दृष्टिहीन है, तो गांधारी ने अपने माता पिता का लाज रखने के लिए उस दृष्टिहीन धृतराष्ट्र से शादी कर ली। अपने दृष्टिहीन पति के प्रति सम्मान और उनकी शारीरिक स्थिति से समानता दिखाने के लिए गांधारी ने भी अपने आंखों पर पट्टी बाँध ली।
धृतराष्ट्र और गांधारी के शादी के बारे में एक बात जो गांधार नरेश द्वारा भीष्म पितामह से छुपायी गयी वह यह थी कि इस शादी के समय गांधारी एक विधवा थी। इससे पहले उसका एक और विवाह हो चुका था और उसके पहले पति की बलि दी जा चुकी थी। जब गांधारी का जन्म हुआ था तब ज्योतिषियों ने बताया था कि उसके पहले विवाह पर संकट है। ऐसे में उसका विवाह सोच समझकर करना होगा। इस परिस्थिति में गांधारी का विवाह गांधार नरेश ने एक बकरे के साथ कर दिया और बाद में उस बकरे की बलि दे दी गई। यह बात राजा सुबल ने भीष्म को नहीं बताई जिस समय भीष्म पितामह के तरफ़ से धृतराष्ट्र के शादी का प्रस्ताव आया था।
बाद में यह बात खुलने पर भीष्म और धृतराष्ट्र ने इसे धोखा मान लिया और गांधारी के पिता सुबल और भाई शकुनि सहित पूरे परिवार को उन्होंने कारावास में डाल दिया , जहाँ केवल शकुनि को छोड़ सभी मारे गए।
इस प्रकार गांधारी विवाह और अपने पिता सहित पूरे परिवार के नष्ट हो जाने के बाद शकुनि अपना सौगंध तथा प्रतिशोध पूरा करने के लिए अपनी बहन गांधारी के साथ धृतराष्ट्र की राजधानी हस्तिनापुर में ही रहने लगे। अपनी कुटिल नीति से कौरवों और पांडवों में फुट डाली, दुश्मनी बढ़ाई और अंततोगत्वा उनके बीच महाभारत युद्ध हुआ। दुर्योधन को उकसाने और गलत निर्णय लेने में शकुनि का हाथ सबसे बड़ा था।
कौरव वंश का नाश करने के लिए उसने धृतराष्ट्र के बड़े पुत्र दुर्योधन को मोहरा बनाया। कौरव और पांडवों में ईर्ष्या और दुश्मनी बढ़ाई। उसने पांडवों को खत्म करने के लिए लाक्षागृह के निर्माण की योजना तैयार करवाया।
चौसर खेलने के लिए पांडवों को उकसाया और चौसर खेल में छल कपट कर के उन्हें हराकर वनवास भिजवाया।
हालांकि शकुनि की बहन गांधारी और धृतराष्ट्र के शादी से गांधारी को दुर्योधन सहित सौ पुत्र और एक पुत्री दु:शला हुई, लेकिन महाभारत युद्ध के उपरांत उनका कोई भी पुत्र तथा पुत्री का वर जयद्रथ भी जीवित नहीं रह गया और शकुनि के सौगंध के अनुसार कौरव वंश का नाश हो गया।
शकुनि जैसा जाना जाता है, एक कुटिल बुद्धि इंसान था। वह जुआ एवं चौसर खेलने की कला में निपुण था। शकुनि के जुआ के पासे उसके पिता सुबल की हड्डियों से बने थे और उनमें मायावी शक्ति थी। वे पासे शकुनि के इच्छा के अनुसार परिणाम देते थे। यही कारण था जिसके चलते जुआ में पांडवों को द्रौपदी सहित सब कुछ दुर्योधन के हाथों हारना पड़ा था,क्योंकि दुर्योधन के लिए पासा फेंकने वाला शकुनि था।
महाभारत युद्ध में कौरव वंश के नाश होने का शकुनि का सौगंध तो पूरा हो ही गया था, इसके साथ ही पाण्डु पुत्र सहदेव के हाथों शकुनि का भी अंत हो गया था।
जय प्रकाश कुवंर
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