बराबर की कंदराओं में इतिहास और अध्यात्म की गूँज
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भूमिका: स्मृतियों का प्रस्थान इतिहास केवल खंडहरों में नहीं, बल्कि उन पत्थरों की चमक में भी जीवित रहता है जिन्हें सहस्राब्दियों पहले तराशा गया था। 18 जनवरी 2026, रविवार की वह अलसायी सुबह एक ऐतिहासिक यात्रा की साक्षी बनी। जहानाबाद की व्यस्त गलियों से जब हमारी बस 'बराबर पर्वत समूह' की ओर मुड़ी, तो मन में प्राचीन मागधीय विरासत को छूने की तीव्र उत्कंठा थी। इस यात्रा में मेरे साथ आशु कवि चितरंजन चैनपुरिया जी की काव्यमय उपस्थिति और क्षेत्र के प्रबुद्ध जनों का साथ था, जो इस सफर को मात्र एक भ्रमण से बढ़ाकर एक 'सांस्कृतिक अन्वेषण' बना रहा था।
पातालगंगा: स्वाद और संवाद का संगम - जहानाबाद से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी तय कर हमारा कारवां बराबर के प्रवेश द्वार, 'पातालगंगा' पहुँचा। रास्ते में गाय घाट और हथियबोर की पहाड़ियां मानो हमारा स्वागत कर रही थीं। यहाँ स्थित 'लाम्बा होटल' में जब हमने चाय की चुस्की के साथ गरमा-गरम पोहा और जलेबी का स्वाद लिया, तो माहौल में एक अनौपचारिक गोष्ठी जैसा आनंद घुल गया। मेरे साथ ' आंसू कवि चितरंजन चैनपुरा , पटना की लेखिका आशा रघुदेव , अप्पू आर्ट्स' के निदेशक अजय कुमार विश्वकर्मा, वरिष्ठ पत्रकार अनिल कुमार गुप्ता, सुरीले संगीतकार बलिराम 'परिंदा' और धराउत के इतिहास मर्मज्ञ प्रोफेसर साहब मौजूद थे। चाय की मेज पर ही बराबर की गुहा लेखन संस्कृति और मौर्यकालीन भित्तिचित्रों पर चर्चा शुरू हो गई। सबका एक ही मत था—बराबर की गुफाएं विश्व की सबसे पुरानी 'रॉक-कट' संरचनाएं होने के बावजूद आज भी अपने भीतर कई रहस्य समेटे हुए हैं।
नागार्जुन पहाड़ी: जहाँ पत्थर गाते हैं - यात्रा का पहला चरण नागार्जुन पहाड़ी की गुफाओं को समर्पित था। यहाँ हमने गोपी गुफा के विशाल गर्भगृह में प्रवेश किया। सम्राट अशोक के पौत्र राजा दशरथ द्वारा आजीवकों को दान में दी गई यह गुफा स्थापत्य का शिखर है। इसकी दीवारों पर की गई मौर्यकालीन 'मिरर पॉलिश' आज भी इतनी जीवंत है कि मशाल की रोशनी में पत्थर चांदी की तरह चमक उठते हैं। यहीं हमने ब्राह्मी लिपि में उत्कीर्ण उन शिलालेखों का बारीकी से अध्ययन किया, जो मगध के शासन और धर्मनिरपेक्षता की कहानी कहते हैं। खगोलशास्त्री नागार्जुन द्वारा स्थापित सूर्य और चंद्र की पाषाण आकृतियां यह सिद्ध करती हैं कि यह क्षेत्र प्राचीन काल में केवल साधना का ही नहीं, बल्कि विज्ञान और खगोल गणना का भी बड़ा केंद्र रहा होगा। गोपी गुफा की नीरवता में कुछ समय बौद्ध भिक्षुओं के साथ मौन ध्यान लगाकर जो शांति प्राप्त हुई, वह शब्दों से परे है। इसके बाद हमने वह्यक गुफा और योगिया गुफा का भी भ्रमण किया, जो अपनी सादगी और सूक्ष्म बनावट से सम्मोहित करती हैं। गोपी गुफा में बौद्ध भिक्षुओं एवं मैं साथ रहकर शांति एवं आनंद की अनुभूति प्राप्त की ।
सतघरवा: वास्तुकला का अमर काव्य - दोपहर की सुनहरी धूप में हम बराबर की मुख्य पहाड़ियों पर पहुँचे, जहाँ पटना की प्रसिद्ध लेखिका आशा रघुदेव की टीम भी हमारे साथ जुड़ गई। यहाँ की चार गुफाओं—लोमस ऋषि, सुदामा, कर्ण चौपड़ और विश्वामित्र—को सामूहिक रूप से 'सतघरवा' कहा जाता है।
लोमस ऋषि गुफा: इसके प्रवेश द्वार पर बनी हाथियों की नक्काशी देखकर मन सिहर उठता है। ईसा पूर्व तीसरी सदी में बिना किसी आधुनिक उपकरण के ग्रेनाइट जैसे कठोर पत्थर पर इतनी बारीक कलाकारी करना किसी चमत्कार से कम नहीं है। सुदामा गुफा: इसके भीतर की गूँज अद्भुत है। यहाँ किया गया एक छोटा सा शब्दोच्चार अनंत काल तक गूँजता प्रतीत होता है। कर्ण चौपड़ और विश्वामित्र: ये गुफाएं अपनी ज्यामितीय सटीकता के लिए जानी जाती हैं। यहाँ की दीवारों पर उकेरे गए भित्तिचित्र और मूर्तियाँ समय की मार झेलने के बाद भी अपनी गरिमा बनाए हुए हैं। बाबा सिद्धेश्वर नाथ: आस्था का उत्तुंग शिखर - गुफाओं के कलात्मक संसार से निकलकर हम पर्वत श्रृंखलाओं के सबसे ऊँचे बिंदु पर स्थित बाबा सिद्धेश्वर नाथ मंदिर की ओर बढ़े। चढ़ाई थोड़ी कठिन थी, लेकिन ऊपर पहुँचते ही जो विहंगम दृश्य दिखा, उसने सारी थकान हर ली। पर्वत की चोटियों से नीचे की हरियाली और दूर तक फैली मगध की भूमि किसी मानचित्र जैसी दिख रही थी। बाबा सिद्धेश्वर के दर्शन कर हमने उस प्राचीन परंपरा को महसूस किया, जहाँ कला और अध्यात्म एक साथ फलते-फूलते थे। यहाँ का पर्यावरण और पर्वत श्रृंखलाओं की बनावट किसी भी प्रकृति प्रेमी को आत्मविभोर करने के लिए पर्याप्त है।
एक अधूरा स्वप्न और संरक्षण की पुकार - शाम के 6 बज रहे थे। डूबते सूरज की लालिमा बराबर की गुफाओं पर एक रहस्यमयी ओज बिखेर रही थी। वापसी के समय मन में एक मिश्रित भाव था—अपनी महान विरासत पर गर्व और उनके संरक्षण के प्रति एक चिंता। यह स्थल न केवल पर्यटन केंद्र है, बल्कि यह हमारी गुहा लेखन संस्कृति और मूर्तिकला की वह कड़ी है, जो हमें हमारे पूर्वजों की मेधा से जोड़ती है। पटना की लेखिका आशा रघुदेव केवम साहित्यकारों की टीम , अजय कुमार विश्वकर्मा की कलात्मक दृष्टि, अनिल गुप्ता की पत्रकारिता और बलिराम 'परिंदा' , चितरंजन चैनपुरा की कविता की संगीतमय संवेदनशीलता के साथ यह यात्रा एक 'सांस्कृतिक संकल्प' में बदल गई। जहानाबाद लौटते समय हमारे पास न केवल तस्वीरें थीं, बल्कि बराबर की उन गूँजती कंदराओं की स्मृतियाँ भी थीं, जो हमें बार-बार पुकार रही थीं। बराबर की यात्रा महज एक पिकनिक नहीं है; यह समय की यात्रा है। यदि आप अपनी जड़ों को महसूस करना चाहते हैं और पत्थरों में छिपे संगीत को सुनना चाहते हैं, तो बराबर की ये गुफाएं आपका इंतज़ार कर रही हैं। यह मगध का वह मुकुट है, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ती।
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