वंदे मातरम पर बवाल क्यों ?
अध्याय ८
स्वाधीनता आंदोलन अंग्रेज और वंदे मातरम
डॉ राकेश कुमार आर्य
' वंदे मातरम ' संप्रदाय ने तेजी से आगे बढ़ना आरंभ किया। इस संप्रदाय की स्थापना होने का अभिप्राय था कि लोगों के भीतर ' वंदे मातरम ' के प्रति इतनी गहरी श्रद्धा उत्पन्न हो गई थी कि वे उसके नाम पर एक संप्रदाय ही बनाने का निर्णय कर बैठे । मानवीय स्वभाव की यदि थोड़ा सी भी समीक्षा की जाए तो पता चलता है कि किसी भी मनुष्य के लिए एक संप्रदाय को छोड़ना या दूसरे को अपनाना बड़ा महत्वपूर्ण निर्णय होता है। हर किसी के लिए यह संभव नहीं है कि वह किसी भी छोटी सी बात पर अपने संप्रदाय को छोड़ दे या किसी नए संप्रदाय को स्थापित कर ले। नए संप्रदाय का स्थापित होना भी बहुत महत्वपूर्ण घटना होती है। इसका अभिप्राय है कि समाज को एक ऐसे संप्रदाय की आवश्यकता है जो युग धर्म के अनुरूप हो। उस समय देश को स्वाधीनता की कशिश थी , उस कशिश की पूर्ति के लिए लोगों ने " वंदे मातरम संप्रदाय " स्थापित किया, जिसने यह स्पष्ट कर दिया कि अब हम सब कुछ छोड़कर देश की स्वाधीनता के लिए अर्थात स्वराज्य की स्थापना के लिए संकल्पित हो चुके हैं।
ब्रिटिश सरकार इस बात को भली प्रकार जानती थी कि भारत के लोग जब किसी लक्ष्य के प्रति संकल्पित होकर उठ खड़े होते हैं तो इसके पश्चात वे लक्ष्य प्राप्ति के लिए मर मिटने का निर्णय ले लेते हैं। यदि भारत के लोगों ने इस समय ' वंदे मातरम ' को अपना संप्रदाय बना लिया है तो इसका अभिप्राय है कि उन्होंने इसको धर्म की भांति स्वीकार कर लिया है अर्थात ' वंदे मातरम ' अब उनका धर्म हो गया है। लोगों की उस समय की भावनाओं का यदि अनुमान लगाया जाए तो पता चलता है कि शब्द न केवल ब्रह्म होता है बल्कि शब्द धर्म भी बन जाता है। शब्द धर्म तभी बनता है जब उसके बारे में एक सामूहिक भावना यह बन जाती है कि अब इसे त्यागा नहीं जा सकता। उस समय के युग धर्म के प्रतीक बने वंदे मातरम का अभिप्राय था - देश को पूर्ण स्वाधीनता दिलवाना। वंदे मातरम का अभिप्राय था - स्वराज्य की प्राप्ति करना। वंदे मातरम का अभिप्राय था - अंग्रेजों को अपनी मातृभूमि से खदेड़कर बाहर खड़े कर देना और जिसका अभिप्राय था - सनातन के सर्वोच्च मानवीय मूल्यों की पुनर्स्थापना करना।
हिंदुओं के निशस्त्रीकरण की प्रक्रिया
अंग्रेज यह भली प्रकार जानते थे कि भारत के लोग कितने धार्मिक होते हैं ? जब वे किसी संकल्प को अपने धर्म के साथ जोड़ देते हैं तो उसके पश्चात वे कुछ नहीं देखते, जो भी उनके सामने आता है वे उसका सफाया करते चले जाते हैं।
मुगलों ने भारत के सनातन हिंदू समाज का नि:शस्त्रीकरण करके देख लिया, परंतु हिंदू इसके उपरांत भी अपनी स्वाधीनता की लड़ाई उनसे लड़ता रहा। उनके पश्चात् अंग्रेजों ने भी हिंदुओं के नि:शस्त्रीकरण को जारी रखा अर्थात हिंदू कोई शस्त्र धारण नहीं करेगा- यह नियम मुगलों ने भी बनाया और उसके पश्चात अंग्रेजों ने भी बनाया। इसके उपरांत भी सनातन समाज के सम्मान के लिए हिंदुओं ने १८५७ की क्रांति सहित अनेक क्रांतियों का सूत्रपात किया। सनातनी हिंदुओं की यह वास्तविकता अंग्रेजों से छुपी नहीं थी। अब जब उन्होंने देखा कि भारत का हिंदू समाज ' वंदे मातरम ' के प्रति पूर्णतया समर्पित हो चुका है तो उनको यह आभास हो गया था कि कभी भी एक ऐसा भयंकर विस्फोट हो सकता है जिसमें ब्रिटिश साम्राज्य के परखचे उड़ जाएंगे। यही कारण था कि उन्होंने ' वंदे मातरम ' के गाने पर प्रतिबंध लगाया।
वंदे ' मातरम संप्रदाय ' की स्थापना होने से ' वंदे मातरम ' की लोकप्रियता तेजी से बढ़ रही थी। लोग बहुत शीघ्रता से इस नए संप्रदाय की सदस्यता ले रहे थे। तब अंग्रेजों ने भारत के लोगों की ' वंदे मातरम ' के प्रति बढ़ती हुई ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को रोकने के लिए वंदे मातरम और भारतीय धर्म तथा परंपराओं को लेकर दुष्प्रचार करना आरंभ किया और कई प्रकार के भ्रम फैलाने लगे।
अंग्रेजों का दुष्प्रचार
भारत के लोगों के भीतर राष्ट्रवाद की सनातन परंपरा रही है। परंतु अंग्रेजों ने इस प्रकार का दुष्प्रचार करना आरंभ किया कि राष्ट्रवाद की विचारधारा और मातृभूमि के प्रति समर्पण का भाव हिंदू समाज के विचारों के विपरीत है। वास्तविकता यह है कि यदि मातृभूमि के प्रति प्रेम और राष्ट्रवाद के प्रति लगाव का यह क्रम आरंभ हुआ है तो भारत में यह पश्चिम से आया है।
जब हम आधुनिक भारत में राष्ट्रवाद अथवा राष्ट्र जागरण या पुनर्जागरण के बारे में विचार करते हैं तो हमें अक्सर यही पढ़ाया जाता है कि यूरोपियन देशों में जिस प्रकार उस समय राष्ट्रवाद की लहर चल रही थी, उसका प्रभाव भारत पर भी पड़ा और यहां के लोग राष्ट्र और मातृभूमि के प्रति समर्पित होते हुए देखे जाने लगे। जबकि सच्चाई यह है कि भारत प्राचीन काल से मातृभूमि और राष्ट्रवाद के प्रति समर्पित रहा है।
अंग्रेजों ने कहा कि बंकिम चंद्र चटर्जी ने राष्ट्रवाद की विचारधारा को यूरोपियन संस्कृति से ग्रहण किया है। इस प्रकार भारत के लोगों को अपनी मौलिक चेतना के प्रति समर्पित न होकर यूरोपियन संस्कृति के प्रति समर्पित होना चाहिए, जिसने उन्हें सोचने - समझने का अवसर उपलब्ध कराया है। इस प्रकार ' वंदे मातरम ' के विचार को भी अंग्रेजों ने भारत के लिए विदेशी और विशेष रूप से यूरोपियन विचार कहकर प्रचारित करने का प्रयास किया। उनका विचार था कि इस प्रकार की बातों को सुनकर भारत का शिक्षित वर्ग अंग्रेजों का साथ देगा और अपने लोगों के विरोध में आकर खड़ा हो जाएगा। जिससे भारत के लोगों के भीतर के आक्रोश को शांत करने में उन्हें सहायता मिलेगी।
ऐसा कहकर अंग्रेज ये भूल गए थे कि जिस काल में वे इस प्रकार का दुष्प्रचार कर रहे थे, वह काल स्वामी दयानंद के विचारों से प्रभावित काल था। माना जा सकता है कि सारा भारत आर्य समाजी नहीं बना था, परंतु इतना सत्य है कि लोगों ने अपना सत्य समझ लिया था अर्थात वे इतना तो समझ गए थे कि हम सभी आर्य हैं, आर्यों की संतानें हैं, हमारे देश का नाम आर्यावर्त है और आर्य भाषा हमारी भाषा रही है। इस प्रकार सारा भारत स्वामी दयानंद जी महाराज के स्वराज्य संबंधी चिंतन से प्रभावित हो चुका था। कांग्रेस के गरम दल के नेता और क्रांतिकारी आंदोलन के सभी क्रांतिकारी स्वामी दयानंद जी महाराज के राष्ट्रवाद की लहर को तेजी से फैला रहे थे। जिसे रोकना अब किसी के लिए संभव नहीं था। अतः अंग्रेज ' वंदे मातरम ' को लेकर चाहे जो कुछ कर रहे थे, या जो भी निर्णय ले रहे थे, वह सब उनके लिए उल्टा पड़ रहा था। ' वंदे मातरम ' अंग्रेजों के लिए एक भूचाल था, जिसे वह रोक नहीं पा रहे थे।
ईसाई मिशनरी भी आ गईं मैदान में
यह स्वत: सिद्ध है कि अंग्रेज भारत में एक शासक के रूप में काम नहीं कर रहे थे , उनके चिंतन में डकैती का स्वभाव था। डकैती डालने के नाम पर ही वह भारत आए थे और डकैती मारते हुए ही वह भारत पर शासन कर रहे थे । उनका लोकतंत्र डकैतों का, डकैतों के लिए, डकैतों के द्वारा चलाया जाने वाला लोकतंत्र था। इससे पहले इसी प्रकार की नीतियों का अनुकरण मुगलों और तुर्कों के द्वारा किया गया था। जब हम भारत में तुर्कों , मुगलों या अंग्रेजों के शासनकाल को पढ़ें तो उसके बारे में हमें यही धारणा बनानी चाहिए कि यह काल डकैतों का डकैतों के द्वारा डकैतों के लिए स्थापित किया गया लोकतंत्र का काल ( जो कि कभी कोई नहीं सकता ) था।
ये लोग अपने शासन को चिरस्थाई बनाए रखने के लिए अनेक प्रकार के प्रयत्न कर रहे थे। कई प्रकार के कानून लेकर आए। जिससे भारत के लोगों पर अत्याचार करने का अवसर इनको मिले और भारत के लोगों को अपने शासन के अधीन रखने में ये सफल हो सकें। मूल रूप से डकैत होने के उपरांत भी अंग्रेज भारत के लोगों को ही डकैत घोषित करने का प्रयास करते थे। हमारे क्रांतिकारियों ने जब अपने ही खजाने को काकोरी कांड के माध्यम से अंग्रेजों से लूटा तो उन्हें उन लोगों ने लुटेरा अथवा डकैत घोषित किया। जबकि सच यह था कि लुटेरे अंग्रेज थे, जो हमारे खजाने को लूट लूटकर अपने देश ले जा रहे थे।
ईसाई मिशनरी हमारे देश में दूसरे प्रकार की डकैती डाल रही थीं। भारत के लोगों का तेजी से धर्मांतरण कर उनकी चेतना का विदेशीकरण करने पर लगी हुई थीं। उनकी डकैती राजनीतिक डकैती से भी भयंकर थी। जब उन्होंने देखा कि उनके राजनीतिक नेतृत्व के विरुद्ध ' वंदे मातरम ' भारत के लोगों के लिए अति सराहनीय कार्य कर रहा है तो उनकी भी रात की नींद और दिन का चैन गायब हो गया। इसलिए उन्होंने अपने राजनीतिक नेतृत्व के बचाव के लिए मैदान में उतरने का निर्णय लिया।
ईसाई मिशनरियों ने अपने भारतीय अनुयायियों के माध्यम से भारत के क्रांतिकारी आंदोलन को नष्ट करने का कार्य तो पहले से ही जारी रखा हुआ था, अब उन्होंने ' वंदे मातरम ' के विरुद्ध भी कमर कस ली। यही कारण था कि ईसाई मिशनरियों ने ' वंदे मातरम ' को राजनीतिक डकैतों का गीत कहना आरंभ किया। जब ईसाई मिशनरी ' वंदे मातरम ' को लेकर इस प्रकार का दुष्प्रचार कर रही थीं, तब वे यह भूल गई थीं कि ' राजनीतिक डकैती ' किसे कहते हैं ? जिन अंग्रेजों को वे अपना राजनीतिक मार्गदर्शक मानती थीं, वास्तव में सबसे बड़े ' राजनीतिक डकैत ' तो वही थे।
ईसाई मिशनरियों ने ' वंदे मातरम ' के प्रति धुआंधार दुष्प्रचार करना आरंभ किया। यद्यपि उनके इस प्रकार के धुआंधार दुष्प्रचार का लोगों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और वे अपने स्वाधीनता के लिए ' वंदे मातरम ' के ध्वज के नीचे और भी अधिक मजबूती के साथ काम करते रहे।
पुलिस के अत्याचार
१४ अप्रैल १९०६ के दिन अंग्रेजों ने बरिशाल में कांग्रेस के जुलुस में ' वन्दे मातरम' का नारा लगाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। इतना ही नहीं , अंग्रेजों ने पुलिस को अधिकार दे दिए कि इस कार्यक्रम में सम्मिलित होने वाले भारतीयों पर वह कठोरता का प्रदर्शन करे। फलस्वरुप पुलिस ने अपनी अत्याचार पूर्ण शैली का प्रदर्शन किया और जिन लोगों ने कांग्रेस के इस कार्यक्रम में सम्मिलित होने का प्रयास किया उनके विरुद्ध पुलिस ने निर्दयतापूर्वक लाठी चार्ज करने में किसी प्रकार का संकोच नहीं किया। इसके उपरांत भी लोगों का उत्साह देखते ही बनता था। उन पर पुलिस के किसी भी प्रकार के अत्याचार का कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। ' वंदे मातरम' ने उनके भीतर जिस प्रकार के उत्साह का संचार किया था, उससे उनकी ऊर्जा और भी कई गुणा बढ़ गई थी।
पुलिस समझ नहीं पा रही थी कि लोगों के भीतर इतनी ऊर्जा कहां से आ गई थी कि वे पुलिस के किसी भी अत्याचार की चिन्ता बिना ' वंदे मातरम' बोलते हुए निरंतर आगे बढ़ रहे थे। लोगों ने ' वंदे मातरम' बोलना छोड़ा नहीं बल्कि और भी अधिक उत्साह के साथ ' वंदे मातरम' बोलते रहे और इस गीत को भी गाते रहे। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस अधिवेशनों में ही इस गीत का उत्साहवर्धक आनंद लोग उठा रहे थे, उससे अलग भी विभिन्न जलसे - जुलूसों में लोग ' वंदे मातरम ' गीत गा रहे थे और जय घोष कर रहे थे।
लाला लाजपत राय का जर्नल ' वंदेमातरम '
लाला लाजपत राय जी ' वंदेमातरम' से बहुत अधिक प्रभावित हुए थे। उन्होंने तो अपने एक समाचार पत्र का नाम ही 'वंदे मातरम' रख दिया था। लालाजी उस समय देश के लोगों के लिए बहुत अधिक सम्मानित नेता के रूप में स्थापित हो चुके थे। उनकी बातों को लोग बड़े ध्यान से सुनते थे और बड़े ध्यान से ही पढ़ते भी थे। ऐसे में उनके द्वारा अपने किसी समाचार पत्र का नाम ' वंदे मातरम' रखना बहुत महत्वपूर्ण था। ' वंदे मातरम' के माध्यम से उन्होंने लोगों को एक संदेश दिया कि यदि मेरी ओर से आपके पास कोई जर्नल आ रहा है तो समझिए आपके पास इस जर्नल के रूप में " वंदे मातरम " आ रहा है। ' वंदे मातरम ' एक जर्नल नहीं है , इसके विपरीत वह स्वाधीनता का एक संदेश है। क्रांति का एक संदेश है। हम सब की एकता और राष्ट्रीय सोच का संदेश है। लोगों ने लाला जी के " वंदे मातरम " के अभिप्राय को गहराई से समझा। इसका दूसरा संदेश यह था कि जब अंग्रेज ' वंदे मातरम' के जय घोष पर रोक लगा रहे थे या लोगों को ' वंदेमातरम ' गीत को गाने से रोक रहे थे, तब लाला जी ने अंग्रेजों को यह संदेश दिया कि वह ' वंदे मातरम' को नहीं रोक सकते। साथ ही हम सब भारतीयों के भीतर अपने उन पूर्वजों का रक्त प्रवाहित हो रहा है जो अब से पूर्व के अनेक अत्याचारी मुस्लिम सुल्तानों, बादशाहों के समक्ष नहीं झुके थे तो आपके सामने भी हम अपने ' वंदे मातरम' को निरंतर गाते रहेंगे और न केवल गाते रहेंगे अपितु ' वंदे मातरम' को छापते भी रहेंगे।
लालाजी द्वारा प्रकाशित किए गए इस जर्नल से बड़े उत्तेजक लेख निरंतर प्रकाशित होते रहे । लोगों तक ऐसी क्रांतिकारी सामग्री पहुंचती रही जो उनके भीतर देशभक्ति के भावों का संचार करती थी। इस प्रकार लाला जी के जर्नल ने यथानाम तथागुण को सार्थक किया। इस प्रकार लालाजी का वंदे मातरम ' क्रांति दूत ' बनकर लोगों के पास जाता रहा और उन्हें अपने देश धर्म के लिए मर मिटने की शिक्षा देता रहा। जितना ही ' वंदे मातरम' अपने संदेश को देने में सफल होता जा रहा था, उतना ही यह अंग्रेजों के लिए कष्टकारक बनता जा रहा था। उन्हें न तो ' वंदे मातरम ' जर्नल अच्छा लगता था और न ही ' वंदे मातरम ' गीत अच्छा लगता था।
( लेखक सुप्रसिद्ध डॉ राकेश कुमार आर्य इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews #Divya Rashmi News, #दिव्य रश्मि न्यूज़ https://www.facebook.com/divyarashmimag


0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com