कहानी मोहब्बत की
मुनासिफ हो अगर तुमकोतो मिलने तुम आ जाना।
मैं वर्षो से वही पर हूँ
जहाँ हम तुम मिलते थे।
यकीन न हो तो पूछ लो
बाग के फूल पत्ती पेड़ों से।
बात देंगे वो मेरा हाल
कि तुम बिन मैं कैसा हूँ।।
इरादा नेक अगर हो तो
जमाने वालों से क्या डरना।
मोहब्बत की खातिर ही तो
हमारा दिल सदा खिलता है।
समझना अब तुमको है
कि आगे मिलना जुलना है।
या लोगों के डर से अब
मोहब्बत बंद करना है।।
जो दिल की छोड़कर तुम
अगर जमाने की सुनोगी।
तो पूरे जीवन भर तुम
मोहब्बत को तरसोगी।
इसलिए मेरी जनम
तुम्हें ही करना है फैसला।
कि आगे हम मोहब्बत को
अपनी परवान चढ़ाये।।
जवानी के जोश में दोनों
गलत फैसला मत करना।
अपनी मोहब्बत की खातिर
दिलों में प्यार सदा रखना।
जिसे ही तुम्हारी मोहब्बत
दिलों में जिंदा रहेगी।
और मोहब्बत की एक नई
कहानी लिखी जायेगी।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन " बीना" मुंबई
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