मौसम में खो गया
संजय जैनमौसम का अंदाज देखो
बहुत रंग ला रहा है।
वायू मंडल में घटाओं को
जो बिखेर रहा है।
पेड़ पौधे फूल पत्ती आदि
देखो लहरा रहे है।
जो मंद मंद हवाओं से
खुशबू को बिखर रहे है।।
नजारा देख ये जन्नत का
किसी की याद दिला रहा।
नदी तालाब बाग बगीचा भी
अपनी भूमिका निभा रहा।
ऐसा लग रहा है जैसे
मेहबूबा को स्वर्ग दिखा रहे।
और मोहब्बत के बारे में
बैठे-बैठे सोचे जा रहे है।।
वर्तमान में भूत की बातें
बैठकर सोच रहा हूँ।
सपनों और कल्पनाओं के
सागर में बहा रहा हूँ।
खुदको हसीन वादियों में
सोचते हुए घूमा रहा हूँ।
मेहबूब को मोहब्बत की
याद दिला रहा हूँ।
और भविष्य में खो गया हूँ।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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