बदल नहीं सकती कभी,बिना प्रकृति तकदीर
जयराम जयप्रकृति हमारी जान है,प्रकृति हमारी शान।
बिना प्रकृति के बोलिये,खुलती कहाँ दुकान।।
छेड़-छाड़ मत कीजिये,करें नहीं मज़बूर।
वरना कर देगी प्रकृति,जीवन से ही दूर।।
अब तक सबने प्रकृति की ,खूब उधेडी़ खाल।
जब टेढी़ आँखें हुई , लगे बजानें गाल।।
कुदरत के सँग कीजिये,मत इतना खिलवाड़।
मज़बूरी में वह तुम्हें ,छोडे़ करना लाड़।।
कभी चढा़ पारा अधिक, कभी शीत से युद्ध।
अति वरषा,सूखा पडे़, हुई प्रकृति जब क्रुद्ध।।
जब से हम करने लगे, यहाँ प्रकृति को नष्ट।
सुविधा भोगी भी हुये, सभी आचरण भृष्ट।।
छत , दीवारें फर्स सब, हैं पत्थर के गेह।
पत्थर संग पत्थर हुये, कहाँ बचा है नेह।।
खुश कितना बतलाइये, प्रकृति विरोधी लोग।
घर-घर बीमारी बसी ,क्या केवल संयोग ।।
प्रकृति पराजित कब हुई,लगे रहे सब खूब।
ऊसर बंजर में मिले ,कैसे खिलती दूब ।।
शिकन माथ की कह रही,हुये प्रकृति से दूर।
पहन मुखौटा जी रहे, हँसने को मज़बूर।।
हवा,धरा,जल,आग सँग,रहता सहज अकाश।
इन तत्वों के बिना कब, होता कहाँ विकास।।
प्रकृति बदल लें स्वयं की, करें प्रकृति से प्यार।
प्रकृति बराबर कौन है , तेरा - मेरा यार।।
चलो प्रकृति के सँग सभी, चलें मिलाकर चाल।
संभव कब जीवन हुआ, बिना प्रकृति की ढाल।।
हाथ जोड़ करके खडे़, राजा रंक फकीर।
बदल नहीं सकती कभी, बिना प्रकृति तकदीर।।
पढें प्रकृति को मन लगा, उसके रहें करीब।
मिले सफलता आपको , होंगे नहीं गरीब।।
◆
~जयराम जय
पर्णिका बी 11/1 कृष्ण विहार आवास विकास
कल्याणपुर कानपुर-208017(उ.प्र.)
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