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"कविता का आत्मजनन"

"कविता का आत्मजनन"

पंकज शर्मा
कविताएँ
किसी बुलावे की प्रतीक्षा नहीं करतीं,
वे तो समय की
दरारों से फूटती हैं—
अनकहे अनुभवों की तरह।


उनका जन्म
कलम की इच्छा से नहीं,
संवेदना की अनिवार्यता से होता है,
जहाँ मौन
सबसे सशक्त भाषा बन जाती है।


कभी वे
काग़ज़ की श्वेत देह पर
धीरे-धीरे साँस लेती हैं,
तो कभी
हृदय के अँधेरे कोनों में
बिना नाम के ठहर जाती हैं।


कविता
लिखी नहीं जाती,
वह घटित होती है—
जैसे स्मृति में
अचानक लौट आए
भूले हुए रंग।


लेखक तो
सिर्फ एक माध्यम है,
जिससे होकर
जीवन
अपने अर्थ को
स्वयं लिखता है।


कई कविताएँ
अक्षरों तक पहुँचती ही नहीं,
वे दृष्टि में
नमी बनकर
और स्वर में
अधूरी थरथराहट बनकर
रह जाती हैं।


हर क्षण
किसी न किसी कविता का
आकार गढ़ा जा रहा है,
भले ही
उसे पढ़ने वाला
कोई न हो।


और इसीलिए
कविता का होना
किसी की उपस्थिति पर निर्भर नहीं—
वह तो
चुपचाप
अपने अस्तित्व को
लिखती रहती है।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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