जोड़ी बहुत निराली है।
डा• मेधाव्रत शर्मा, डी.लिट.(पूर्व यू.प्रोफेसर)
जोड़ी बहुत निराली है।
राहु-केतु खुटचाली है।
दाढ़ी तिलक देख रिंदों की,
जड़ जनता मतवाली है।
असली ध्वज है एक तिरंगा,
भगवा झंडा जाली है ।
भेंड़ बनी है जनता जबतक,
गीदड़ यह बलशाली है।
महफिल है यह मवालियों की,
ताली थाली गाली है ।
साहब की जुबान,मत कहिए-
क़ल्बेअव्वा-वाली है।
जल्लादों की बज़्मे सियासत,
हालाहल की नाली है।
जागो!जागो!!हिटलरशाही
तारी होने वाली है।
राहु-केतु खुटचाली है।
दाढ़ी तिलक देख रिंदों की,
जड़ जनता मतवाली है।
असली ध्वज है एक तिरंगा,
भगवा झंडा जाली है ।
भेंड़ बनी है जनता जबतक,
गीदड़ यह बलशाली है।
महफिल है यह मवालियों की,
ताली थाली गाली है ।
साहब की जुबान,मत कहिए-
क़ल्बेअव्वा-वाली है।
जल्लादों की बज़्मे सियासत,
हालाहल की नाली है।
जागो!जागो!!हिटलरशाही
तारी होने वाली है।
(रिंद =शराबी और लंपट। क़ल्बेअव्वा =खूब भौंकनेवाला कुत्ता। )
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