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श्रीमद्भगवद्गीता,परम आनंद की निर्झरणी

श्रीमद्भगवद्गीता,परम आनंद की निर्झरणी 

कुमार महेंद्र
अद्भुत अनुपम ग्रंथ मनोरमा,
उरस्थ कृष्ण अर्जुन उपदेश ।
परिवर्तन प्रकृति शाश्वत नियम,
कर्तव्य निर्वहन धर्म सर्वेश ।
कर्म महत्ता सदृश आराधना,
आत्मा अजर अमर पथ विचरणी ।
श्रीमद्भगवद्गीता,परम आनंद की निर्झरणी ।।

क्रोध संग सदा बुद्धि विनाश,
मोह लालच दुःख कारण ।
आत्मविश्वास सदा परम मित्र,
लक्ष्य हित दृढ़ संकल्प धारण ।
सत्संग उत्संग सद्गुण उदय,
सकारात्मक सोच समाधान सरणी ।
श्रीमद्भगवद्गीता,परम आनंद की निर्झरणी ।।

आंतरिक आनंद सच्चा सुख,
हर प्राणी हृदय वासित भगवान ।
तज मन बुद्धि पर अति विश्वास,
पावन दांपत्य सौभाग्य आह्वान ।
सहर्ष सत्य बिंदु स्वीकार्यता,
अथक श्रम नित्य ध्येय धरणी।
श्रीमद्भगवद्गीता,परम आनंद की निर्झरणी ।।

दूरी परस्पर भेद विभेद नीति,
सजग तत्पर मानवता उत्थान ।
दुर्व्यसन परिणाम हानिकारक,
गलतियां सीख गुरु समान ।
शब्द अर्थ भाव नैतिकता पुंज,
सद्ज्ञान संस्कार सफलता वरणी ।
श्रीमद्भगवद्गीता,परम आनंद की निर्झरणी ।।

कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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