"अतीत का अंधकार"
जब स्मृतियों के शैलशिखर
वर्तमान के पंखों को जकड़ लेते हैं,
तब समय का प्रवाह
मानो जर्जर नाव-सा
अंधे कुहासे में दिशाहीन बह पड़ता है।
जो बीत चुका—
विस्मृति का ध्वंसावशेष होते हुए भी
भावी की दीवारों पर
एक अशुभ प्रतीक बन उभर आता है।
आस्थाओं की गीली भूमि पर
बरसाती कीटों-से
अनगिनत पीड़ाएँ सिर उठाती हैं,
और
मृत प्रतीत घाव
फिर से रिसने लगते हैं।
कितना कठिन हो जाता है जीवन!
जब संबल के सारे उपकरण
जंग लगे अस्त्रों-से
निष्प्रभ और बोझिल पड़ जाते हैं।
आकांक्षाएँ,
जो कभी शिखरारोहण का स्वप्न थीं,
अब केवल खंडहर की
जर्जर सीढ़ियाँ रह गई हैं।
भविष्य—
अपनी उजली खिड़कियाँ बंद कर
अंधकार से भर उठता है,
क्योंकि अतीत
अपनी ठंडी, निष्ठुर छाया
उस पर फैला देता है।
और मनुष्य—
सिर्फ वर्तमान का कैदी नहीं,
बल्कि
अपने ही इतिहास का
सशक्त, किंतु निर्दय कारावासी बन जाता है।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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