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"नसीहत"

"नसीहत"

प्राचीन समय की बात है। विजयनगर में प्रताप नारायण नामक एक वृद्ध रहता था। रामनारायण नाम का उसका एक पुत्र था। वृद्ध के जीवन का अन्त समय जब निकट आया तो उसने अपने पुत्र को पास बुलाकर कहा," बेटा जीवन में तीन बातें हमेशा याद रखना। पहली बात यह कि अपने दलान या दरवाजे पर बैर का पेड़ मत लगाना। दूसरी बात यह कि कोई भी राज की बात अपनी स्त्री से कभी मत कहना और तीसरी बात यह कि चौकीदार से कभी भी मित्रता मत करना। इतना कहने के साथ ही वृद्ध का मृत्यु हो गयी।


पिता के श्राद्ध-कर्म से निबटने के बाद वह पिता द्वारा बताए गए तीनों बातों पर विचार करने लगा। वह पिता द्वारा बताए गए बातों की सत्यता को परखना चाहता था। सबसे पहले उसने दरवाजे पर बैर का पेड़ लगा दिया। रामनारायण अच्छे चरित्र वाला नहीं था इसलिए अक्सर उसे कोर्ट-कचहरी का चक्कर लगाना पड़‌ता था।
एक बार की बात है। रामनारायण के किसी मुकदमे का अंतिम फैसला होने वाला था। वह घर से ज्यों ही कोर्ट जाने के लिए निकला त्यों ही उसकी टोपी बैर के काँटों में उलझ गयी। किसी तरह वह कोर्ट पहुँचा। कोर्ट में फैसला उसके विरुद्ध हो गया। पिता के द्वारा कहे गए पहले बात की सत्यता की जाँच हो गयी थी। घर लौटकर उसने बैर का पेड़ कटवा दिया।


दूसरी बात की सत्यता की जाँच के लिए उसने अपने एक पड़ोसी को सहमत कर लिया। उसने पड़ोसी को अपने दलान की कोठरी में बन्द कर दिया। इस बात की जानकारी किसी अन्य को नहीं थी। गाँववालों एवं परिजनों के काफी खोजने के बाद भी उसका कहीं पता नहीं चला। एक रात रामनारायण ने खून से सना अपना तौलिया पत्नी को साफ करने के लिए दिया और कहा कि पड़ोसी का खून मैंने किया है। यह बात तुम किसी और को मत बताना। पत्नी ने पति को भरोसा दिलाया कि यह बात वह किसी ने नहीं कहेगी।


करीब एक सप्ताह बीत जाने के बाद उसकी पत्नी के पास गाँव की एक औरत आई। इधर-उधर की बातों के दौरान ही उसकी पत्नी ने उस औरत को यह बात बता दी कि उसके पति ने ही पड़ोसी का खून किया है। उसने उस औरत को यह कसम दिलवायी कि इस बात की चर्चा वह किसी दूसरी औरत से नहीं करेगी। लेकिन उस औरत ने यह बात दूसरी महिला से कही और उसे भी किसी से न कहने की कसम दिलवायी। इस तरह धीरे-धीरे यह बात तीसरे से चौथे और चौथे से पाँचवे औरत के कानों से होती हुई पूरे गाँव में फैल गयी। बात पहुँचते-पहुँचते थाने तक पहुँच गयी।


थानेदार ने गाँव के चौकीदार को आदेश दिया कि रामनारायण को पकड़कर थाने ले आओ। चौकीदार रामनारायण का परम मित्र था। मित्रता की परवाह किए बिना वह रामनारायण के घर पहुंचा। रामनारायण को रस्सियों से बाँधकर थाने ले जाने लगा तो उसने अपनी मित्रता की दुहाई देते हुए सख्ती नहीं करने की प्रार्थना की। चौकीदार ने उसकी एक न सुनी और घसीटता हुआ उसे थाना ले आया । थानेदार ने अपने रौबदार लहजे में उससे पूछताछ की तो उसने अपने अपराध को स्वीकार कर लिया। थानेदार उसे जेल भेजने की तैयारी करने लगा। रामनारायण ने थानेदार को एकांत में बुलाकर रिश्वत की पेशकश की और घर ले चलने को कहा। पैसे की बात सुनकर थानेदार लालच में आ गया और उसे लेकर उसके घर पहुँचा।


घर पहुंचकर वह दलान में गया। दलान की कोठरी में बन्द पड़ोसी को निकालकर वह बाहर ले आया । पड़ोसी को जिन्दा देख सभी चौंक पड़े। थानेदार ने रामनारायण से पूछा कि तुमने यह नाटक क्यों किया। इसके जबाव में रामनारायण ने कहा," हुजूर , " मेरी गलती को माफ कर दीजिए। मैं अपने पिता की सीख की सत्यता की जाँच कर रहा था। उन्होंने मरते समय कहा था कि जीवन में तीन बातें हमेशा याद रखना ।पहली यह कि दलान पर बैर का पेड़ मत लगाना, दूसरी यह कि कोई राज की बात अपनी स्त्री से कभी मत कहना और तीसरी यह कि चौकीदार से कभी मित्रता मत करना । इन्हीं बातों की जाँच के क्रम में मुझसे यह गलती हुई। उसकी बातों को सुनकर थानेदार वापस चला गया।


इस कहानी के माध्यम से हमें बहुत बड़ी सीख मिलती है। बड़े-बुजुर्गों द्वारा दी गयी नसीहतों को हमें जीवन में अपनाना चाहिए। उनकी बातों की अवहेलना करने पर हमें कभी-कभी बड़ी मुसीबतों का सामना करना पड़ता है।




➡️ सुरेन्द्र कुमार रंजन

(स्वरचित एवं अप्रकाशित लघुकथा)
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