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चातुर्मास महात्म्य (अध्याय - 05)

चातुर्मास महात्म्य (अध्याय - 05)

आनंद हठिला पादरली (मुंबई)

इस अध्याय में पढ़िये👉 (पैजवन शूद्र और महर्षि गालव का संवाद तथा शालग्राम शिला के पूजन का महत्त्व)

ब्रह्माजी कहते हैं-महामते! प्राचीन त्रेता युग में पैजवन नाम से प्रसिद्ध एक शूद्र था, जो धर्म में तत्पर और विष्णु तथा ब्राह्मणों का पूजक था। वह न्यायपूर्वक धन का उपार्जन करता और सदा शान्त भाव से रहता था। सभी लोग उससे प्रेम करते थे। वह सत्यवादी और विवेकशील था। उसकी स्त्री समान कुल में उत्पन्न, धर्म पूर्वक विवाहित तथा शुभ आचरणवाली पतिव्रता थी। वह भी सदा देवताओं और ब्राह्मणों के हित में तत्पर रहती थी। महात्मा पैजवन को पूर्व पुण्य के प्रभाव से धन की प्राप्ति हुई थी। वह सदा स्वजनों के द्वारा स्वदेश और परदेश में व्यापार किया करता था। अपने और दूसरे के धन से भी वह व्यापार करता-कराता था। इस प्रकार धर्म पर दृष्टि रखने वाले उस पैजवन को नाना प्रकार का प्रचुर धन प्राप्त हुआ। उसके दो पुत्र हुए। वे दोनों ही पिता की सेवा-शुश्रुषा में लगे रहने वाले थे। धन आदि का अहंकार तो उन्हें छू तक नहीं गया था। वे अपने धर्मयुक्त आचरण से शोभा पाते थे और पिता-माता की सेवा के अतिरिक्त दूसरी किसी वस्तु का आदर नहीं करते थे। उनकी स्त्रियाँ भी अपने सास-श्वशुर की सेवा में अनिवार्य-रूप से लगी रहती थीं पैजवन का घर धनु धान्य से भरा रहता था। वह स्वयं भी सदा धर्मपरायण हो देवताओं और अतिथियों के पूजन में तत्पर रहता था। उसके घर पर आया हुआ कोई भी अतिथि विमुख नहीं लौटता था। वह शीतकाल में धन और उष्णकाल में अन्न एवं जल का दान करता था। वर्षाकाल में वस्त्र तथा अन्न बाँटा करता था। भगवान् शिव और विष्णु के व्रत में स्थित होकर उचित समय में वह बावली, कूप, तड़ाग, प्याऊ तथा देवमन्दिर बनवाता था। चातुर्मास्य में वह विशेषरूप से भगवान् विष्णु के भजन में लगा रहता था।

एक दिन ब्रह्मज्ञान परायण शान्त तपस्वी परम जितेन्द्रिय गालव मुनि पैजवन शुद्र के घर में आये। वह अभ्युत्थान और आसन आदि उपचारों से मुनि की पूजा करके मधुर वाणी में बोला - 'आज मेरा जन्म सफल हो गया, जीवन अति उत्तम हो गया, आज मेरा धर्माचरण भी सार्थक हुआ। मुने ! आपने यहाँ पधार कर कुल सहित मुझे उन्नत कर दिया। आपकी दृष्टि से मेरे सहस्त्रों पाप जलकर भस्म हो गये, मुझ गृहस्थ के सम्पूर्ण गृह को आज आपने पवित्र कर दिया।

उस शुद्र की भक्ति से गालव मुनि बहुत प्रसन्न हुए। उनकी सारी थकावट दूर हो गयी। वे हाथ जोड़कर खड़े हुए शूद्र से बोले- 'सौम्य! तुम कुशल से तो हो न? तुम्हारा मन धर्म में लगता है न, क्योंकि भाई-बन्धु, स्त्री -पुत्र आदि सब लोग सदा स्वार्थ से ही सम्बन्ध रखते हैं। तुम गोविन्द में सदा भक्ति रखते हो न? दान में तो तुम्हारी रुचि है न? क्या धर्म, अर्थ और काम सम्बन्धी कार्यों में तुम्हारा मन उत्साह के साथ संलग्न होता है ? भगवान् विष्णु का चरणोदक प्रतिदिन सिर पर धारण करते हो न? भगवान् विष्णु का भजन, श्रीविष्णु की कथा, श्रीविष्णु का स्तोत्र, श्रीविष्णु का नमस्कार, श्रीविष्णु का ध्यान और भगवान् विष्णु का पूजन, यह सब भगवान् के शयनकाल (चातुर्मास्य) में किया जाय तो मोक्ष देने वाला होता है।'

ऐसा कहते हुए मुनि को प्रणाम करके शूद्र ने फिर कहा-मुने! आपकी कृपा दृष्टि से ही मुझे इस आश्रम का पूरा-पूरा फल मिल गया। तथापि मैं आपकी उपदेश युक्त वाणी सुनना चाहता हूँ। आपके आगमन का क्या प्रयोजन है, यह कृपा करके बतावें?

तब गालवजी ने उस धर्मात्मा एवं सत्यवादी शूद्र से कहा-इधर तीर्थ यात्रा में लगे हुए मुझे कई मास व्यतीत हो गये, अब चातुर्मास्य आ गया है अत: अपने आश्रम को जाऊँगा। भगवान् नारायण की प्रसन्नता के लिये आषाढ़ शुक्ला एकादशी को अपने घर पर चातुर्मास्य का नियम ग्रहण करूँगा।

पैजवन बोला-द्विजश्रेष्ठ! मेरे ऊपर अनुग्रह करके कोई ज्ञान की बात मुझे भी बताइये। वेद में मेरा अधिकार नहीं है। वेद सार के जप का भी मुझे अधिकार नहीं है। अत: विशेषत: चातुर्मास्य में पालन करने योग्य यदि कोई मोक्ष साधक उपाय हो तो उसे बताइये।

गालवजी ने कहा-जो मनुष्य शालग्राम में स्थित भगवान् विष्णु का पूजन करते हैं, भक्ति उनसे दूर नहीं है। जिसका मन भगवान् शालग्राम के चिन्तन में लगा हुआ है, उसके द्वारा जो कुछ भी शुभ कर्म किया जाता है, वह अक्षय होता है। चातुमर्मास्य में इसका विशेष माहात्म्य है। जहाँ शालग्राम-शिला और द्वारका की शिला दोनों का संगम हो, वहाँ मनुष्य के लिये मुक्ति दुर्लभ नहीं है। जिस भूमि में सैकड़ों पापों से युक्त मनुष्यों द्वारा भी शालग्राम की शिला पूजी जाती है, वहाँ यह शिला पाँच कोस तक के प्रदेश को पवित्र करती है। यह शालग्राम शिला तेजोमय पिण्ड है, साक्षात् ब्रह्मस्वरूप है। इसके दर्शन मात्र से भी तत्काल सब पापों का नाश हो जाता है। महाशृद्र ! शालग्राम शिला की उपस्थिति से सब तीर्थ और देवमन्दिर पवित्र हो जाते हैं तथा समस्त नदियाँ तीर्थत्व को प्राप्त होती हैं। शालग्राम शिला की सन्निधि मात्र से सर्वत्र सम्पूर्ण क्रियाएँ शोभन होती हैं। जिसके घर में शुभ शालग्राम शिला का कोमल तुलसीदलों द्वारा पूजन होता है, वहाँ यमराज अपना मुँह नहीं दिखाते। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा सच्छूद्रों को भी शालग्राम शिला के पूजन का अधिकार है।

सच्छूद्र ने पूछा-ब्रह्मन् ! आप वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ हैं। सुना जाता है कि स्त्री और शुद्र आदि के लिये शालग्राम शिला के पूजन का निषेध है। अत: मेरे जैसा मनुष्य किस प्रकार शालग्राम का पूजन करे?

गालवजी ने कहा-मानद ! शृद्रों में केवल असत् शृद्र के लिये शालग्राम शिला का निषेध है। स्त्रियों में भी पतिव्रता स्त्रियों के लिये उसका निषेध नहीं किया गया है। जो शालग्राम शिला के ऊपर चढ़ायी हुई माला अपने मस्तक पर धारण करते हैं, उनके सहस्रों पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। जो शालग्राम शिला के आगे दीपदान करते हैं, उनका कभी यमपुर में निवास नहीं होता। जो शालग्राम में व्याप्त भगवान् विष्णु की मनोहर पुष्पो द्वारा पूजा करते तथा जो भगवान् विष्णु के शयनकाल (चातुर्मास्य) में शालग्राम शिला को पंचामृत से स्नान कराते हैं, वे मनुष्य संसार बन्धन में कभी नहीं पड़ते। मुक्ति के आदि कारण निर्मल शालग्राम गत श्रीहरि को अपने हृदय में स्थापित करके जो प्रतिदिन भक्ति पूर्वक उनका चिन्तन करता है, वह मोक्ष का भागी होता है। जो सब समय में, विशेषत: चातुर्मास्य काल में, भगवान् शालग्राम के ऊपर तुलसी दल की माला चढ़ाता है, वह सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। तुलसी देवी भगवान् विष्णु को सदा प्रिय हैं। शालग्राम महाविष्णु के स्वरूप हैं और तुलसी देवी साक्षात् लक्ष्मी हैं। इसलिये चन्दन-चर्चित सुगन्धित जल से तुलसीमंजरी सहित शालग्राम शिलारूप श्रीहरि को नहला कर जो तुलसी की मंजरियों से उनका पूजन करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओं को पाता है। उत्तम पुष्पों से पूजित भगवान् शालग्राम का दर्शन करके मनुष्य सब पापों से शुद्ध चित्त होकर श्रीहरि में तन्मयता को प्राप्त होता है। शालग्राम-शिला के चौबीस भेद हैं, उनका वर्णन सुनो। पहले केशव हैं, उनकी पूजा करनी चाहिये। दूसरे मधुसूदन, तीसरे संकर्षण, चौथे दामोदर, पाँचवें वासुदेव, छठें प्रद्युम्न, सातवें विष्णु, आठवें माधव, नवें अनन्तमूर्ति, दसवें पुरुषोत्तम, ग्यारहवें अधोक्षज, बारहवें जनार्दन, तेरहवें गोविन्द, चौदहवें त्रिविक्रम, पंद्रहवें श्रीधर, सोलहवें हृषीकेश, सत्रहवें नृसिंह, अठारहवें विश्वयोनि, उन्नीसवें वामन, बीसवें नारायण, इक्कीसवें पुण्डरीकाक्ष, बाईसवें उपेन्द्र, तेईसवें हरि और चौबीसवें श्रीकृष्ण कहे गये हैं। ये चौबीस मूर्तियाँ चौबीस एकादशियों से सम्बन्ध रखती हैं। साल भर में चौबीस एकादशियाँ और ये चौबीस मूर्तियाँ पूजी जाती हैं। इनकी नित्य पूजा करने वाला मनुष्य भक्तिमान् होता है। जो मनुष्य भक्ति पूर्वक इस प्रसंग को सुनता और पढ़ता है, उसके ऊपर भृतसृष्टि की रक्षा करने वाले भगवान् श्रीहरि प्रसन्न होते हैं।

संदर्भ:👉 श्रीस्कन्द महापुराण
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