सत्य इतिहास:रामेश्वर मिश्र पंकज
भारत कभी 1 दिन के लिए भी पराधीन नहीं रहा। जो भी मुसलमान अत्याचारी जागीरदार यहां हुए ,जिन लफंगों को बादशाह आदि कहकर पढ़ाया जाता है वह मूल रूप में दो या तीन या अधिक से अधिक चार पीढ़ियों के भीतर हिंदू से ही मुसलमान बने लोग थे और उनमें से किसी ने अपने बल पर किसी बड़े क्षेत्र पर एक दिन शासन नहीं किया।अतः वह हिंदू मुस्लिम साझा शासन था या भारतीय पदावली में कह लो कि "अपेक्षाकृत धर्म निष्ठ और सदाचारी राजनीतिक हिंदुओं का अत्याचारी पापी पूर्वहिंदुओं के साथ साझा शासन था।जिनमे राजाओं का लोभ और कूटनीति की विकृत समझ कारण रहे।काल प्रवाह वश।उसका कोई तर्कपूर्ण कारण ढूंढना बौद्धिक व्यायाम है और उसकी आड़ में अपनी राजनैतिक रोटी सेंकना है।
इसी प्रकार ईस्ट इंडिया कंपनी के भिखमंगे कथित व्यापारी भारत की महान व्यापार परंपरा का लाभ उठाकर और हिंदुओं में से बहुत ही कमीनी किस्म के लोगों को अपने साथ लेकर तरह तरह के झूठे और मक्कार लोगों के साथ तथा मुख्यतः पहले ही पतित हो चुके मुस्लिम लफंगे कथित नवाबों आदि की साझेदारी से उनके मुनीम बनने में सफल हुए और वे नमक हराम,कृतघ्न और नीच मुनीम निकले।
बाद में एक झूठ फैला कर कि अंग्रेजों की हत्या हो रही है ,ब्रिटिश प्रशासन रक्षा की आड़ लेकर यहां अनेक भारतीय राजाओं की संधि से आया और 1857 से 1947 तक लगभग आधे भारत में 90 वर्षों तक बड़ी संख्या में हिंदुओं की साझेदारी से और मुसलमानों की भी साझेदारी से शासन किया ।
इसको किसी भी तरह से गुलामी नहीं कहा जा सकता। इसके विवरण के लिए पढ़ें हमारी पुस्तकें:- कभी भी पराधीन नहीं रहा है भारत और भारत हजार वर्षो की पराधीनता: एक औपनिवेशिक भ्रमजाल।
यदि सत्य निदान नहीं हुआ तो उपचार तो असंभव है और सच यह है कि उपचार से अधिक वर्तमान में धर्म अधर्म की विवेचना कर धर्म के उत्कर्ष के लिए कार्य करना ही एकमात्र कर्तव्य है।
अतीत का झूठ से भरा विश्लेषण खड़ा कर अपनी राजनीतिक दुकानदारी चलाना निकृष्ट कार्य है जो दुर्भाग्यवश भारत के राजनैतिक दल करते रहते हैं और उनके अनुयाई भी करते रहते हैं।यह ठीक बात नहीं है।
गांधीजी के समय तक सत्य की स्थिति सबको पता थी और गांधी जी ने भी अधिकांश समय स्थिति का सत्य विश्लेषण ही किया है।
अपनी राजनीतिक लालसा या आकांक्षाओं के कारण उन्होंने भले कुछेक समझौते अंग्रेजों से किए परंतु वह बोलते सच थे।
कभी कभी अवश्यअहिंसा का आवरण लेकर उन्होंने निजी राजनीति भी की। यह अपनी जगह है और सही नहीं है ।
परंतु शेष उनके सत्य कथन बारंबार मननीय हैं।
स्वयं को गांधी जी का एकमात्र मुख्य अनुयाई बताकर झूठा प्रचार करने वाले गांधी विरोधी जवाहरलाल नेहरू राजनीतिक लालसाओं से ऐसा करते थे । प्रौद्योगिकी के अनेक कार्यों के द्वारा उंन्होने विकास का सोवियत मॉडल खड़ा किया।उसे राष्ट्रभक्ति ही कहा जाएगा।पर साथ में सोवियत संघ की नकल से उन्होंने भारत को एक अज्ञान में डूबा हुआ समाज बनाने के लिए भी कार्य किया है और इसे ही शिक्षा, ज्ञान आदि प्रचारित किया गया जो लगभग सभी दलों ने अपना रखा है।इस मिश्रण को पृथक पृथक जानना ही विवेक है। एक ही रंग में रंगना मूढता है।
परंतु यह स्थिति नई पीढ़ी में बदल रही है। जिज्ञासु नई पीढ़ी बारंबार सत्य जानना चाहती है और समाजवादी मकड़जाल हट जाने के बाद तथा प्रौद्योगिकी में उत्कृष्ट उभार भी होने के कारण सत्य जानने के बहुत से रास्ते भी खुल गए हैं।
जय श्री राम।
रामेश्वर मिश्र पंकज
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