सत्येन्द्र कुमार पाठक
हिमालय की कोख गोमुख से निकलकर गंगोत्री से होते हुए भागीरथी गंगा की अविरल धारा देवप्रयाग में अलकनंदा में चट्टानें घुलकर जल की जैविक संरचना करती है । वैज्ञानिक शोध के अनुसार गंगा के पानी में ऐसे जीवाणु हैं जो सड़ाने वाले कीटाणुओं को पनपने नहीं देते है । हरिद्वार में गोमुख- गंगोत्री से आ रही गंगा के जल की गुणवत्ता का दुष्प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि यह हिमालय पर्वत पर उगी हुई अनेकों जीवनदायनी उपयोगी जड़ी-बूटियों, खनिज पदार्थों और लवणों को स्पर्श करता हुआ आता है । हिमालय की कोख से गंगाजल में बैट्रिया फोस बैक्टीरिया रहने से पानी के अंदर रासायनिक क्रियाओं से उत्पन्न होने वाले अवांछनीय पदार्थों को नष्ट करता रहता है। गंगा के पानी में गंधक (सल्फर) की प्रचुर मात्रा एवं भू-रासायनिक क्रियाएं गंगाजल में होने से कीड़े पैदा नहीं होते है । गंगा हरिद्वार से आगे शहरों की ओर बढ़ते रहने पर शहरों, नगर और खेती-बाड़ी का कूड़ा-करकट तथा औद्योगिक रसायनों का मिश्रण गंगा में डाल दिया जाता है । वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर गंगाजल से स्नान करने तथा गंगाजल को पीने से हैजा, प्लेग, मलेरिया तथा क्षय आदि रोगों के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। डॉ. हैकिन्स, ब्रिटिश सरकार की ओर से डॉ. हॉकिंग्स द्वारा गंगाजल से दूर होने वाले रोगों के परीक्षण के लिए गंगाजल के परिक्षण के लिए गंगाजल में हैजे (कालरा) के कीटाणु डाले गए। हैजे के कीटाणु मात्र 6 घंटें में ही मर गए और जब उन कीटाणुओं को साधारण पानी में रखा गया तो वह जीवित होकर अपने असंख्य में बढ़ गया था । फ्रांस के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. हैरेन ने गंगाजल पर वर्षों अनुसंधन करके अपने प्रयोगों का विवरण शोधपत्रों के रूप में प्रस्तुत किया था । डॉ. हैरेन ने आंत्र शोध व हैजे से मरे अज्ञात लोगों के शवों को गंगाजल में ऐसे स्थान पर डाल दिया था । डॉ. हैरेन को आश्चर्य हुआ कि कुछ दिनों के बाद शवों से आंत्र शोध व हैजे नहीं बल्कि अन्य कीटाणु गायब हो गए थे । उन्होंने गंगाजल से 'बैक्टीरियासेपफेज' घटक निकाला, जिसमें औषधीय गुण हैं। इंग्लैंड के चिकित्सक सी. ई. नेल्सन ने गंगाजल पर अन्वेषण करते हुए लिखा कि गंगाजल में सड़ने वाले जीवाणु नहीं होते। उन्होंने महर्षि चरक को उद्धृत करते हुए लिखा कि गंगाजल सही मायने में पथ्य है। रूसी वैज्ञानिकों ने हरिद्वार एवं काशी में स्नान के उपरांत 1950 में कहा कि गंगा स्नान के उपरांत ही ज्ञात हो पाया कि भारतीय गंगा पवित्र है । कनाडा के मैकिलन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. एम. सी. हैमिल्टन ने गंगा की शक्ति को स्वीकारते हुए कहा कि वे नहीं जानते कि इस जल में अपूर्व गुण कहाँ से और कैसे आए। सही तो यह है कि चमत्कृत हैमिल्टन वस्तुत: समझ नहीं पाए कि गंगाजल की औषधीय गुणवत्ता को किस तरह प्रकट किया जाए आयुर्वेदाचार्य गणनाथ सेन, विदेशी यात्री इब्नबतूता वरनियर, अंग्रेज़ सेना के कैप्टन मूर, विज्ञानवेत्ता डॉ. रिचर्डसन आदि सभी ने गंगा पर शोध करके यही निष्कर्ष दिया कि यह नदी अपूर्व है।
गंगाजल अपने खनिज गुणों के कारण गुणकारी और स्नान करने वाले लोग स्वस्थ और रोग मुक्त बने रहते हैं। इससे शरीर शुद्ध और स्फूर्तिवान बनता है। भारतीय सांस्कृतिक सभ्यता में गंगा को पवित्र नदी माना जाता है। गंगा नदी के पानी में विशेष गुण के कारण गंगा नदी में स्नान करने भारत के विभिन्न क्षेत्र से नहीं बल्कि संसार के अन्य देशों से लोग आते हैं। गंगा नदी में स्नान के लिए आने वाले सभी लोग विभिन्न प्रकार के रोगों से मुक्ति पाने के लिए हरिद्वार और ऋषिकेश आकर मात्र गंगा स्नान से पूर्ण स्वस्थ हो जाते हैं। विद्वानों ने गंगाजल की पवित्रता का वर्ण कर पूर्ण आत्मा से किया है। भौतिक विज्ञान आचार्यो ने गंगाजल की अद्भुत शक्ति और प्रभाव को स्वीकार किया है।करने भारत के विभिन्न क्षेत्र से ही नहीं बल्कि संसार के अन्य देशों से भी लोग आते हैं। गंगा नदी में स्नान के लिए आने वाले सभी लोग विभिन्न प्रकार के रोगों से मुक्ति पाने के लिए हरिद्वार और ऋषिकेश आकर मात्र कुछ ही दिनों में केवल गंगा स्नान से पूर्ण स्वस्थ हो जाते हैं। विद्वानों ने गंगाजल की पवित्रता का वर्णन अपने निबन्धों में पूर्ण आत्मा से किया है। भौतिक विज्ञान आचार्यो ने गंगाजल की अद्भुत शक्ति और प्रभाव को स्वीकार किया है। भगीरथी गंगा , अलकनंदा गंगा , मंदाकिनी गंगा मिल कर ऋषिकेश में गंगा रूप में निरंतर प्रवाहित हो कर हृरिद्वार में गिरती के बाद मानव कल्याण करती है ।माता गंगा की जलधारा पवित्र एवं जीवनोपयोगी और जीवात्मा का मार्ग प्रशस्त करती है ।
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