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मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी -- गीता-जयन्ती की शुभेच्छाएँ

मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी -- गीता-जयन्ती की शुभेच्छाएँ !

संकलन अश्विनीकुमार तिवारी
कृपया, हम संकल्प करें -"आज से मैं प्रतिदिन गीता के न्यूनतम ५ श्लोक (सरलार्थ सहित) पढ़ूँगा ।"
(उसके लिए गीताप्रेसद्वारा प्रकाशित श्रीमद्भगवद्गीता, श्लोकार्ध-सहित, क्रय करना होगा)
अथ श्रीमद्भगवद्गीतामाहात्म्यसप्तकम् !
गीताशास्त्रमिदं पुण्यं य: पठेत्प्रयत: पुमान् ।
विष्णो: पदमवाप्नोति भयशोकादिवर्जित: ।।१।।
अर्थात् - यह पवित्र गीताशास्त्र जो मनुष्य पढता है, वह भय, शोक आदि विरहित ऐसा श्रीविष्णुपद प्राप्त करता है ।
गीताध्ययनशीलस्य प्राणायामपरस्य च ।
नैव सन्ति हि पापानि पूर्वजन्मकृतानि च।।२।।
अर्थात् - गीता के अध्ययन में तथा प्राणायाम में नित्यरत मनुष्य के पूर्वजन्म में किये हुए सभी पाप शेष नहीं रहते ।
मल निर्मोचनं पुसां जलस्नानं दिने दिने ।
सकृद्गीताम्भसि स्नानं संसारमलनाशनम् ।।३।।
अर्थात् - प्रतिदिन स्नान करने से मनुष्य का (शारीरिक) मल नष्ट होता है । गीता के जल में किया गया स्नान संसार के मल को विनष्ट करता है ।
गीता सुगीता कर्तव्या किमन्न्यै: शास्त्रविस्तरै: ।
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनि:सृता ।।४।।
अर्थात् - जो प्रत्यक्ष भगवान् पद्मनाभ के मुखारविन्द से निकली है ऐसी गीता सुगीता और करणीया है, अन्य शास्त्रों के विस्तार में क्या धरा है ?
भारतामृतसर्वस्वं विष्णोर्वक्त्राद्विनि:सृतम् ।
गीतागंगोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।।५।।
अर्थात् - महाभारत का सारामृत, श्रीविष्णु के श्रीमुख से निकला हुआ, गीतागंगा का जल पीने से पुनर्जन्म नहीं होता ।
#सर्वोपनिषदोगावोदोग्धागोपालनन्दन:।
#पार्थोवत्स: #सुधीर्भोक्तादुग्धंगीतामृतंमहत् ।।७।।
अर्थात् - सब उपनिषद गायें हैं, उन्हें दुहनेवाला है गोपालनन्दन, सद्बुद्धियुक्त पार्थ बछड़ा है जो महान् गीतामृतरूप दूध पीता है ।
एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतमेको देवो देवकीपुत्र एव ।
एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा ।।
अर्थात् - यदि कोई एक शास्त्र है तो वह है, देवकीसुत द्वारा गायी गयी (गीता), देवकीपुत्र श्रीकृष्ण ही एकमात्र देव है, कोई एकमेव मन्त्र है तो उसका नाम, और उस देव की सेवा ही एकमात्र करणीय कर्म है ।
ॐ तद्सद्श्रीब्रह्मार्पणमस्तु ।। इदं न मम ।।
✍🏻मुकुन्द हम्बरडे
एक बार किसी सेमिनार में हिस्ट्री के एक परफेसर साहेब यह बता रहे थे,कि महाभारत काल के लोग कृषि से अनभिज्ञ थे...पर,जैसे ही उनके बाद वाले वक्ता ने श्रीमद्भागवत गीता के 18वें अध्याय का 44 वां श्लोक उद्धृत किया -
कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् |
परिचर्यात्मकं कर्म श्रूद्रस्यापि स्वभावजम् ||
परफेसर साहेब चुपचाप हाल से बाहर चले गए...जब महाभारत काल के लोग कृषिकर्म से अनभिज्ञ थे,फिर यह शब्द कैसे आया???
....सेमिनार के बाद एक दिन,जिस वक्ता ने यह श्लोक उद्धृत किया था...उन्होने अपने घर के पास एक पुजारी से जब यह पूछा कि क्या महाभारत काल के लोग कृषि से अनभिज्ञ थे??यह सुनते ही पुजारी ने जो कि दसवीं या बारहवीं पास थे तुरंत ही उपरोक्त श्लोक को उद्धृत किया...
✍🏻साभार......
आदत सी है तो बात फिर से फिल्मों से ही शुरू करेंगे। ये प्रसिद्ध सी फिल्म है “हैरी पॉटर एंड द फिलोस्फर्स स्टोन”, जो कि इसी नाम के एक उपन्यास पर आधारित थी। किताबों के रूप में हैरी पॉटर श्रृंखला तो काफी प्रसिद्ध थी ही, फिल्मों के रूप में भी इसे ख्याति मिली। जैसा कि नाम से जाहिर है, इस फिल्म की कहानी “फिलोस्फर्स स्टोन” पर आधारित थी। जैसे भारत में पारस पत्थर की किम्वदंती चलती है, फिलोस्फर्स स्टोन भी कुछ कुछ वैसी ही चीज़ मानी जाती है। जैसे पारस छूने से लोहा स्वर्ण बन जाता है वैसे ही फिलोस्फर्स स्टोन से भी सोना बनता है। इसके अलावा इससे पानी को बदलकर एक औषधि सी बनती है (एलेक्सिर ऑफ़ लाइफ) जिससे इंसानों की उम्र हजारों साल तक बढ़ाई जा सके।
मगर हमारी इस पूरी फिल्म की कहानी में उतनी रूचि नहीं। मेरा ध्यान फिल्म के केवल एक-दो हिस्सों पर रहा जिसमें एक विचित्र सा दर्पण दिखाते हैं। इस दर्पण का नाम “मिरर ऑफ़ इराईज्ड” होता है। ये दर्पण व्यक्ति की छवि नहीं दिखाता था। ये सामने खड़े व्यक्ति को उसके मन में दबी-छुपी कोई इच्छा दिखा रहा होता था। जब हैरी इसके सामने खड़ा होता तो उसका परिवार (माता-पिता) और पिछली कई पीढ़ियाँ दिखती थीं। ऐसा इसलिए था क्योंकि हैरी के माता-पिता की मौत हैरी के बचपन में ही हो गयी थी और अनाथ बड़े हुए हैरी के लिए माता-पिता और परिवार एक बड़ा सपना थे। इसकी तुलना में उसके मित्र रॉन को प्रसिद्धि पसंद थी तो वो आईने में खुद को एक बड़ा कप जीतते और लोगों को प्रशंसा में तालियाँ बजाते देखता था।
फिल्म और कहानी में दर्पण के इच्छा या “डिजायर” को दर्शाने का तरीका अनूठे अंदाज से दर्शाया गया है। अंग्रेजी में लिखने पर “Erised” बिलकुल “Desire” का उल्टा होता है। ऐसे ही दर्पण के ऊपर लिखा वाक्य किसी प्राचीन भाषा में लिखा गया बताया गया है। वहाँ “"Erised stra ehru oyt ube cafru oyt on wohsi" लिखा होता है, और उसे भी अगर उल्टा करें और शब्दों के बीच की खाली जगह को थोडा ठीक करें तो "I show not your face but your heart's desire" बन जाता है। कहानी का खलनायक प्रोफेसर कुइर्रेल जब आईने में देखता है तो खुद को अपने मालिक को फिलोस्फर्स स्टोन देता हुआ दिखता है। डम्बल्डोर बताता है कि कोई संतुष्ट व्यक्ति इस दर्पण को बिलकुल आम आईने की तरह प्रयोग कर पायेगा। साधारण लोगों के लिए वो दर्पण पूरे जीवन उलझाए रखने वाला, बिलकुल सपने में जीने जैसा अनुभव करवाने वाला, एक छलावा था। खुद को अपने सपने का नायक देखना, कामयाब, विजयी देखना, उलझाये रख सकता है।
भारतीय कहानियों पर चलें तो इसका उल्टा भी होता है। ऐसी एक कहानी राजा जनक की है। इस कथा में राजा जनक सोते-सोते एक स्वप्न देखते हैं जिसमें उनके शत्रुओं ने उनके राज्य पर हमला कर दिया होता है। राजा जनक युद्ध हार जाते हैं, उनका महल जला दिया जाता है, राज-पाट छिन जाता है। दीन-हीन अवस्था में राजा जनक भिखारी होकर दुःख पा रहे होते हैं कि अचानक उनकी नींद खुल जाती है। अब राजा जनक सोचते हैं, ये सच या वो सच? जो राज्य का सुख मैं अभी भोग रहा हूँ वो सुखकर है, लेकिन सपने में जो व्यथा हो रही थी, वो भी तो उतनी ही सत्य प्रतीत हो रही थी। ये प्रश्न वो दरबारियों से करते हैं। दरबारी तो जवाब नहीं दे पाते लेकिन बाद में अष्टावक्र आते हैं और समझाते हैं कि जगत उतनी ही मिथ्या है जितना उनका स्वप्न था।
संसार को आप अपनी पांच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से जानते हैं। स्वाद, स्पर्श, गन्ध, दृष्टि, और श्रवण की क्षमता न हो तो जगत भी स्वप्न जितना ही झूठा है। बिलकुल वैसे ही जैसे मन की क्षमता न हो स्वप्न के होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। ऐसे सपनों के बारे में एक उपनिषद में भी चर्चा की गयी है। माण्डूक्य उपनिषद् सबसे छोटे उपनिषदों में से एक है। इसमें बारह ही मन्त्र होते हैं। इसमें सोने की चार अवस्थाओं की बात की गयी है। सामान्य जागृत अवस्था जिसमें शरीर और जगत का भान रहता है, फिर आती है नींद, उसके बाद गहरी निद्रा जहाँ स्वप्न आने लगते हैं और फिर जब शरीर का भान भी नहीं रहता और स्वप्न भी नहीं आते यानी तुरीय अवस्था। इस उपनिषद पर आदिशंकराचार्य के गुरु के गुरु गौड़पादाचार्य ने कारिका लिखी। इस तरह से बारह मन्त्रों से बढ़कर ये करीब चौंसठ श्लोकों का हुआ और फिर जब आदिशंकराचार्य ने इसपर भाष्य लिखा तो ये और भी लम्बा हो गया। आज माण्डूक्य उपनिषद् खरीदकर पढ़ने लगें तो एक पन्ने में बारह मन्त्र नहीं, करीब ढाई सौ पन्ने की पुस्तक हो जाती है।
अब अगर आप यहाँ तक पहुँच गए हैं तो बता दें कि ये सामान्य सी कहानियाँ इसलिए बतायीं हैं, क्योंकि हम माया के स्वरुप देख रहे थे। किसी मृतक को हैरी की तरह जीवित करने की सोचना, या फिर रॉन की तरह बिना श्रम के प्रशंसा और विजय की इच्छा तामसिक ही कही जा सकती है। राज्य के लिए राजा जनक का सोचना राजसी होगा। गौड़पादाचार्य या आदिशंकराचार्य अपने हिसाब से तो एक उपनिषद का अर्थ समझा रहे थे। इसके बाद भी उनके किये का नतीजा ये हुआ है कि मूल बारह मन्त्र मन्त्रों पर पहले एक पर्दा, फिर दूसरा और अंत में संस्कृत से दूसरी भाषाओं में अनुवाद के कारण एक तीसरा पर्दा पड़ गया है। ये माया का सात्विक रूप है। इस तीन गुणों वाली माया के विषय में भगवान श्री कृष्ण ने भगवद्गीता के सातवें अध्याय में कहा है –
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।7.14
यानी मेरी इस त्रिगुणमयी माया को पार करना बड़ा कठिन है, लेकिन जो मेरी शरण में आ जाते हैं, वो इसे पार कर जाते हैं। इस सम्बन्ध में भगवद्गीता के अंतिम अध्याय में कहा गया है –
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।18.61
अर्थात अर्जुन, मनुष्यों के ह्रदय में बैठकर ईश्वर अपनी माया के माध्यम से, मनुष्यों को ऐसे घुमाते रहते हैं, मानों उन्हें किसी यंत्र पर बिठा रखा हो। वैसे तो भगवद्गीता में माया के विषय में और भी श्लोक हैं लेकिन चूँकि माण्डूक्य उपनिषद् की चर्चा की है तो ये भी बता देना चाहिए कि इस उपनिषद के मन्त्र ॐ के बारे में हैं। भगवद्गीता में जब सातवें ही अध्याय का आठवां श्लोक देखेंगे तो वहाँ कहा गया है –
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु।।7.8
इस श्लोक में (बाकी बातों के अलावा) भगवान कहते हैं “सम्पूर्ण वेदों में प्रणव (ओंकार) मैं हूँ”। जब भगवद्गीता को उपनिषदों का सार कहा जाता है तो वो इसी लिए कहा जा रहा होता है क्योंकि जो यहाँ लिखा मिलेगा, वो कहीं न कहीं उपनिषदों से आता है, या उपनिषदों में कही बातों का व्यावहारिक प्रयोग है।
गीता जयंती मनाई जा रही है और सोशल मीडिया के फैलाव के साथ ऐसे अवसरों की जानकारी जन सामान्य में फैलने भी लगी है। बाकी सिर्फ आयोजन की जानकारी नहीं, मूल ग्रन्थ भी पढ़कर स्वयं सीख लें तो बेहतर होगा, क्योंकि जो हमने बताया वो नर्सरी के स्तर का है और पीएचडी के लिए आपको स्वयं भगवद्गीता पढ़नी होगी। ये तो याद ही होगा?
✍🏻आनन्द कुमार

ஜ٠•●●•٠ஜश्रीभगवानुवाचஜ٠•●●•٠ஜ


ततः प्रभाते द्वादश्यां कार्यो मत्स्योत्सवो बुधैः |


मार्गशीर्षे शुक्लपक्षे यथाविध्युपचारतः||


मत्स्य देश में मत्स्योत्सव मनाने की लोक परम्परा का निर्वहन आधुनिक काल तक हो रहा है। मात्स्य जनपद जहाँ राजा विराट का शासन था और पाण्डवों ने अज्ञातवास किया था।
मत्स्य उत्सव कैसे मनाया जाये इसका कहीं विस्तृत विवरण पढ़ने को नहीं मिला। हाँ स्कन्दपुराण में इसे ३ दिन का उत्सव कहा गया है, अर्थात् दशमी से द्वादशी तक।
२५ वर्ष पूर्व मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की दशमी से मत्स्योत्सव मनाने का उपक्रम आरम्भ हुआ तथा द्वादशी तिथि को हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ था।
आपने ठीक समझा ६-१२-१९९२ दिन रविवार को आग्रहायण शुक्ला द्वादशी अर्थात् मत्स्य-द्वादशी ही थी। गीता-जयन्ती के ठीक आगे का दिवस ।


👉कुछ मछलियाँ सोने और चाँदी के काँटे में ही फसती हैं।
✍🏻अत्रि विक्रमार्क


#श्रीकृष्णजीगीताऔरहिंदूधर्म


श्रीकृष्ण भगवान गीता में जब कहते हैं कि "मैं वेदों में सामवेद हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म "गायन विधा" का धर्म है।


श्रीकृष्ण भगवान गीता में जब कहते हैं कि "मैं धन का स्वामी कुबेर हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म "ऐश्वर्य और समृद्धि" का धर्म है।


श्रीकृष्ण भगवान गीता में जब कहते हैं कि "कवियों में शुक्राचार्य कवि मैं ही हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म "काव्य" का धर्म है।


श्रीकृष्ण भगवान गीता में जब कहते हैं कि "मैं स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक, मेधा, धृति और क्षमा हूं" तो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म "नारी" को सर्वोपरि मानने का धर्म है।


श्रीकृष्ण भगवान गीता में जब कहते हैं कि "मैं ऋतुओं में वसंत हूं" तो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म आनंद और उल्लास का धर्म है।


श्रीकृष्ण भगवान गीता में जब कहते हैं कि "मैं जीतने वालों का विजय हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म केवल "विजय श्री" का वरण करने वालों का धर्म है पराजित होकर आंसू बहाने वालों का नहीं।


श्रीकृष्ण भगवान गीता में जब कहते हैं कि "मैं सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म कुत्सित भाव वालों का धर्म नहीं है।


श्रीकृष्ण भगवान गीता में जब कहते हैं कि "मैं ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म विश्व को अपने तेज से आलोकित करने वालों का धर्म है।


श्रीकृष्ण भगवान गीता में जब कहते हैं कि "मैं नक्षत्रों का अधिपति चंद्रमा हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म विश्व को अपनी शीतलता देने वाला धर्म है।


श्रीकृष्ण भगवान गीता में जब कहते हैं कि "मैं देवों में इंद्र हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म विश्व में इंद्र के समान शोभित होने के लिए प्रकट है।


श्रीकृष्ण भगवान गीता में जब कहते हैं कि "मैं शिखर वाले पर्वतों में सुमेरू और स्थिर रहनेवालों में हिमालय पर्वत हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म विशालता, स्थिरता और गंभीरता का धर्म है।


श्रीकृष्ण भगवान गीता में जब कहते हैं कि "मैं वृक्षों में पीपल का वृक्ष हूं" तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म विश्व को और मानवता को प्राणवायु देने वाला धर्म है।


श्रीकृष्ण भगवान गीता में जब कहते हैं कि "मैं घोड़े में उच्चै:श्रवा नाम का घोड़ा, हाथियों में ऐरावत, पशुओं में मृगराज सिंह, पक्षियों में गरुड़, गौओं में कामधेनु, मछलियों में मगर और सर्पों में सर्पराज वासुकि हूं तो वो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म विश्व के समस्त जीव -जंतुओं के संरक्षण और संवर्धन का धर्म है।


श्रीकृष्ण भगवान गीता में जब कहते हैं कि "मैं नदियों में भागीरथी गंगा जी हूं" तो ये भी कहते हैं कि हिंदू धर्म प्रकृति के साथ सहचारिता का धर्म है।


कालिंदी के तट पर श्रीकृष्ण के श्री मुख से निःसृत गीता ज्ञान सर्वकालिक और काल निरपेक्ष है जिसकी प्रासंगिकता हर युग में है, हर समय में है। विश्व में 'कृष्ण' अकेले हैं जो ये दावा करते हैं कि वो स्वयं ईश्वर हैं बाकी किसी ने भी ऐसा दावा करने की हिम्मत नहीं की। इसी तरह गीता जी भी अकेला ग्रंथ है जो सीधे श्रीभगवान के श्री मुख से निःसृत है और किसी दूसरे या तीसरे के माध्यम से नहीं आया।


अटल जी की कविता है :-


अपढ़, अजान विश्व ने पाई/ शीश झुकाकर एक धरोहर
कौन दार्शनिक दे पाया है/ अब तक ऐसा जीवन-दर्शन?
कालिन्दी के कल कछार पर/ कृष्ण-कंठ से गूंजा जो स्वर
अमर राग है, अमर राग है.........


इस आग को हम हिंदू अपने हृदय में धारण करें।


आप सबको गीता जयंती की बहुत - बहुत शुभकामनाएं
✍🏻अभिजीत सिंह


श्रीकृष्‍ण और यूनान के प्रसंग...


भारत में धर्म और आस्‍था के मूलाधार श्रीकृष्‍ण को माना गया है। उनके गीता में कहे गए वचनों पर कौन विश्‍वास नहीं करता। भारत में छपने ज्‍यादा छपने और बिकने वाला ग्रंथ ही श्रीमद़भगवदगीता है। किंतु, यूनान की माइथोलॉजी बताती है कि श्रीकृष्‍ण का यूनान के साथ गहरा संबंध रहा है। सबसे पहले प्रो. भांडारकर और जेकोबी ने इस संबंध में अपने मत दिए थे।


हाल ही मेरे परम सहयोगी इंडोलॉजी के विद्वान प्रो. भंवर शर्मा, उदयपुर ने यूनानी माइथोलॉजी का अनुवाद किया तो पाया कि भारतीय कृष्‍णकथा का अद़भुत संबंध यूनान से रहा है। एक-एक कथा प्रसंग में यूनान पैठा हुआ है। फिर, श्रीकृष्‍ण के साथ जिस मुद्रा का संबंध हरिवंश में बताया गया है, वह 'दीनार' है। यह कहां की मुद्रा है, हरिवंश में आया है -
माथुराणां च सर्वेषां भागा दीनारका दश।।
सूतमागध बंदीनामेकैकस्‍य सहस्रकम़। (हरिवंश, विष्‍णुपर्व 55, 51-52)


पढने वालों को गुस्‍सा भी हो सकता है, फिर यह भी कहा जा सकता है कि भारत से ही यह कथा यूनान गई... भारतवर्ष की प्रभाव क्षेत्र की सीमा आज से कहीं ज्यादा थी।


उनके अनुवाद-अध्‍ययन के कुछ प्रसंग :


क्रीट के राजा देवक्‍लीयन का सबसे बडा पुत्र हेलेन सभी ग्रीकों का पिता कहा गया है। इससे इओनियन, एकियन, एओलियन और डोरियन-- चार वंश चले। हेलेन, हेली, हेलीली आदि श्रीकृष्‍ण के ही नाम हैं - गोपालसहस्रनाम स्‍तोत्र में आया है - कोलाहलो हली हाली हेली हल धरो प्रियो। (श्‍लोक 20)


क‍था आई है कि स्‍वर्ग के राजा यूरेनस ( तुलनीय -उग्रसेन) को क्रोनस (कंस) राज्‍य छीनकर अपनी बहन ह्रिया को (पत्‍नी बनाकर, महाभारत काल में ऐसी परंपरा के प्रसंग महाकाव्‍य में आए हैं) अपने अधिकार में कर लेता है। दिवंगत होते हुए उसकी माता पृथवी और पिता यह भविष्‍य करते हैं- क्रोनस को उसके बहन के पुत्रों में से एक राजसिंहासन से हटाएगा। वह पांच बच्‍चों को जिंदा खा गया। बहन ह्रिया घबरा गई। उसने अगले पुत्र जयस (श्रीकृष्‍ण का पर्याय जय : पांचजन्‍यकरो रामी त्रिरामी वनजो जय, गोपालसहस्रनाम 47) को जब पैदा किया तो नील नदी ( तु. यमुना) में स्‍नान कराकर भूमि को सौंप दिया जो कि पर्वतीय प्रदेश में ( तु. गोवर्धन पार के गांव में) छिपा आई। वनदेवी इयो (गायों) और अजदेवी (वृष्णि, बकरी) ने उसका लालन पालन किया। कोनस जब ये जान गया तो ह्रिया ने उसे कपडे में पत्‍थर बांधकर दे दिया। वह उसे भी खा गया। जब उसे धोखे का पता चला तो जेयस नाग (कालिय) बन गया।


यह जेयस इडा के पहाडों में बसे ग्‍वालों के बीच बडा हुआ और तरकीब से क्रोनस का पानेरी बना। एक बार उसने क्रोनस को कुछ ऐसा पिला दिया कि उसके पेट से जयस के पूर्व भाई-बहन बाहर आ गए जिन्‍होंने जयस को अपना मुखिया चुना। जेयस ने क्रोनस को अपने वज्र से मार गिराया।


यूनानी माइथोलॉजी के मुताबिक जेयस की पहली विजय, पहली सदी ई. पूर्व के लेखक थालस के अनुसार टाय के घेरे में 322 साल पहले हुई, अर्थात् 1505 ईसा पूर्व। अधिकांश विद्वानों ने कृष्‍ण व कंस का इतिहास में यही काल तय किया है।



इस कथा में एराधिन के साथ जयस के संबंध राधा-कृष्‍ण के प्रसंगों के परिचायक है। जेयस ने बैल का रूप धरकर लीबिया की राजकन्‍या यूरोपी (तु. रुकमिणी) का हरण किया। उससे तीन पुत्र हुए मीनो, राधामंथिस और सर्पदन। मीनों क्रीट के शासक हुए और राधामंथिस स्‍मृतिकार। मीनों की पत्‍नी पेसिफी हुई जो सबके लिए चमक लिए थी, अर्थात् कीर्ति। पुराणों में वृषभानु की पत्‍नी का नाम भी कीर्ति ही आया है।


अगली एक कथा में एद्रोस्‍टस ( तु. द्रुपद) की पुत्री देयदामिथा (द्रोपदी) चचेरे भाइयों के रूप में शतम् (कोरव) और नेस्‍टर (घोंसले वाला, शकुनी) आदि के आख्‍यान है...। है न भारतीय पुराणों की कथा की साम्‍यता रखने वाला प्रसंग...। यवनों ने विदिशा में हेरक्‍लीज का स्‍तंभ बनाया। यह हेरक्‍लीज ही हरिकृष्‍ण है जो ग्रीक साहित्‍य में बहुत महत्‍व रखता है। (न्‍याय, अजमेर के दीपावली अंक, 1962 में प्रकाशित प्रो. शर्मा का लेख और साक्षात्‍कार पर आधारित)✍🏻डॉ0 श्रीकृष्ण जुगनूहमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag

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