भारत में हिंसा भड़का रहा चीन
(अशोक त्रिपाठी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
असम राइफल्स के पूर्व डायरेक्टर जनरल (रिटायर्ड) लेफ्टिनेंट जनरल शोकीन चैहान का मानना है कि पूर्वोत्तर के राज्यों में हिंसक घटनाओं में हुई बढ़ोतरी के पीछे एक कारण चीन भी है। उन्होंने कहा कि उग्रवादी संगठनों को चीन से समर्थन प्राप्त हो सकता है कि वे इन राज्यों में हिंसा को बढ़ावा दें। कोहिमा स्थित सीजफायर मॉनिटरिंग ग्रुप के पूर्व अध्यक्ष ने यह भी कहा कि, यह सही समय है कि केंद्र सरकार इन विद्रोही गुटों से बात करके शांति समझौते करें। इन मुद्दों को आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया जा सकता है। अब तक हम पडोसी देश पाकिस्तान से ही इस प्रकार की समस्या से परेशान थे, अब चीन भी पर्दे के पीछे से वार करने लगा है।इसी के चलते मणिपुर में हुए उग्रवादी हमले के बाद पूर्वोत्तर के राज्यों में सुरक्षाबलों की तैनाती को लेकर भारतीय सेना पुनर्विचार कर सकती है। इन राज्यों में सैनिकों की संख्या कम करने या उग्रवादी हमलों के बाद संख्या बढ़ाने के मुद्दे पर फैसला लिया जा सकता है।
सरकार को मिले आंकड़ों के अनुसार, पूर्वोत्तर के राज्यों में इस साल जनवरी से लेकर 31 अक्टूबर तक, उग्रवादी हिंसा की 132 घटनाएं दर्ज हुई हैं। इनमें मणिपुर में सबसे ज्यादा हिंसा की 90 घटनाएं देखने को मिली है। वहीं, अरुणाचल प्रदेश में 22 और असम में उग्रवादी हिंसा की 18 घटनाएं हुई हैं।
दरअसल असम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में कुछ उग्रवादी संगठनों ने अब तक सरकार के साथ सीजफायर समझौता नहीं किया है। इन संगठनों में असम में यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आफ असम (उल्फा), दक्षिण अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड में एन एससीएन-के (वाईए ) और इम्फाल घाटी में स्थित उग्रवादी संगठन पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए), पीपुल्स रेवोल्युशनरी पार्टी ऑफ कांगलेईपेक (पीआरईपीएके), कांगलेई यालोव कन्ना यु (केवाईकेएल) और यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (यूएनएलएफ) शामिल हैं। इसके अलावा कुछ अन्य विद्रोही संगठनों ने भी सीजफायर समझौते को स्वीकार नहीं किया है, लेकिन उनके ऑपरेशन थमे हुए हैं।
हाल ही में, पीएलए और मणिपुर नागा पीपुल्स फ्रंट के विद्रोहियों ने मणिपुर में सेना पर हमला किया था और इस हमले में असम राइफल्स के कर्नल विप्लव त्रिपाठी और उनकी पत्नी व 6 वर्षीय बेटे के साथ 4 अन्य जवानों की मौत हो गई थी। अभी हाल ही उग्रवादी संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालिम के 3 लड़ाकों को असम राइफल्स और अरुणाचल प्रदेश पुलिस ने ज्वाइंट ऑपरेशन में मार गिराया था। इन विद्रोहियों ने 2 नागरिकों का अपहरण कर लिया था।
इस साल सेना अध्यक्ष एम एम नरवणे ने कहा था कि पूर्वोत्तर में सुरक्षा हालात बेहतर हो रहे हैं और यह सेना के उस फैसले का परिणाम है जिसमें उन्होंने पूर्वोत्तर के राज्यों से आर्मी की एक ब्रिगेड को वापस बुला लिया था। शुरुआत में इस योजना पर विचार किया जा रहा था कि सेना पूर्वोत्तर के राज्यों से और सैनिकों को वापस बुलाएगी ताकि सेना देश की आंतरिक सुरक्षा से संबंधित कर्तव्यों से मुक्त होकर पारपंरिक युद्ध और कार्यों पर ध्यान केंद्रित कर सके, लेकिन अब यह उचित नहीं दिखता है।
रक्षा मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि पिछले कुछ सालों में पूर्वोतर के राज्यों में हिंसा से संबंधित घटनाओं में कमी आई है, लेकिन इन राज्यों से फिलहाल सैनिकों की वापसी का विकल्प सही नहीं हो सकता। रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा कि, पूर्वोत्तर के इन राज्यों में, विशेषकर सीमावर्ती राज्य, जहां पर विद्रोही संगठनों ने अब तक सरकार के साथ सीजफायर समझौता नहीं किया है, वहां पर सैनिकों की तैनाती की संख्या में बदलाव से संबंधित फैसले विभिन्न पहलुओं और इंटेलीजेंस इनपुट के आधार पर लेने होंगे।
सूत्रों का कहना है कि, पूर्वोत्तर के राज्यों में उग्रवादी हिंसाओं में उतार-चढ़ाव होता रहता है और शांति के बीच कुछ महीनों में बड़े हमले हो जाते हैं। कुकी और इम्फाल घाटी स्थित मैतई विद्रोही संगठन लगातार मणिपुर में सक्रिय है, जहां हाल ही में एक बड़े हमले को अंजाम दिया गया था। वहीं सुरक्षा मामलों से संबंधित सूत्रों का कहना है कि पीएलए ज्यादातर म्यांमार से अपनी गतिविधियां संचालित करता है। हाल ही में इस क्षेत्र में जो हमला हुआ है इसे पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने ही किया है। अटैक के बाद ये लोग वापस म्यांमार स्थित कैंप में लौट जाते हैं। इन सूत्रों ने यह भी बताया कि, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) तस्करी और जबरन वसूली से जुड़ी गतिविधियों में शामिल रही हैं। म्यांमार में सैन्य तख्तापलट और मणिपुर में आगामी चुनावों के बाद स्थिति को ध्यान में रखते हुए, ये लोग राज्य में सुरक्षा हालात को बिगाड़ने की कोशिश कर सकते हैं। सूत्रों ने कहा कि, कर्नल विप्लव त्रिपाठी की हत्या इस बात का सबूत है. क्योंकि वे एंटी स्मगलिंग ऑपरेशन में सक्रिय थे और मैतेई ग्रुप ने हमले में उनकी हत्या कर दी। यह हमला राज्य में चल रही विभिन्न परेशानियों को दर्शाता है। सूत्रों का कहना है कि तस्करी इन विद्रोही संगठनों की आय का मुख्य जरिया है और इसी वजह से सुरक्षबालों को निशाना बनाया जा रहा है, जो कि एंटी स्मगलिंग ऑपरेशन चला रहे हैं।
रक्षा मंत्रालय का अनुमान अपनी जगह है, लेकिन इन राज्यों से फिलहाल सैनिकों की वापसी का विकल्प सही नहीं हो सकता। रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा है कि पूर्वोत्तर के इन राज्यों में, विशेषकर सीमावर्ती राज्य, जहां पर विद्रोही संगठनों ने अब तक सरकार के साथ सीजफायर समझौता नहीं किया है, वहां पर सैनिकों की तैनाती बढ़ाई जानी चाहिए। रक्षा मंत्रालय के सूत्रों ने कहा कि, नागा उग्रवादी संगठन, विशेषकर एनएससीएन (आईएम) के साथ शांति वार्तों को लेकर सकारात्मक परिणाम मिलने की उम्मीद है, जिन्होंने समझौते पर साइन करने से पहले अलग ध्वज और संविधान की मांग की थी। हालांकि केंद्र सरकार ने उनकी इस मांग को ठुकरा दिया था। इससे पहले एनएससीएन (के) ने मार्च 2015 में केंद्र सरकार के साथ सीजफायर समझौता निरस्त कर दिया था।तमिलनाडु के राज्यपाल आर एन रवि, जो कि उस समय नागा शांति वार्ता के वार्ताकार थे, उन्होंने कहा कि यह कहना जल्दबाजी होगी कि हालात किस तरह से ठीक होंगे। एन एससीऐन (आईएम) नए वार्ताकारों के साथ अधिक सहज हैं। सूत्रों का कहना है कि सरकार एनएससीएन (आईएम) को समझौते को लेकर वार्ता पर बुलाने की कोशिश कर रही है। इसके लिए अन्य नागा विद्रोही गुट, एन एससीएन (के) निकी सुमी के साथ लगातार बातचीत जारी है। इस गुट ने लंबी अवधि के बाद सितंबर में केंद्र सरकार के साथ सीजफायर समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके अलावा सरकार पूर्वोत्तर में सक्रिय विभिन्न उग्रवादी संगठनों के साथ सीजफायर एग्रीमेंट पर सहमति बनाने की कोशिश कर रही है। सरकार नागा गुट के विभिन्न समूहों, जिन्हें एनएनपीजीस के नाम से भी जाना जाता है। इनमें एनएससीएन (एनके), एनएससीएन (आर), एनएससीएन(यू), एफजीएन और एन एससीएन (के) में शामिल गुटों के साथ बातचीत को खत्म कर लिया गया है और सहमत स्थिति पर पहुंचने की बात कही गयी है। (हिफी)
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