देवता भी मनाते हैं दीपावली
(पं. आर.एस. द्विवेदी-हिन्दुस्तान समाचार फीचर सेवा)
अंधकार पर प्रकाश की विजय पर्व इंसान ही नहीं देवता भी मनाते हैं। भारतीय परम्परा में अज्ञान के अंधेरे को ज्ञान का प्रकाश ही दूर कर सकता है। हमारी संस्कृति में प्रकृति को देवता मानने की परम्परा रही है। कार्तिक मास की अमावस्या को हम दीपावली मनाते हैं और इसमें 15 दिन बाद कार्तिक पूर्णिमा को देवता दीपावली मनाते हैं। इस दिन नदियों, नालों को दीप से सजाया जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रकृति के संरक्षण का पर्व देव दीपावली हैं। हालांकि इस पर्व से भी कई कहानियां जुड़ी हैं। देव दीपावली का संबंध त्रिपुरापुर के वध से जुड़ा है। त्रिपुरा सुर के वध से देवता खुश हुए और दीप जलाए गए। देव दीपावली के मूल में भगवान शंकर हैं। उन्होंने ही देवताओं और मनुष्यों के साथ-साथ प्रकृति के विनाश को आतुर राक्षस त्रिपुरासुर का वध कार्तिका पूर्णिमा के ही दिन किया था। इसी उत्साह में देवताओं ने दीपावली मनाई थी, जिसे हम आज देव दीपावली के नाम से जानते हैं। मान्यता है कि देवलोक से गंधर्व, किन्नर, देव आदि इस दिन गंगा और अन्य नदियों के किनारे उपस्थित होकर देव दीपावली मनाते हैं। इसी कारण हम नदियों में दीपदान कर व दीपों से घाटों को सजाकर हम देवताओं के संग दीपावली मनाते हैं। एक अन्य कथा है कि राजा त्रिशंकु को जब विश्वामित्र ने अपने तपोबल से स्वर्ग पहुंचा दिया, तो देवताओं ने उन्हें स्वर्ग से नीचे गिरा दिया। अधर में लटकते त्रिशंकु की पीड़ा विश्वामित्र से देखी नहीं गई। यह उनका भी अपमान था। इससे क्षुब्ध होकर एक नए संसार की रचना करनी शुरू कर दी। माना जाता है कि कुश, मिट्टी, ऊंट, बकरी-भेड़, नारियल, कद्दू, सिंघाड़ा जैसी चीजें उन्होंने ने ही बनाई थी। यहां तक कि उन्होंने त्रिदेवों की प्रतिमाएं बनाकर उसमें प्राण फूंक दिए थे। नतीजा यह हुआ कि प्रकृति में असंतुलन पैदा हो गया। सारा चराचर जगत अकुला उठा। बाद में जब देवताओं ने इस प्राकृतिक असंतुलन की ओर विश्वामित्र का ध्यान आकृष्ट कराया, तो उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ। इन दोनों कथाओं, ऐतिहासिक आख्यानों का निहितार्थ अगर खोजें, तो यही है कि हमें प्रकृति को असंतुलित होने से बचाना होगा। देव दीपावली एक अवसर के समान है कि हम पर्यावरण के यज्ञ में अपनी भी आहुति देने का संकल्प लें। करोड़ों लोगों को जीवन देने वाली अधिकांश नदियों का पानी आज प्रदूषण के कारण उपयोग योग्य नहीं रह गया है। आक्सीजन की मात्रा कम होने से जलीय जीव विलुप्त हो रहे हैं। ऐसे में देव दीपावली जैसा पावन पर्व संदेश देता है कि नदियों में दीपदान कर हमें उन्हें सुरक्षित, संरक्षित और जीवनदायिनी बनाने में योगदान देना चाहिए। हम अपनी नदियों को प्रदूषण मुक्त करने का संकल्प लेकर देवताओं के साथ उनकी दीपावली मना सकते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार तारकासुर नाम का एक राक्षस था. उसके तीन पुत्र थे- तारकक्ष, कमलाक्ष और विद्युन्माली. भगवान शिव के बड़े पुत्र कार्तिक ने तारकासुर का वध किया। अपने पिता की हत्या की खबर सुन तीनों पुत्र बहुत दुखी हुए. तीनों ने मिलकर ब्रह्माजी से वरदान मांगने के लिए घोर तपस्या की ब्रह्माजी तीनों की तपस्या से प्रसन्न हुए और बोले कि मांगों क्या वरदान मांगना चाहते हो. तीनों ने ब्रह्मा जी से अमर होने का वरदान मांगा, लेकिन ब्रह्माजी ने उन्हें इसके अलावा कोई दूसरा वरदान मांगने को कहा। इसके बाद तीनों ने किसी दूसरे वरदान के बारे में सोचा और इस बार ब्रह्माजी से तीन अलग नगरों का निर्माण करवाने के लिए कहा- जिसमें सभी बैठकर सारी पृथ्वी और आकाश में घूमा जा सके। एक हजार साल बाद जब हम मिलें और हम तीनों के नगर मिलकर एक हो जाएं और जो देवता तीनों नगरों को एक ही बाण से नष्ट करने की क्षमता रखता हो, वही हमारी मृत्यु का कारण हो। ब्रह्माजी ने उन्हें ये वरदान दे दिया। तीनों वरदान पाकर बहुत खुश हुए. ब्रह्माजी के कहने पर मयदानव ने उनके लिए तीन नगरों का निर्माण किया. तारकक्ष के लिए सोने का, कमला के लिए चांदी का और विद्युन्माली के लिए लोहे का नगर बनाया गया। तीनों ने मिलकर तीनों लोकों पर अपना अधिकार जमा लिया. इंद्र देवता इन तीनों राक्षसों से भयभीत हुए और भगवान शंकर की शरण में गए. इंद्र की बात सुन भगवान शिव ने इन दानवों का नाश करने के लिए एक दिव्य रथ का निर्माण किया।
इस दिव्य रथ की हर एक चीज देवताओं से बनीं. चंद्रमा और सूर्य से पहिए बने. इंद्र, वरुण, यम और कुबेर रथ के चार घोड़े बनें. हिमालय धनुष बने और शेषनाग प्रत्यंचा बनें। भगवान शिव खुद बाण बनें और बाण की नोंक बने अग्निदेव. इस दिव्य रथ पर सवार हुए खुद भगवान शिव. भगवानों से बनें इस रथ और तीनों भाइयों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। जैसे ही ये तीनों रथ एक सीध में आए, भगवान शिव ने बाण छोड़ तीनों का नाश कर दिया. इसी वध के बाद भगवान शिव को त्रिपुरारी कहा जाने लगा। यह वध कार्तिक मास की पूर्णिमा को हुआ, इसीलिए इस दिन को त्रिपुरी पूर्णिमा नाम से भी जाना जाने लगा।
भगवान विष्णु और भगवान शिव के भक्त कार्तिक पूर्णिमा के दिन उपवास करते हैं, और सुबह जल्दी स्नान करके और कार्तिक पूर्णिमा व्रत कथा पढ़कर अपने दिन को प्रारम्भ करते हैं। यह कथा राक्षस त्रिपुरासुर के अंत की कहानी बताती है। प्राचीन हिंदू धर्म ग्रंथों में वर्णित है कि एक बार त्रिपुरासुर नामक एक दानव देवताओं को परास्त करने में सफल रहा और अंततः उसने पूरे विश्व पर विजय प्राप्त कर ली। ऐसा माना जाता है कि उसने अंतरिक्ष में तीन शहर बनाए और उनका नाम त्रिपुरा रखा। इस समय, भगवान शिव देवताओं को बचाने के लिए आए और इस राक्षस का अपने धनुष बाण से वध कर दिया और घोषणा की कि इस दिन को रोशनी एवं प्रकाश के त्योहार के रूप में मनाया जाएगा। कार्तिक पूर्णिमा को वृंदा की जयंती के रूप में मनाया जाता है, जिसे तुलसी के पौधे का मानवीय रूप माना जाता है। यह दिन भगवान विष्णु के मछली के रूप वाले अवतार मत्स्य के जन्मदिन का भी प्रतीक माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय का जन्म भी इसी दिन हुआ था। कार्तिक माह के अंतिम पांच दिनों को सबसे पवित्र दिन माना जाता है और भक्त दिन में केवल एक बार दोपहर में भोजन करते हैं, जिसे हबीशा के नाम से जाना जाता है।
हिंदू धर्म ग्रंथों में यह सही कहा गया है कि कार्तिक पूर्णिमा व्रत और पूजा अर्चना, धर्म, कर्म और मोक्ष का मार्ग प्रदान करती है। (हिफी)हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews https://www.facebook.com/divyarashmimag

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