किलाबंदी की तरह फाटकों में सुरक्षित गयाजी
डॉ रामकृष्ण मिश्र
गयाजीभारत की एख सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक नगरी है।यहाँ व विश्व के कोने कोने से सनातनी अपनी आस्था और विश्वास की प्रेरणा से आकर अपने फितरों के प्रति श्रद्धा निवेदित करते हैं।
इस नगरी का जो स्वरूप आज दिख रहा है ,वही पूर्ब काल में नहीं था। ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में भारत पर मुसलमानों के द्बारा हुए आक्रमणों का विध्वंशक प्रभाव गयाजी पर भी समय -समय पर पड़ता रहा
उसकाल में भौतिक संसाधानों का अभाव था।आजादी के बहुत पहले तक यहाँ आने वाले भारतीयों के आवागमन के लिए पैदल या घोडे़ ही साधन के रूप में रहे होगे ।
१११३ई में बख्तियार खिलजी के आक्रमण और संस्कृति विनाशक दुर्वृत्ति से गयाजी भी अछूता न रह सका।नालंदा केतहस नहस के बाद बोधगया के प्रति विनाशकारी दौरे के क्रम में इस क्षेत्र में भी धार्मिक स्थलों का विध्वंशन प्रतिमाओं का विखण्डन,अंग भंजन करता गया। उस समय भय का ऐसा वातावरण बना कि यहाँ के तीर्थ पुरोहित कहे जानेवाले गयापाल लोग आस पास के गाँवों में जाकर बस गए। संपूर्ण क्षेत्र धार्मिक विद्वेष और असहिष्णुता की आग में जलने लगा था।यहाँ की आवादी घटने लगीऔर यात्रियों की संख्या भी क्षीण होने लगी यी। तभी उदयपुर के राणा लक्षा का गया आना हुआ। तातारियों से युद्ध में उनकी वीर गति होना अत्यंत दुखद घटना थी। किंतु उनके वंशजों की छठी पीढी तक ने तातारियों के साथ संघर्ष जारी रखा।जब राणा सांगा जो१५०९ईमे उदरपुर के राजा हुए,गया को तातारियों से मुक्त कराया।
औरंगजेब के दिल्ली तख्त पर बैठनै के बाद भी गयापालों की आर्थिक तथा सामाजिक, स्थिति में बहुत सुधार नहीं हुआ।
एक सुखद घटना घटी।औरंगज़ेब के काल में ही गयापालों के जीवन में एक सूखद मोड़ आया।इसे बहुत महत्वपूर्ण कहा जा सकता है।
गयापाल सीताराम चौधरी के बड़े पुत्र थे शहरचंद चौधरी। वे बड़े मेधावी प्रति उत्पन्नमति वाले, गायक,एवं कलाकार थे। उन्होंने अपने समाज की तंगहाली और पीड़ा का अनुभव किया। उस समय जजिया टैक्स के कारण यात्रियों केआगमन की क्षीणता से लोग आर्थिक तंगी झेल रहे थे।इनकी जीविका का साधन यात्रियों के द्बारा दान में प्राप्त धन ही होता था।अत:अपने समाज की आर्थिक दुर्दशा में सुधार केलिए औरंगजेब से मिलने का निश्चय किया।येन केन प्रकारेण शज्ञर चंद दिल्ली की ओर प्रस्थान कर कई माह के प्रयास के पश्चात् औरंगजेब से मिलने की युक्ति तलासने लगे।स्वयं गायक और कलाकार थे ही,दिल्ली दरवार में प्रवेश संभव हुआ ।दरवार के लोग भी इनसे अधिक प्रभावित हुए। खुद औरंगज़ेब भी इनसे संतुष्ट हुआ।अपनी प्रतिभा और कौशल के उपयोग से इन्होंने औरंगजेब की बेगम तक पहुँच बनाई।मलिका के संपर्क मे आने से इनकी स्थिति और अनुकूल हो गयी।अपने उद्देश्य की सफलता के लिए इन्हे इच्छा के विपरीत इस्लाम स्वीकार करना पड़ा।जैसे लोक कल्याण के लिए शिवजी को विषपान करना पड़ा था,उसी तरह।
परिणामत:गयाजी में इन्हे चार हजार बीघा जमीन
मुगल बादशाह औरंगजेब से मिली साथ ही जजिया कर से मुक्ति भी मिल गई। इस सुखद सफलता के साथ शहरचंद चौधरी गया लौटे परन्तु शहरचंद नहींं शहरयार बनकर।
गया आकर उंन गयापालों को जो भय से आसपास के गाँवों मे बस गए थे, पुन:लौट कर गया में ही रहने का आग्रह किया। फिर तो धीरे धर सभी गयापाल यहाँ आकर बस गए।हाला कि वे आपने पूर्वजों की दुर्दशा से अब भी भय भीत ही थे। फलत: बाहरी आक्रमण या किसी अनाहूत दुर्घटना से सुरक्षित रहने केलिए पूरे क्षेत्र की दीवारों से घेराबंदी करा दी गई और निकास केलिए चार द्बार बनवाए। जिनमें तीन का भग्नावशेष आज भी साक्षी है। दक्षिण में दक्षिण दरवाजा,पश्चिम मे चांद चौरा के पास,उत्तर में ब्राहमणी घाट सेनजी की ठाकुरवाड़ी के पास और पूरब में ऊपरडीह में।उन दिनों रात में कपाट बंद हो जाते थे। आज तो कपाट ही नहीं दिखाई पड़ता।
इन्ही फाटकों के बीच का आवासीय क्षेत्र प्राचीन गयाजी अथवाअंदर गया के नाम से प्रसिद्ध है।
इस क्षेत्र में गलियों की संख्या अधिक हैजो सभी आवासों को जोड़ती है। जल निकासी केलिए नालियाँ बीच रस्ते से गुजरती हैं जो प्राय:ढालवाँ हैं।उनकी बनावट पक्की है। घरों के मुख्य दरवाजे,चौखट मजबूत लकड़ियो के खूब सुन्दर नक्कासीदार आज भी मिल जाएंगेः।
प्राचीन वास्तुकला के अवशेष आज भी पुराने घरों में सुरक्षित हैं।छतें मजबूत लकडी की सिल्लियों के ऊपर पतली पट्टियों पर सुर्खी चूने से ढली वातानुकूलित सुख देने का काम करती हैं। वातायन और गवाक्ष प्राचीन वास्तुकला के अप्रतिम उदाहरण हैं।
एक मुख्य मार्ग जो उत्तर (फाटक) दरवाजा से दक्षिण( फाटक )दरवाजा तक था जिसका विस्तार अंग्रेजी शासन काल में राम शिला तक हुआ।आरंभ में यह दीर्घीकरण चौक टावर(घंटाघर)तक था
प्राचीन गया की गतियाँ प्राय:संकीर्ण हैं।लगता है पहये ये गुप्त मार्ग की तरह थीं जो किसी एक भवन में समा जाती थीं।ये गतियाँ प्राय:घुमावदार हैं।प्रतिरक्षा की दृष्टि से इनका बहुत महत्व रहा हो।
फल्गु नदी के पश्चिम और विष्णुपद मंदिर के वायव्य कोण पर स टे एक विस्तीर्ण षटकोणीय तालाव है ।छठ व्रत के अवसर पर संध्याकाळीन अर्घ से भगवान सूर्य की अर्चना की जाती है। इसे दक्षिण मानस के नाम से भी जानते हैं।यहाँ पाँच वेदियाँ (पंचतीर्थ)हैं जहॉ पिंड दान होता है।
इस तालाव में पानी की कमी न हो इस केलिए जलभराव की व्यवस्था की गयी है।यह स्नान एवं तैराकियों के लिए बहुत उपयोगी है। तालाव के किनारे भगवान सूर्यदेव का मंदिर हैजिसमें पूव मुखी भगवान का विशाल विग्रह स्थापित है।रविवार को यहाँ साधकों आराधकों का जुटना स्वाभाविक है।गयाजी की विशेषताअद्भुत है कि यहाँ हर तीस चालीस कदम पर एक महल्ला बन जाता है।जैसे दक्षिण दरवाजा, सिसौरियाचौरा, कृष्णद्बारिका, चंदन दु्र्गा,पिंडबेची, पचमहला,काठगच्ची आदि।इनकी कुल दूरी शायद आधा कि मी हो।स्वतंत्रता आंदोलन के पश्चात समग्र विकास की हवा में इस क्षेत्र का भी विकास हुआ।पारंपरिक सोच और आचरण में अनेक परिवर्तन दिख रहे हैं। संगीत,कला,साहित्य के अतिरिक्त कुस्ती की परंपरा के ंअंश आज भी द्रष्टव्य हैं।
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