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भगवान शिव : सनातन धर्म

भगवान शिव :  सनातन धर्म 

सत्येन्द्र कुमार पाठक 

    वेदों , स्मृतियों , पुरणों में   शिव पुराण में भगवान शिव सृष्टि और प्रलय का रूप  है । शिव पुराण और लिंग पुराण में  शिव अजन्मा और जीवों , वनस्पतियों , जंतुओं   देवों  की उत्पत्ति एवं सृष्टि  कारक  है । शिव के अट्ठाईस अवतारों के संबंध में  शिव पुराण के  " वायवीय संहिता " और लिंगपुराण में वर्णित है। ब्रह्मा,  विष्णु  और  रुद्र    कारणात्मा और  चराचर जगत् की सृष्टि,  पालन और  संहार और  साक्षात्  महेश्वर  से प्रकट हुए हैं । ब्रह्मा की सृष्टि कार्य में  , विष्णु की रक्षा कार्य में तथा रुद्र की संहारकार्य में नियुक्ति हुई थी ।भव कल्प में  परमेश्वर शिव से रुद्र , ब्रह्मा और नारायण की सृष्टि प्रारम्भ हुई  थी ।  भुवः  कल्प में  ब्रह्मा ने रुद्र तथा विष्णु को उत्पन्न किया था । तप: कल्प में   भगवान् विष्णु ने  रुद्र तथा ब्रह्मा की सृष्टि हुई थी  ।विष्णु का सप्तम वाराह कल्प चल रहा है । याने  7 × 4 ( चतुर्युग )  =  28 , अभी अठाईसवां  चतुर्युग चल रहा है । 1000   चतुर्युग बीतने पर कल्प बदलने पर   ब्रह्मा जी का एक दिन कहलाता है । श्वेत कल्प में भगवान शिव के  28  अवतारों में प्रथम अवतार  श्वेत था । वराह कल्प में भगवान विष्णु का प्रथम अवतार वाराह है ।   श्वेत कल्प से पूर्व ब्रह्मकल्प   " विश्व  रुप कल्प ब्रह्मांड " ब्रह्मा को समर्पित था । ऋषि - महर्षियों ने  अठारह पुराणों की कुल श्लोक संख्या चार लाख है ।  कल्प विवरण -    ब्रह्म लोक का एक सहस्र चतुर्युग   43,20,000  मानवीय वर्ष  × 1,000  =  4,32,00,00,000  ( चार अरब बत्तीस करोड़  मनुष्य  वर्ष )  को एक कल्प कहते हैं ।  प्रत्येक ब्रह्मा की आयु सौ वर्ष निर्धारित  है । अतः  30 × 12 =  360 × 100 = 36,000 कल्प एक ब्रह्मा के लिए है ।   ऋषि  - महर्षियों  ने वायु पुराण  द्वारा  35 कल्पों का निर्धारण किया है । ( 1 )   भव कल्प  ;( 2 )   भुव कल्प  ; ( 3 )   तपः कल्प  ;( 4 )   भव  कल्प  ;  ? (1)( 5 )   रम्भ कल्प  ;( 6 )   ऋतु  कल्प  ;( 7 )   क्रतु  कल्प  ;( 8 )   वह्नि  कल्प  ;( 9 )   हव्य वाहन कल्प  ;(10)   सावित्र  कल्प  ;(11)   भुवः  कल्प  ;(12)   उशिक  कल्प  ;(13)   कुशिक  कल्प  ;(14)   गान्धार  कल्प  ;(15)   ऋषभ  कल्प  ;(16)   षड्ज कल्प  ; (17)   मार्जालीय  कल्प ;(18)   मध्यम  कल्प  ;(19)   वैराजक  कल्प  ;(20)   निषाद  कल्प  ;(21)   पञ्चम  कल्प  ;(22)   मेघ वाहन  कल्प  ;(23)   चिन्तक  कल्प (24)   आकूति कल्प  ;(25)   विज्ञाति  कल्प  ; (26)   मन  कल्प  ;(27)   भाव  कल्प  ;(28)   वृहत्  कल्प  ; (29)   श्वेत  लोहित  कल्प  ;(30)   रक्त  कल्प  ;(31)   पीतवाशा  कल्प  ;(32)   कृष्ण  कल्प  ;(33)   विश्व रुप  कल्प  ;(34)   श्वेत  कल्प  और  (35)   वाराह  कल्प  है ।
शिव लिंग के प्रकार -  मिश्री(चीनी) से बने शिव लिंग कि पूजा से रोगो का नाश होकर सभी प्रकार से सुखप्रद होती हैं।
सोंठ, मिर्च, पीपल के चूर्ण में नमक मिलाकर बने शिवलिंग कि पूजा से वशीकरण और अभिचार कर्म के लिये किया जाता हैं।. फूलों से बने शिव लिंग कि पूजा से भूमि-भवन कि प्राप्ति होती हैं। जौं, गेहुं, चावल तीनो का एक समान भाग में मिश्रण कर आटे के बने शिवलिंग कि पूजा से परिवार में सुख समृद्धि एवं संतान का लाभ होकर रोग से रक्षा होती हैं। किसी भी फल को शिवलिंग के समान रखकर उसकी पूजा करने से फलवाटिका में अधिक उत्तम फल होता हैं।
 यज्ञ कि भस्म से बने शिव लिंग कि पूजा से अभीष्ट सिद्धियां प्राप्त होती हैं। यदि बाँस के अंकुर को शिवलिंग के समान काटकर पूजा करने से वंश वृद्धि होती है। दही को कपडे में बांधकर निचोड़ देने के पश्चात उससे जो शिवलिंग बनता हैं उसका पूजन करने से समस्त सुख एवं धन कि प्राप्ति होती हैं। गुड़ से बने शिवलिंग में अन्न चिपकाकर शिवलिंग बनाकर पूजा करने से कृषि उत्पादन में वृद्धि होती हैं। आंवले से बने शिवलिंग का रुद्राभिषेक करने से मुक्ति प्राप्त होती हैं। कपूर से बने शिवलिंग का पूजन करने से आध्यात्मिक उन्नती प्रदत एवं मुक्ति प्रदत होता हैं। दुर्वा को शिवलिंग के आकार में गूंथकर उसकी पूजा करने से अकाल-मृत्यु का भय दूर हो जाता हैं। स्फटिक के शिवलिंग का पूजन करने से व्यक्ति कि सभी अभीष्ट कामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ हैं। मोती के बने शिवलिंग का पूजन स्त्री के सौभाग्य में वृद्धि करता हैं। स्वर्ण निर्मित शिवलिंग का पूजन करने से समस्त सुख-समृद्धि कि वृद्धि होती हैं। चांदी के बने शिवलिंग का पूजन करने से धन-धान्य बढ़ाता हैं।. पीपल कि लकडी से बना शिवलिंग दरिद्रता का निवारण करता हैं।लहसुनिया से बना शिवलिंग शत्रुओं का नाश कर विजय प्रदत होता हैं। बिबर के मिट्टी के बने शिवलिंग का पूजन विषैले प्राणियों से रक्षा करता है। पारद शिवलिंग का अभिषेक सर्वोत्कृष्ट माना गया है।
जब भी हम किसी शिव मंदिर जाते हैं तो अक्सर देखते हैं कि कुछ लोग शिवलिंग के सामने बैठे नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहते हैं। ये एक परंपरा बन गई है। इस परंपरा के पीछे की वजह एक मान्यता है। मान्यता है जहां भी शिव मंदिर होता है, वहां नंदी की स्थापना भी जरूर की जाती है क्योंकि नंदी भगवान शिव के परम भक्त हैं। जब भी कोई व्यक्ति शिव मंदिर में आता है तो वह नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहता है। इसके पीछे मान्यता है कि भगवान शिव तपस्वी हैं और वे हमेशा समाधि में रहते हैं। ऐसे में उनकी समाधि और तपस्या में कोई विघ्न ना आए। इसलिए नंदी ही हमारी मनोकामना शिवजी तक पहुंचाते हैं। इसी मान्यता के चलते लोग नंदी को लोग अपनी मनोकामना कहते हैं। 
शिलाद नाम के एक मुनि थे, जो ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने उनसे संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद मुनि ने संतान भगवान शिव की प्रसन्न कर अयोनिज और मृत्युहीन पुत्र मांगा। भगवान शिव ने शिलाद मुनि को ये वरदान दे दिया। एक दिन जब शिलाद मुनि भूमि जोत रहे थे, उन्हें एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। एक दिन मित्रा और वरुण नाम के दो मुनि शिलाद के आश्रम आए। उन्होंने बताया कि नंदी अल्पायु हैं। यह सुनकर नंदी महादेव की आराधना करने लगे। प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और कहा कि तुम मेरे ही अंश हो, इसलिए तुम्हें मृत्यु से भय कैसे हो सकता है? ऐसा कहकर भगवान शिव ने नंदी का अपना गणाध्यक्ष भी बनाया।
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