जीवन
यह जीवन कैसा निर्झर है ?
झर-झर झरता हर इक क्षण है।
जब- तब दुःख की बदली आती
सुख की वर्षा फिर मदमाती।
दुःख में ग़म के आँसू चलते
सुख को आँखें ही बतलातीं।
जीवन का क्षण-क्षण कम होता
तब भी हर इक को ग़म होता।
कैसे हर ग़म को जीना है ?
दुनिया के विष को पीना है।
ग़म में भी जो मुस्काता है
अक़्सर खुशियों को पाता है।
हर जन में लोभ समाया है
तब मेरा मन घबराया है।
आख़िर इसका है अन्त कहाँ ?
बच गया कहीं भी संत कहाँ ?
विद्वज्जन से कुछ पाना है
जीवन को स्वर्ग बनाना है।
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