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गुरु-शिष्य परंपरा योजना और लोकसंस्कृति की वास्तविकता

गुरु-शिष्य परंपरा योजना और लोकसंस्कृति की वास्तविकता

-हृदय नारायण झा के अनुभवों के आलोक में

बिहार की समृद्ध लोकसंस्कृति सदियों से अपनी मौलिकता, सहजता और जनजीवन से गहरे जुड़ाव के लिए जानी जाती रही है। लोकगीत और लोकगाथाएं यहां केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक परंपराओं, संस्कारों और जीवन मूल्यों की जीवंत अभिव्यक्ति रही हैं। इन्हीं लोकपरंपराओं को संरक्षित और संवर्धित करने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा “मुख्यमंत्री गुरु-शिष्य परंपरा योजना” की परिकल्पना की गई। परंतु जब इस योजना को जमीनी अनुभवों की कसौटी पर परखा जाता है, तो कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आते हैं।

आकाशवाणी पटना के वरिष्ठ मैथिली लोकगायक एवं गीतकार हृदय नारायण झा के 36 वर्षों के अनुभव इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उनका स्पष्ट कहना है कि जिस “गुरु-शिष्य परंपरा” की कल्पना कर यह योजना बनाई गई है, वह लोकगीत और लोकगाथा की वास्तविक परंपरा से मेल नहीं खाती। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय मधुबनी जिले के ग्रामीण परिवेश में लोकसंस्कृति के बीच बिताया, जहां लोकगीतों की प्रस्तुति, अभ्यास और परंपरा को उन्होंने नजदीक से देखा। इसके बावजूद उन्हें कभी भी लोकगीतों में औपचारिक गुरु-शिष्य परंपरा का अस्तित्व नहीं दिखा।

उनके अनुसार, लोकगीत किसी विद्यालय या गुरुकुल की तरह नहीं सिखाए जाते थे। यह एक ऐसी विधा है जो कंठ से कंठ में, पीढ़ी दर पीढ़ी, स्वाभाविक रूप से प्रवाहित होती रही है। कलाकार एक-दूसरे से सीखते थे, सुनते थे, अभ्यास करते थे, लेकिन न तो कोई स्वयं को “गुरु” कहता था और न ही कोई औपचारिक “शिष्य” होता था। यही कारण है कि उन्होंने स्वयं भी किसी गुरु से शिक्षा प्राप्त नहीं की, बल्कि सुनकर और निरंतर अभ्यास के माध्यम से वर्ष 1990 में आकाशवाणी पटना की कठिन स्वर परीक्षा उत्तीर्ण की।

यदि हम बिहार की महान लोकगायिकाओं की ओर देखें, तो यह तथ्य और भी स्पष्ट हो जाता है। विन्ध्यवासिनी देवी जैसी प्रतिष्ठित लोकगायिका, जिन्हें लोकगीतों की “महागुरु” के रूप में सम्मानित किया जाता रहा, उन्होंने भी कभी औपचारिक गुरु-शिष्य परंपरा का संचालन नहीं किया। उनके पास सीखने आने वाली महिलाएं उन्हें स्नेहपूर्वक “चाची” कहती थीं और वे सभी को “बेटी” के रूप में संबोधित करती थीं। इसी प्रकार शारदा सिन्हा जैसी राष्ट्रीय स्तर की प्रसिद्ध लोकगायिका ने भी इस प्रकार की परंपरा को संस्थागत रूप देने का प्रयास नहीं किया। यह इस बात का संकेत है कि लोकगीतों की आत्मा औपचारिक संरचनाओं से परे रही है।

करीब तीन दशकों की सांस्कृतिक पत्रकारिता के अनुभव के आधार पर भी हृदय नारायण झा इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि न केवल ग्रामीण क्षेत्रों में, बल्कि राजधानी पटना सहित पूरे बिहार में लोकगीत या लोकगाथा में गुरु-शिष्य परंपरा का कोई ठोस उदाहरण देखने को नहीं मिलता। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है, जो यह दर्शाता है कि योजना बनाते समय शायद लोकपरंपराओं की वास्तविक प्रकृति को पर्याप्त रूप से समझा नहीं गया।

इस संदर्भ में एक और गंभीर चिंता उभरकर सामने आती है—लोकसंस्कृति के लुप्त होने का खतरा। कई वरिष्ठ लोकगाथा कलाकार, जो अपनी दुर्लभ विधाओं को अपने कंठ में संजोए हुए हैं, आज इस पीड़ा को व्यक्त कर रहे हैं कि उनके बाद उनकी कला को आगे बढ़ाने वाला कोई नहीं है। नई पीढ़ी में लोकगीतों के प्रति रुचि का अभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। ऐसे में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या केवल योजनाओं के निर्माण से इस धरोहर को बचाया जा सकता है, या इसके लिए जमीनी स्तर पर ठोस और यथार्थपरक प्रयासों की आवश्यकता है।

यद्यपि भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा नवोदित कलाकारों के लिए छात्रवृत्ति योजनाएं चलाई गई हैं, जिनमें कुछ वरिष्ठ कलाकारों को प्रशिक्षण देने का अवसर भी मिला, फिर भी यह प्रयास वास्तविक अर्थों में गुरु-शिष्य परंपरा का रूप नहीं ले सका। आज तक ऐसा कोई सशक्त उदाहरण सामने नहीं आया, जिसमें किसी लोकगीत परंपरा को किसी गुरु के शिष्य ने व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाया हो।

अंततः यह कहा जा सकता है कि “मुख्यमंत्री गुरु-शिष्य परंपरा योजना” एक अच्छी मंशा के साथ बनाई गई अवधारणा अवश्य है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि इसे लोकसंस्कृति की वास्तविक प्रकृति के अनुरूप कैसे ढाला जाता है। लोकगीतों की परंपरा को संरक्षित करने के लिए आवश्यक है कि योजनाएं कागजों से निकलकर वास्तविक जीवन से जुड़ें, कलाकारों के अनुभवों को महत्व दिया जाए और नई पीढ़ी को इस धरोहर से जोड़ने के लिए प्रेरित किया जाए।अन्यथा, वह दिन दूर नहीं जब लोकगीत और लोकगाथाएं केवल पुस्तकों और अभिलेखों तक सीमित रह जाएंगी, और वह जीवंत परंपरा, जो कभी जन-जन के कंठ में बसती थी, धीरे-धीरे इतिहास बन जाएगी।

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