मिजाज ए मौसम
आजकल मौसम का मिजाज मैं समझ नहीं पाता,
मुस्कुराता तो हूँ, लेकिन मुस्कुरा नहीं पाता।
आप पिलाते हैं और मै लड़खड़ाता नहीं,
वो पिलाते हैं और मैं सम्हल नहीं पाता।
उनकी फितरत और मेरी फितरत में है अंतर,
वो उजाले में मिलते नहीं, मैं अंधेरे में मिल नहीं पाता।
उनने दिल तोड़ दिया, रास्ता भी मोड़ लिया,
बावजूद इसके वो मेरे जिगरे से निकल नहीं पाता।
बदलते मौसम में ढलने की कला सब सीख गये,
इश्क के मौसम में बेकाबू दिल सम्हल नहीं पाता।
गर्मी, सर्दी, बारिस के असर मिलेंगे मुफलिसी के पैमानें में,
झोपड़ी में उठते धुएं के जख्मों को जमाना बदल नहीं पाता।
गमों के बाजार की महफिल मयखाने में जाकर देखें,
पैमाने दर पैमाने कें जाम को जमाना कुचल नहीं पाता।
वीराने में रोयें या आंसुओं के साज अपनों के बीच बजायें,
इश्क के बीमारों को जल्दी दवाखाना मिल नहीं पाता।
मैं मय की बौतल खोलूँ या शाकी से प्याला बनवाऊं,
जख्मों को सिल नहीं पाता, नगमों में घुल नहीं पाता।
राजेश लखेरा, जबलपुर, म.प्र.।
राजेश लखेरा, जबलपुर।
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