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मैं कलम से कल लिखूं या स्याही से आज लिखूँ

मैं कलम से कल लिखूं या स्याही से आज लिखूँ

मैं कलम से कल लिखूं या स्याही से आज लिखूँ,
गिरगिट से रंग बदलते कोरोना के राज लिखूँ।

गजल लिखूँ, गीत लिखूँ या कविता का आगाज लिखूँ।
कोरोना वारियर्स की रवानगी के अंदाज लिखूँ।

केवल चुनाव में मतदाता की खबर होती है,
फिर पूर पांच बरस उन सबकी  कटती
प्याज लिखूँ।

जिन झोपड़ी को जला महल बन गये हैं,
अमीरों की महफिल में मुफलिसी से बजते साज लिखूँ।

निर्भया के जख्मों को आशा के आंसू कैसे बरस भर टपके,
केंडिल मार्च लिखूँ या आवाम की चीखती आवाज लिखूँ।

जान देकर, जान बचाना हिन्दुस्तान में ही हैं मुमकिन,
नर्स, समाज सेवी लिखूँ, के पुलिस डाक्टर इम्तियाज लिखूँ।

गांव में बहिनों, माताओं, पिता के आंसू ठहरते नहीं,
तिरंगे में लिपटे शहीद को विधवा बहिन का सरताज लिखूँ।

कलम और धड़कन रात में भी नहीं ठहरती,
2020 के राज लिखूँ के 2021 बनें बादशाह बेताज लिखूँ।

राजेश लखेरा, जबलपुर, म.प्र.।
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