Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

यह भी कुक्कुर है।

यह भी कुक्कुर है।
******

मेरे एक मित्र हैं ।चीकु पाण्डे नाम है।बड़े ही सम्भ्रान्त और पैसे वाले रसूख वाले इंसान हैं।घर भी बहुत ही बढ़िया है उनका ।सरकारी नौकरी करते थे।अब अवकाश प्राप्त कर चुके हैं।अपनी पत्नी बच्चों के साथ अधिकांश समय अपने शानदार घर में ही व्यतीत करते हैं।दो गाय भी पाल रखे हैं।एक छोटा सा बगान भी है।इसमें रंग विरंगे मौसमी फूलों के पौधे भी लगा रखे हैं।फोन पर बराबर बातें होती रहती थीं।अनेक बार आग्रह किया था कभी आईये बैठकर साथ चाय पीयेंगे बहुत दिन हो गये हमलोगों के मिले हुये।नौकरी के चक्कर में समय मिला नहीं।बराबर भागदौड़ चलता रहा।अब निश्चिंत हुये हैं।कल मेरी भी इच्छा हुई चलें आज शाम की चाय चीकु भाई के साथ ही ली जाये।चल पड़ा कड़ाके की ठंढ में गरम चाय और पकौड़े की उम्मीद लिये चीकु भाई के शानदार घर को देखने और उनसे गप करने।ज्योंही दरवाजे पर पहुंचा एक जानवर को देखकर स्तब्ध रह गया।बिल्कुल शेर जैसी आकृति,शांत स्वभाव चुपचाप बरामदे में आ रही धूप का आनंद ले रहा था।मुझे देखकर एकबार गर्दन घुमाई एक लंबी साँस ली फिर गर्दन झुका लिया।मैं तो डर गया लेकिन बड़े से चौड़े पट्टे से बँधा देखकर राहत की साँस ली।दरवाजा पर लगा कालवेल बजाया सामने दरवाजा खोलते चीकु भाई की धर्मपत्नी नमस्कार करते अंदर आने का आमंत्रण देती प्रकट हो गईं।मैं भी उनके पीछे चलते हुये सजे धजे ड्राइंग रूम में करीने से सजे सोफे पर बैठ गया।इतने में अंदर से चीकु भाई की आवाज सुनाई पड़ी जो अपनी धर्मपत्नी से पूछ रहे थे,कौन आया है जी ?धर्मपत्नी जी ने जैसे ही मेरा नाम बताया चीकु जी लगभग दौड़ते हुये आये और जबतक मैं खड़ा होकर नमस्कार करने की सोंच ही रहा था अपने पुराने अंदाज में भर अकबार पकड़कर मुझसे लिपटते हुये बोले ,अरे बिना कुछ बताये अचानक से आ गये।खबर कर दिये होते गाड़ी भेजकर बुलवा लेते।पैदल क्यों कष्ट किया आपने।खैर छोड़िये कोई परेशानी तो नहीं हुई आने में।दरवाजे पर राकी ने परेशान तो नहीं किया।एक साथ इतने सारे सवाल सुन मैं मौन सोंचने लगा जवाब पहले किस प्रश्न का दूँ।मेरे सामने वाले सोफे पर बैठते हुये चीकु जी ने पत्नी को कहा जरा बढ़िया चाय और गरमागरम पकौड़े बना दो गोभी वाले।बहुत ठंढ है।बड़े दिनो बाद आज मिश्रा जी आये हैं।अब तक मैं मौन इनकी बातें सुन रहा था।अब बोलने की बारी को अपनी ओर मोड़ते हुये मैंने भी बातें शुरु की ।सोंचा पहले बाहर बँधे उस शेर की आकृति वाले जानवर के विषय में ही पूछ लूँ।मैने पूछा भाई जी बाहर ये कौन सा जानवर पाल रखा है आपने।ये नये तरह का शेर की आकृति वाला किस प्रजाति का जानवर है ,पहले ऐसा कभी नहीं देखा।बड़ा ही शाँत स्वभाव है।चीकु जी ने कहा अरे क्या हुआ राकी ने परेशान किया क्या?मैंने कहा कौन राकी मैं समझा नहीं मुझे किसी राकी से मुलाकात नहीं हुई।उन्होंने कहा अरे वही जिसके बारे में आप पूछ रहे हैं,उसी का नाम राकी है।बड़ा ही शैतान है।उसके रहते क्या मजाल कोई अंदर आ जाये।लेकिन एक बात है बड़ा ही समझदार कुक्कर है बेवजह किसी को परेशान नहीं करता।आदमी के पदचाप से ही अच्छे बुरे की पहचान कर लेता है।मैं तो आश्चर्यचकित हो गया ये सब सुनकर।मुझे तो विश्वास ही नहीं हो रहा था कि वह जिसे मैं कुछ और ही समझ रहा था वह कुक्कर है।क्योंकि मैने तो अबतक कुक्कर देखे थे जो गलियों में जहाँ तहाँ सड़कों पर किसी के भी दरवाजे पर बेवजह भौंकता फिरता है।हर जगह से डाँटकर भगाया जाता है फिर भी उसका बेवजह भौंकना बंद नहीं होता।कितना अंतर है इस कुक्कुर और उस कुक्कुर में।मैं इन्हीं विचारों में खोया सोंच रहा था कि चीकु जी की पत्नी गरम गरम चाय और पकौड़े लिये ड्राइंग रूम में उपस्थित हो गईं।उन्होंने भी हम दोनो की बातों को अबतक सुन लिया था।ट्रे को टेबल पर रखती बोलीं भाई साहब ये संस्कार का फर्क है।इसीलिये ये अब कुक्कुर नहीं राकी है ।वो आज भी कुक्कुर ही है।वह बाहर सड़क पर बेवजह भौंकता है और यह आदमी पहचान कर आवश्यकतानुरूप भौंकता है।
.......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
दिव्य रश्मि केवल समाचार पोर्टल ही नहीं समाज का दर्पण है |www.divyarashmi.com

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ