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मैं बहुत दुखी हूँ

मैं बहुत दुखी हूँ

मैं
बहुत दुखी हूँ
आपको सुखी देखकर
बहुत हाँथ पाँव मारे
सिर पटक पटक कर
फोड़ डाला अपना
फिर भी खुशी न मिली
क्योंकि मैं बहुत
दुखी हूँ
आपको सुखी देखकर
रोया चिल्लाया
हर किसी को अपना
दर्द बताया
भरी महफिल में
खूब धूम मचाया
पर
किसी ने मुझ पर
रहम नहीं खाया
दर दर जाकर भी
दुआ की भीख माँगी
पर मुराद पूरा नहीं हो पाया
किसी पर भी 
मेरी बातों का
सिक्का जम नहीं पाया
इसीलिये अब मैं
अंतर्मुखी हूँ
क्योंकि मैं बहुत
दुखी हूँ
आपको सुखी देखकर।
.......मनोज कुमार मिश्र"पद्मनाभ"।
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