संबंधो का हाल
आंखें खुली खुली रह जाती
संबंधों का हाल देख कर
पतझड़ के पीले पातों सा
अरमानों का हश्र हो गया
पाल पोस कर जिसे बढ़ाया
ताड़ बना और वक्र हो गया
भीतर बाहर आग लगी है
मौसम को बेहाल देखकर
शकुनी ही शकुनी दिखते हैं
चौसर चारों ओर बिछाए
ताक रहे कब नज़र हटे और
बगुला फिर से काम लगाए
तोता असमंजस में बैठा
बंद आंख की चाल देखकर
चेहरों पर हैं लगे मुखौटे
करते सदा दोमुही बातें
दिखने में गौरैया जैसे
चीलों वाली करते घातें
अब तो बया उदास हो गया
कपि के फूले गाल देखकर
बाबा बैठे हैं चौखट पर
दो रोटी की आस लगाए
अपने में हैं व्यस्त सभी जन
उन पे कोई नजर न जाए
मन ही मन मैं दुखी बहुत हैं
अपनी सही पाल देखकर
आंखें खुली खुली रह जाती
संबंधों का हाल देख कर
*
~जयराम जय
'पर्णिका'बी-11/1, कृष्ण विहार,आवास विकास कल्याणपुर-20 8 017(उ प्र)
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