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नई शिक्षा नीति में भारतीय प्राचीन शिक्षा पद्धति का स्थान

नई शिक्षा नीति में भारतीय प्राचीन शिक्षा पद्धति का स्थान

डॉ सच्चिदानान्द प्रेमी
प्राचीन भारतीय संस्कृति की शिक्षा नीति अति ही प्राचीन है और यही कारण है कि जब संपूर्ण संसार में अंधकार था उस समय हमारे यहां शिक्षा का सूरज अपनी चरम सीमा पर जगमगा रहा था ।नए- नए शोध कार्य किए जा रहे थे ।इसकी आवाज चतुर्दिक खिल रही थी ।धर्म अध्यापक के रुप में धर्म- अध्यात्म का क्षेत्र हो या ज्ञान विज्ञान का, गणित ,ज्योतिष का, गणित- ज्यामिति का, ज्योतिष और सामुद्रिक शास्त्र का, युद्ध शास्त्र का या प्रेम शास्त्र का सभी क्षेत्रों में ऋषि अपनी कुटिया में ही केंद्र बनाकर अनुसंधान का कार्य कर रहे थे। प्राचीन शिक्षा प्रणाली में अध्यात्म का बड़ा ही महत्व था। वेदों में वेदों को ज्ञान कहा गया है।साक्षात ज्ञान के दर्शन हमारे ऋषि करते थे। इसलिए भारतीय शिक्षा पद्धति आज की शिक्षा पद्धति से विभिन्न शिक्षा क्षेत्रों के लिए भिन्न या विशेष हुआ करती थी। महर्षी अंगिरा इसी परम्परा के भारतीय संस्कृति में महान ऋषि हुए। वैसे कुछ हमारे ख्यात ऋषि हैं जिनकी आवश्यकता के अनुसार सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी ने उत्पन्न किया था ,इसलिए ब्रह्मा जी के मानस पुत्र कहलाए । उन्हीं मानस पुत्रों में महर्षि अंगिरा का नाम आता है ।अपनी प्रखर बुद्धि के कारण महर्षी अंगिरा ब्रह्मा जी के समतुल्य हो गए थे,जिससे इन्हें प्रजापाति कहा गया । इनका तेज और प्रभाव अग्नि की अपेक्षा में तिब्रतर था ।इसलिए अग्नि ने इनसे प्रार्थना की - मैं आपके तेज की तुलना में अपेक्षाकृत न्यून होने की स्थिति में हूं, मेरा तेज आपके सामने फीका पड़ गया है ।अब मुझे कोई अग्नि नहीं कहेगा। तो महर्षि अंगिरा ने ब्रह्मा की अनुमति से देवताओं को हविश पहुंचाने का कार्य स्वीकार कर लिया और अग्नि को पुत्र रूप में वरन किया ।कल्प भेद से ऐसी कथा भी आती है कि अंगिरा अग्नि के पुत्र हैं। प्रजापति की पुत्री स्मृति थी जिनसे अनेक पुत्र और कन्याएँ उत्पन्न हुए । महर्षी अंगिरा की शिक्षा नीति इनके द्वारा उद्धृत ग्रंथ अंगिरा स्मृति में संग्रहित है। इन्होंने धर्म और राज्य व्यवस्था पर बहुत काम किया है ।महर्षि अंगिरा ऋग्वेद के नवम मंडल के दृष्टा माने जाते हैं इस अनुमंडल में 114 सूक्त निबद्ध हैं जो पवमान कहे जाते हैं ।इस धर्म से ये सभी सूत्र पवमानी हो गए । अंगिरा स्मृति के अनुसार आदि काल में अन्य प्राचीन काल में शिक्षा संस्कार आधारित हुआ करती थी ।शिक्षा का मुख्य उद्देश्य संस्कार वनाना ।था पुंसवन संस्कार से लेकर श्राद्ध संस्कार तक की व्यवस्था महर्षि अंगिरा ने की है ।उनके अनुसार शिक्षा का मुख्य आधार वेद हुआ करता था ।महर्षि अंगिरा ने अंगिरा स्मृति लिखकर मनुष्य को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया है। संस्कार के बिना शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार महर्षि नहीं देते हैं ।महर्षि जातिवाद को नहीं मानते और समाज में सुदृढ स्थिति लाने के लिए एक सूत्र देते हैं जिसके अनुसार जाति स्थाई होती है,परंतु वर्ण स्थाई नहीं होता । व्यक्ति अपने कर्तव्य से वर्ण वदल सकता है ।विशेष के लिेए महर्षि अंगिरा स्मृति देखी जा सकती है ।
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