पीपलःकुछ और बातें
पिछले प्रसंग में पीपल की औषधीय गुणों पर प्रकाश डाला गया, साथ ही उसके पर्यावर्णीय प्रभाव की भी चर्चा की गयी थी। इस सम्बन्ध में कुछ बन्धुओं की अन्य जिज्ञासायें और समस्यायें भी सामने आयी हैं, जिन पर पुनः चर्चा कर रहा हूंँ।
पीपल की कुछ अजीब विशेषतायें हैं— जैसे इसके बीज को यदि आप जमीन में बोयें, तो जल्दी उगेंगेनहीं, किन्तु उसके पके फलों को चिड़ियां खाती है और फिर उसके मल (बीट) से सहज ही वृक्ष उग आते हैं। ये गुण पीपल, वट, गूलर, पाकड़ आदि उदुम्बर जातीय वृक्षों में समान रुप से पाया जाता है। इसका परिणाम होता है कि घर की दीवारों, छतों या अन्य अवांछित जगहों पर ये स्वतः ही उग आते हैं और इनमें जीवनी शक्ति इतनी अधिक है कि बारबार ऊपर से नष्ट करने पर भी जड़मूल से समाप्त नहीं होती। जिसका खामियाजा मकानों को भुगतना पड़ता है।
मैंने अपनी पुस्तक पुण्यार्कवास्तुमंजूषा में इस पर विशेष प्रकाश डाला है।
घर के अन्दर-बाहर इस प्रकार के किसी भी वड़े वृक्ष का होना वास्तुनियमों के साथ-साथ और कारणों से भी हानिकारक है। अतः जैसे ही उगता हुआ दीखे, तुरत जड़ से ऊखाड़ फेंकना चाहिए। क्यों कि थोड़ा भी बड़ा हो जाने पर नष्ट करना बहुत मुश्किल है। किन्तु धर्मभीरु (धार्मिक आस्थावान) लोग ऐसा करने से भी हिचकते हैं। ये सही है कि सृष्टि के कण-कण में ईश्वर का वास है। पीपल-वट आदि की पवित्रता और भी महत्त्वपूर्ण कही गयी है। किन्तु ऐसा नहीं है कि इसे हम घर में उगने-बढ़ने दें। तत्काल इसे नष्ट करने से होने वाले पाप के डर से, हम भविष्य में होने वाली अन्य परेशानियों को निमंत्रण न दें। किन्तु हां, इसे अनादर पूर्वक उखाड़कर कूड़ेदान में फेंक देना भी उचित नहीं है। किसी दिन संध्या समय हल्दी मिला हुआ चावल और थोड़ा जल लेकर पौधे के पास जायें और प्रार्थना पूर्वक अनुनय करें कि आप कृपया यह स्थान छोड़ दें। मैं आपका विसर्जन करना चाहता हूँ।। अगले दिन उसे उखाड़ कर जल में प्रवाहित कर दें, अथवा मिट्टी में गाड़ दें।
पौधा यदि बड़ा हो गया हो, तो उसे विशेष विधि से विसर्जित करना होगा। सर्वप्रथम किसी योग्य ब्राह्मण से वैदिक वा तान्त्रिक रीति से विधिवत पूजा करायें। पूजा में संकल्प वाक्य हो कि मैं इस वृक्ष का समादर पूर्वक विसर्जन करना चाहता हूँ, अतः इस पर वास करने वाले सभी देव, किंन्नर, यक्ष, गन्धर्व, भूत, प्रेत, बेतालादि गण कृपया अपना अन्यत्र ठौर बनावें और मेरा कल्याण करें। इस प्रकार पूजन-प्रार्थना के पश्चात कच्चे दूध का अर्घ्य प्रदान करें वृक्ष की जड़ में। अब प्रत्येक दिन संध्या समय तिलतेल का दीपक जलावें- कम से कम एक सप्ताह तक और प्रातः काल हो सके तो दूध का अर्घ्य भी दे दिया करें। अर्घ्य और दीपदान के समय भी अपनी प्रार्थना मन ही मन दुहराते रहें। सात दिनों की इस क्रिया के बाद, अगले सात दिन कुछ न करें। सिर्फ निरीक्षण-परीक्षण करते रहें कि वृक्ष की क्या स्थिति है। मैंने अपने अनुभव में बहुत बार पाया है कि सही ढंग से पूजा और विसर्जन की क्रिया, दीपदान, अर्घ्यदान आदि हो जाने पर, सप्ताह दस दिन में पौधा स्वयं सूखने लगता है। सूखजाने के बाद काटना बिलकुल हानिकारक नहीं है। बहुत बार ऐसा भी होता है कि पौधा जल्दी सूखता नहीं। वैसी स्थिति में इक्कीस दिनों तक प्रतीक्षा करने के बाद, पौधे को काटा जा सकता है। काटने के बाद उसकी लकड़ी में से थोड़ा अपने पास जरुर रखलें और किसी रविवार या गुरुवार को घी मिश्रित सूखी लकड़ी से एकसौआठ आहुति (हवन) प्रदान करें। अग्निवास-विचार करके होम-कार्य अन्य दिनों में भी कर सकते हैं।
समाज में प्रायः देखने को मिलता है कि पीपल-वट आदि वृक्षों से तरह-तरह की परेशानी भोगते रहते हैं, किन्तु डर के कारण काट-कूट नहीं करते।
पीपल का वृक्ष घर से पश्चिम दिशा में (कम से कम 21फीट दूर ) हो तो काफी लाभदायक होता है। जब कि अन्य दिशाओं में अति हानिकारक। वटवृक्ष के साथ ठीक इसका उल्टा नियम है, यानी पूर्व दिशा में लाभदायक है। गूलर दक्षिण दिशा में लाभकारी है और पाकड़ उत्तर दिशा में।
अब बात करते हैं स्पर्श करने ना करने की। ध्यान रहे कि पीपल साक्षात भगवान विष्णु का प्रतीक है। विष्णु हैं, तो उनके साथ लक्ष्मी भी होंगी ही। और लक्ष्मी-नारायण जहांँहै, वहांँअन्य सभी देवता उन्हें घेरे रहेंगे ही। शनिदेव का भी बहुत गहरा सम्बन्ध है विष्णु से—इस बात पर बहुत लोग चौंकेंगे। पर बात सही है। यही कारण है कि विष्णु ने अपने प्रिय वृक्ष में उन्हें भी आश्रय दिया है। विशेष कर शनिवार को । इसका ये अर्थ नहीं कि शनिवार को सिर्फ शनि ही वहांँहैं, बाकी लोग नहीं हैं। या अन्य दिनों बाकी लोग हैं, शनि नहीं हैं। हां, शनि के निमित्त कुछ करना है, तो शनिवार को ही करेंगे—पीपल में गुड़ मिश्रित जल डालेंगे, तिलतेल का दीपक दिखायेंगे इत्यादि। विष्णु के निमित्त करना हो तो किसी भी दिन करेंगे, उसमें कोई भेद नहीं है। ऐसा नहीं कि शनिवार को जल देंगे, तो उसे शनि छीन-झपट लेंगे और विष्णु को नहीं मिलेगा। क्रिया करने वाले की भावना पर निर्भर है कि वह क्या कर रहा है और क्यों कर रहा है। कहने का मतलब ये है कि यदि किसी व्यक्ति ने नियम बना रखा हो नित्य जल-दीप आदि प्रदान करने का, तो उसे नियमित करना ही चाहिए। विष्णु ही नहीं सभी देवता प्रसन्न होंगे। यक्ष, राक्षस, गन्धर्व भी आशीष देंगे।
अब बात करते हैं पीपल में दरिद्रा के वास की। इस सम्बन्ध में बड़ा ही रोचक पौराणिक प्रसंग है। ज्ञातव्य है कि लक्ष्मी की बड़ी बहन है दरिद्रा। समुद्र मन्थन से प्राप्त लक्ष्मी के साथ ही दरिद्रा को भी भगवान विष्णु ने अंगीकार किया, क्यों कि विष्णु को विश्वम्भर कहा गया है। यानी सबके लिए समान धर्मी हैं। किसी के प्रति भेदभाव नहीं है। परन्तु लक्ष्मी को ये मंजूर नहीं हुआ।
संक्षेप में कथा ये है कि काफी समझाने-बुझाने के बाद, बात नहीं बनी, तो विष्णु ने एक रास्ता निकाला—दरिद्रा को पीपल वृक्ष के तने में स्थान दे दिया और प्रत्येक शनिवार की रात्रि को उसके साथ बिताने का वचन दिया। अब, रविवार को प्रातः सूर्योदय से पूर्व यदि कोई पीपल के पास जायेगा तो विष्णु के साथ दरिद्रा का दर्शन भी होगा ही। यही कारण है कि सांसारिक लोग दूर भागते हैं उस दिन। किन्तु रहस्यमय बात ये है कि जो विष्णु का परम भक्त होगा, उसे तो हर हाल में विष्णु चाहिए, वो दरिद्रा पति हों या कि लक्ष्मी पति। और विष्णु की ही कृपा हो जायेगी जिस पर, उसे बेचारी दरिद्रा क्या बिगाड़ लेगी। और सबसे बड़ी बात है कि सच्चे भक्त को हानि-लाभ, सुख-दुःख, जय-पराजय, निन्दा-स्तुति से क्या मतलब ! वह तो निरा भक्त होता है- अबोध बालक जैसा।
पीपल की चायःअद्भुत रक्षक
पवित्र पीपलवृक्ष से शायद ही कोई भारतीय अपरिचित हों। संस्कृत में इसे ‘अश्वत्थ’ वृक्ष कहा गया है। हम भारतीय सनातन पर्यावरण-प्रेमी और रक्षक रहे हैं। पर्यावरण को धर्म का प्रधान अंग माना गया है। नदी, पर्वत, वृक्ष सबमें हमने ईश्वरीय सत्ता का दर्शन किया है और तत्प्रतीक स्वरुप उन्हें नित्य पूजा है। इनमें पीपल और तुलसी सर्वाधिक उच्च श्रेणी में कहे गये हैं। गीता में श्रीकृष्ण ने ‘अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां’ कह कर पीपल की महिमा को और भी महत्त्वपूर्ण बना दिया है। तुलसी को तो विष्णु ने अपना अर्धांगिनी ही कहा है। बिना तुलसी पत्र के कोई भी पूजा अधूरी है।
वस्तुतः ये दोनों वैज्ञानिक दृष्टि से भी अति श्रेष्ठ हैं। इनकी मर्यादा के पीछे सृष्टि का सहज कल्याण भाव छिपा है। प्रायः वस्तुओं को धर्म से जोड़ रखने के पीछे भी यही उद्देश्य है—धर्मप्राण देशवासी इनकी रक्षा करेंगे और ये हमारी रक्षा करेंगे।
पीपल में अनेक औषधीय गुण हैं। शरीर के लगभग सभी संस्थानों पर इसका प्रत्यक्ष-परोक्ष सुप्रभाव है। खासकर यकृत (लीवर), वृक्क (किडनी), हृदय, मस्तिष्क पर तो विशेष रुप से।
अभी हाल के एक स्वास्थ्य-सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ है कि हमारे देश में प्रतिवर्ष लगभग दो लाख किडनी फेल्योर के केस दर्ज हो रहे हैं। यह आंकड़ा बहुत ही दुःखद और चिन्ताजनक है। किडनी की बीमारी बहुत तेजी से फैल रही है, जिसके लिए हमारा खान-पान, रहन-सहन ही मुख्य रुप से जिम्मेवार है। गड़बड़ी का मुख्य कारण- कुछ तो लाचारी है और कुछ लापरवाही भी। आधुनिकता की अंधीदौड़ सबसे बड़ा कारण है। खाद्य-सामग्री-उत्पादन से लेकर सेवन-प्रक्रिया तक इसके लिए जिम्मेवार है। विविध रसायनों का अन्धाधुन्ध प्रयोग कैंसर आदि विभिन्न घातक बीमारियों का मुख्य कारण है।
खैर,यहांँहम एक अतिसरल विशुद्ध भारतीय उपचार सुझा रहे हैं। इसका प्रयोग करके विभिन्न घातक बीमारियों से बचा जा सकता है। शरीर की अशुद्धियों(विष) को बाहर निकालने में काफी सहायक है यह प्रयोग।
पीपल के प्रौढ़वृक्ष या पुराने (बिलकुल नये वृक्ष नहीं) की अन्तःछाल (ऊपरवाला बिलकुल सूखा छिलका नहीं, बल्कि थोड़ा भीतर वाला) का 5-10ग्राम टुकड़ा एक गिलास पानी में डाल कर चाय की तरह उबालें और पीयें। काढ़े का स्वाद ग्रहण योग्य है, फिर भी यदि अच्छा न लगे तो इच्छानुसार गुड़ या सेन्धानमक मिलाया जा सकता है। इस प्रयोग को प्रातः-सायं चाय की तरह ही अपने रुटीन मे शामिल कर लें। किडनी की रक्षा और सफाई के लिए यह अद्भुत प्रयोग है। पुरुषों की धातुक्षीणता, स्त्रियों की ल्यूकोरिया आदि में भी विशेष लाभकारी है।अस्तु।
।।ऊँ श्री कृष्णार्पणमस्तु।।


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