उमर पचपन में, बचपन की मिशाल याद आती है,
गोधूलि की सौधी महक और सांझ की चौपाल याद आती है।
गांव की पगडंडी, खेत की मेड़, खलिहान की बाड़ी,
कल्लू चाचा की झोपड़ी मल्लू दादा की टूटी दीवाल याद आती हैं।
होली की फाग, मुहाल-मुहाल आसमान छूती आग,
घर-घर छनती भांग और कस्बे में उड़ती गुलाल याद आती है।
गिल्ली डंडा, पिट्टू, कबड्डी, खो-खो, कंचा-गोली,
अखाड़े में पहलवानी, कुश्ती, बालीबाल याद आती है।
स्कूल में राष्ट्रीय त्यौहार, सास्कृतिक कार्यक्रम की बौछार,
गांव में निकली प्रभात फेरी की कदमताल याद आती है।
और भी हजारों यादें सताती हैं बचपन की आज भी जहन में,
चाची की फटी साड़ी और बेलगाड़ी की चाल याद आती है।
उमर पचपन में बचपन की मिशाल याद आती है,
गोधूलि की सौधी महक और सांझ की चौपाल याद आती है।
राजेश लखेरा, जबलपुर, म.प्र.।
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