विषाद की आधारशिला पर मिला गीता का प्रसाद :भारतका एक ब्राह्मण.
(गीता जयंती पर विशेष)
जब कोई मानव मन कुरूक्षेत्र में खड़ा होकर धर्मक्षेत्र की बात करने लगे तब उस मानव मन को सद्धर्म की शिक्षा देने के लिए महामानव को गीता का गायन करना पड़ता है।जब-जब मानव मन उलझन के पड़कर अपना कर्तव्य कर्म भुलाने लगता है तब-तब उसे गीता ज्ञान के द्वारा स्वकर्म का बोध कराया जाता है।गीता सुनकर ही वह अपने कर्तव्य के प्रति आश्वस्त होता है।
कहते हैं कि जब महाभारत का युद्ध कुरूक्षेत्र में होने वाला था।सभी रथी-महारथी सभी अपने सैन्य शस्त्र से सुसज्जित होकर बस युद्ध की घोषणा की प्रतिक्षा में थे। अर्जुन को भी अपने प्रतिद्वंद्वियों को देखने जानने की इच्छा हुई वह अपने सारथी को कहता है कि मुझे अपने दुश्मनों को देखना है।मेरा रथ उधर ले चलें जरा मैं भी तो देखूं मुझे किन किन लोगो से लडना है।
जैसा रथी ने कहा सारथी ने भी अपने चातुर्य से रथ को एकदम दोनों सेनाओं के मध्य स्थित किया।रथी की दृष्टि जिधर भी पड़ी उधर केवल स्वजन हीं उसे खड़े मिले जो युद्ध क्षकी इच्छा से आए हुए हैं।प्रतिद्वंद्वियों ने जब अर्जुन को देखा तो वे सब उतावले हो गए पर यह क्या? अर्जुन को तो अपने स्वजन-स्नेहियों को देखकर विषाद उत्पन्न हो गया।वह अपना अस्त्र-शस्त्र फेंक दिया।न लगने की बात कही।अंततः वह यहां तक कह देता है कि हमारा प्रतिद्वंद्वी हीं यदि हमें मार दे तो मैं समझूंगा मेरा कल्याण हो गया।यही तो विषाद योग है।गीता का प्रणयन विषाद पर हीं हुआ है और अंत प्रसाद पर।
अपने रथी को विषाद ग्रस्त देखकर सारथी को बड़ा आश्चर्य हुआ।वह रथ के घोड़े का लगाम छोड़ अपने रथी के मन का लगाम पकड़ा।लगा विषम परिस्थितियों से उबरने का ज्ञान बताने।सारे उपनिषद रूपि गाय को सारथी गोपाल ने दुह कर अपने रथी को उसका पान करवाया।अपने कर्तव्य कर्म का बोध करवाया।
गीता का उपदेश योगमय है कारण की इसे योगेश्वर ने गाया है।अंत में तो यही निर्णय निकलता है कि जहां योगेश्वर श्री कृष्ण है वहीं पार्थ हैं।मेरी तो यही मति है कि जहां ये दोनों हैं वहीं विजय और विभुति है।
आज गीता जयंती है।आज हीं गीता जी श्रीमुख से विश्व मानव कल्याण के लिए निसृत हुई थी।जब-जब मानव विषाद की अवस्था को प्राप्त होगा तब-तब उसे संजीवनी गीता की आवश्यकता होगी।सच कहा जाय तो गीता हमारे भारतीय सनातन परंपरा और समाज में गुरू ग्रंथ है।इसकी महत्ता आज भी अक्षुण्ण है।
---:भारतका एक ब्राह्मण.
©संजय कुमार मिश्र 'अणु'
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