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भारत में ऑन लाइन शिक्षा का भविष्य

भारत में ऑन लाइन शिक्षा का भविष्य

✍ वेद प्रकाश तिवारी
कोरोना महामारी की वजह से लगभग छह महीने से देश के सारे विद्यालय बंद हैं और इन दिनों में स्कूल के द्वारा छात्रों से कहा जा रहा है कि आप लोग ऑनलाइन पढ़ाई करें । ऑनलाइन शिक्षा का अर्थ है अपने घर में बैठकर इंटरनेट के माध्यम से स्मार्टफोन या लैपटॉप के जरिए ज्ञान हासिल करना। लेकिन भारत जैसे गरीब देश में ऐसे माता-पिता जो रोजी रोटी कमाते हैं या उनकी आय बहुत कम है ,वह अपने बच्चों को ऐसी सुविधाएं उपलब्ध कराने में समर्थ नहीं हैं। ऑनलाइन शिक्षा का भविष्य भारत में क्या है आज चर्चा का विषय बना हुआ है । एक समय था जब ऑफलाइन शिक्षा ग्रहण करने के लिए गांव के सुदूर क्षेत्रों में लोग बड़ी मशक्कत करते थे । गांव के लोग कहा करते हैं कि हम पढ़ाई करने के लिए घुटने भर पानी पार कर के,कोई नाव से नदी पार कर के स्कूल जाया करते थे । और हम लोगों के लिए अनुशासन सबसे जरूरी था । ऐसे कई उदाहरण हैं ,हमारे देश में ईश्वर चंद विद्यासागर स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ते थे । अब्दुल कलाम अखबार बेचा करते थे ।ताकि वह पढ़ सकें । लाल बहादुर शास्त्री नदी पार करके पढ़ाई करने जाया करते थे । पढ़ाई के लिए जुनून हुआ करता था ।यह सत्य है कि कोरोना वैश्विक महामारी के वजह से आदमी बहुत परेशान है पढ़ाई पर गहरा असर पड़ा है । शिक्षाविद डॉ. निर्मल कर्मकार कहते हैं, "जिस देश में स्कूली शिक्षा के लिए शिक्षक और भवन जैसी आधारभूत सुविधाएं नहीं हों, वहां ऑनलाइन शिक्षा की बात बचकानी ही लगती है.” 
ऑफ लाइन शिक्षा का महत्व ऑनलाइन शिक्षा से कहीं ज्यादा है । इस पर गौर करना होगा और ऑनलाइन शिक्षा की चर्चा करने से पहले हमें उन पहलुओं को समझना जरूरी है जो बेहद प्रासंगिक हैं। ऑनलाइन शिक्षा के लिए बिजली, स्मार्टफोन , लैपटॉप, इंटरनेट जरूरी है ।
अब हम एक सर्वे की बात करें तो एनसीईआरटी के सर्वे के मुताबिक भारत में-
• 27% छात्रों के पास स्मार्टफोन और लैपटॉप नहीं है । 
• 28% छात्र बार बार बिजली जाने की वजह से ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाते
• 33% छात्र ऑनलाइन शिक्षा पर मन से ध्यान नहीं दे पाते
• गणित और विज्ञान के छात्रों को ऑनलाइन शिक्षा से कठिनाई महसूस होती है
• 50 प्रतिशत छात्रों के पास स्कूल की पुस्तक उपलब्ध नहीं है । यह सर्वे केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय, सीबीएसई से जुड़े स्कूलों में पढ़ने वाले 34000 छात्रों, उनके माता-पिता और अध्यापकों से बातचीत के आधार पर तैयार की गई है ।अगर हम ठीक से समझे तो भारत में करीब आधे छात्रों के पास ऑनलाइन शिक्षा ग्रहण कर पाना टेढ़ी खीर है । इसमें मुख्य बात यह भी है कि अभिभावकों का शिक्षित होना बहुत जरूरी है । यदि उनके पास स्मार्टफोन या लैपटॉप आ भी जाए तो वह उसे कनेक्ट कर सकें और बच्चों को समझा सकें ।
गांव में रहने वाली 66% आबादी में से 16% आबादी को ही इंटरनेट की सुविधा उपलब्ध है । 
• देश में लगभग 30 करोड़ बच्चे स्कूल या कॉलेज आते हैं नेशनल सैंपल सर्वे ऑफिस की रिपोर्ट के अनुसार - •सरकारी स्कूल के 90 लाख छात्रों के पास ऑनलाइन शिक्षा की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है
• 24 प्रतिशत घर सिर्फ स्मार्टफोन के जरिए इंटरनेट से जुड़े हैं
• 11% परिवार ऐसे हैं जिनके पास इंटरनेट वाला कंप्यूटर है
• भारत के 16% घरों में 1 घंटे से 8 घंटे ही बिजली आती है
• ग्रामीण भारत के 33 % घरों में 9 से 12 घंटे बिजली आती है
• 47 % घरों में 12 घंटे बिजली आती है
• सबसे गरीब 20% परिवारों में से 3% परिवारों की पहुंच कंप्यूटर तक है और 9% परिवारों के पास इंटरनेट कनेक्शन है । 
• उनमें से 9% ऐसे परिवार हैं जहां इंटरनेट कनेक्शन में रहते हुए बार-बार इंटरनेट बाधित होता है ।
• 53% घर पुअर कनेक्टिविटी का सामना करते हैं उनके पास वाईफाई सिस्टम या उससे जुड़ी कोई तकनीक नहीं है
• 32% घरों में ब्रॉडबैंड का सिग्नल आता ही नहीं है
• दिल्ली केरल हरियाणा में इंटरनेट की पहुंच सबसे ज्यादा है
• असम को छोड़ दिया जाए तो उत्तर पूर्वी भारत में इंटरनेट बहुत ही पुअर कंडीशन में है
• यह डिजिटल खाई बहुत गहरी है ।सीधे तौर पर हम कह सकते हैं की अमीरी और गरीबी, सुविधा और असुविधा शहर और गांव इत्यादि कई सारे ऐसे पहलू है जो भारत को दो भागों में बांटते हैं । भारत आजादी के 70 वर्षों के बाद भी क्या ऑनलाइन शिक्षा देने दे पाने में समर्थ है ? आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि शहरों में भी काफी कठिनाइयां हैं । हरियाणा की एक यूनिवर्सिटी के छात्रों ने मिलकर ऑनलाइन पढ़ाई और ऑनलाइन परीक्षाएं आयोजित कराने को लेकर विरोध जताया है । छात्रों ने प्रशासन और कुलपति सहित कई उच्च अधिकारियों को ईमेल भी किया है, साथ ही सोशल मीडिया पर अपनी बात भी लिखी है । इन्होंने यूजीसी के ऑनलाइन ग्रीवेंस पोर्टल पर जाकर अपनी शिकायत भी दर्ज करवाई है और कहा है कि कई छात्रों के पास मजूबत इंटरनेट सुविधा नही है, ज्यादातर के पास इंटरनेट है भी तो कंप्यूटर या लैपटॉप नही है, और मोबाइल फ़ोन से सारे काम करने में सुविधा नही हो पाती । केंद्रीय शिक्षामंत्री रमेश पोखरियाल निशंक का दावा है कि स्कूली शिक्षा के लिए दीक्षा और ई-पाठशाला जैसे ऑनलाइन शिक्षा प्लेटफॉर्म हैं। लेकिन अगर किसी बच्चे के पास इंटरनेट की सुविधा नहीं है तो उनके लिए स्वयंप्रभा के 32 चैनलों के जरिए शिक्षा पहुंचाई जा रही है। वे कहते हैं कि सरकार सबसे गरीब तबके के उन बच्चों की भी चिंता कर रही है जिनके पास इंटरनेट और स्मार्टफोन नहीं हैं। उनके हिसाब से पाठ्यक्रम तैयार किया जाएगा और जरूरत पड़ी तो रेडियो की सहायता ली जाएगी।अब देखना है सरकार इस डिजिटल खाई को पाटने के लिए जो प्रयास कर रही है वह शहर से लेकर ग्रामीण छात्रों को इतना प्रभावित कर पाती है ।
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