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को- ऑपरेटिव बैंकों को आरबीआई की निगरानी में लाना सरकार का जनोपयोगी फैसला

को- ऑपरेटिव बैंकों को आरबीआई की निगरानी में लाना सरकार का जनोपयोगी फैसला

 

-पवन प्रत्यय

 

पूरे देश के ग्रामीण इलाकों में को-ऑपरेटिव बैंक का चलन काफी अधिक है. बुधवार (24 जून,2020) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक में सहकारी बैंकों को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया की निगरानी में लाने का महती फैसला लिया गया. इस फैसले से 1540 को-ऑपरेटिव बैंक आरबीआई के दायरे में गये हैं. आरबीआई के अंतर्गत को-ऑपरेटिव बैंक को लाये जाने के बाद अन्य बैंकों की तरह आरबीआई का आदेश और निर्देश को-ऑपरेटिव बैंक पर भी लागू होंगे. देश भर के कई अर्थशास्त्रियों ने इस फैसले को काफी महत्वपूर्ण और जनोपयोगी बताया है. 1540 को-ऑपरेटिव बैंकों के 8.6 करोड़ जमाकर्ता हैं और इनकी कुल जमा पूंजी 4.84 लाख करोड़ के करीब है. आरबीआई के अंतर्गत आने के बाद जमाकर्ताओं का इन पर विश्वास बढ़ेगा.

 

को-ऑपरेटिव बैंकों पर बढ़ेगा भरोसा

पिछले कुछ वर्षों से को-ऑपरेटिव बैंकों में धोखाधड़ी के कई मामले सामने आये हैं. निश्चित रूप सरकार का यह फैसला इसे रोकने की दिशा में स्वागतयोग्य कदम है. बिहार के मगध विश्वविद्यालय के फैकल्टी ऑफ इकोनॉमिक्स के पूर्व डीन डॉ सुधारंजन सिंह कहते हैं, को-ऑपरेटिव बैंकों को आरबीआइ की निगरानी के दायरे में लाया जाना बहुत जरूरी था. ऐसा होने से लोगों में को-ऑपरेटिव बैंकों के प्रति भरोसा बढ़ेगा. बैंक का क्रेडिट बना रहेगा. नुकसान की स्थिति में इसे आरबीआई से मदद मिलेगी. लोन देने रिकवरी करने में भी मदद होगी. कुल मिला कर यह एक अच्छा कदम है, इससे को-ऑपरेटिव बैंकों में चल रही गड़बड़ी पर भी लगाम लगेगी. नियमो में बदलाव के बाद भी सहकारी बैंकों के प्रबंधन का जिम्मा रजिस्ट्रार के पास ही रहेगा. यह बदलाव बैंकों को वित्तीय तौर पर मजबूत करने के लिए किया गया है. अब इन बैंकों में सीईओ की नियुक्ति के लिए आरबीआई से मंजूरी लेनी होगी.  

 

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान

भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सहकारिता का महत्वपूर्ण योगदान है. सहकारिता का विकास मुख्य रूप में कृषकों को सस्ती दर से ऋण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से हुआ. सरकार द्वारा नियुक्त बैकुंठलाल मेहता समिति – 1960 अखिल भारतीय ग्राम-ऋण समिति – 1954  के सुझावों ने सहकारिता के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया. भारतीय पंचवर्षीय योजनाओं में भी सहकारिता को अव्वल स्थान दिया गया. कृषि थोक, खुदरा व्यापार,कुटीर लघु उद्योग के क्षेत्रों में सहकारिता को अधिकाधिक अपनाये जाने पर बल दिया जाता रहा है. भारत में कृषि एवं ग्रामीण विकास के क्षेत्र में सहकारी संस्थाओं का बहुत ही  तेजी से विस्तार हुआ है. सहकारी साख के क्षेत्र में बैंकिंग संस्थाओं का भी विस्तार हुआ है. प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों को मुख्यतः केंद्रीय सहकारी बैंक धनराशि उपलब्ध कराता है. केंद्रीय को-ऑपरेटिव बैंक प्राथमिक कृषि-साख समितियों का एक संघ है, जिनका कार्यक्षेत्र सामान्यतः एक जिला होता है, इसलिए इन्हें जिला सहकारी बैंक भी कहा जाता है. केंद्रीय को-ऑपरेटिव बैंक के वित्तीय स्रोत तीन तरह के होते हैं, यथा- बैंक की अपनी हिस्सा पूंजी और रिर्जव फंड, जनता की जमा राशि राज्यीय सहकारी बैंक से प्राप्त ऋण. केंद्रीय सहकारी बैंक का मुख्य कार्य ग्रामीण प्राथमिक सहकारी समितियों को ऋण देना है. तीसरी पंचवर्षीय योजना से रिजर्व बैंक ने कमजोर बैंकों को फिर से स्थापित करने उन्हें मजबूत करने का प्रयास किया है. अब रिजर्व बैंक की निगरानी रहने से को-ऑपरेटिव बैंक की स्थिति बेहतर हो जायेगी.   दो-तीन दशकों में को-ऑपरेटिव बैंकों ने ग्रामीण विकास के लिए बड़ी मात्रा में ऋण उपलब्ध कराये हैं, किंतु यहां यह भी समझना जरूरी है कि कृषि के विस्तृत क्षेत्र एवं निर्भर व्यक्तियों की संख्या के लिहाज से ये ऋण पर्याप्त नहीं हैं. कैबिनेट के फैसले के बाद अब इस पर भी बेहतर काम होने ही पुरजोर संभावना है. इधर, राज्यीय को-ऑपरेटिव बैंक सहकारी क्रेडिट स्ट्रक्चर का अव्वल बैंक माना जाता है. यह बैंक राज्य के सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक को आर्थिक सुविधाएं उपलब्ध कराता है और उनके काम को नियंत्रित भी करता है. राज्यीय को-ऑपरेटिव बैंक आरबीआई से उधार लेता है और उसके तथा केंद्रीय सहकारी बैंकों और प्राथमिक सहकारी समितियों के माध्यम के रूप में काम करता है. शुरुआती दौर में भारत में सहकारिता का एक ही रूप विकसित हुआ था और वह था, कृषि साख सहकारिता. बाद के दिनों में इसका विस्तार हुआ. भारत में सहकारी आंदोलन के बाद वर्तमान समय में को-ऑपरेटिव बैंकिंग व्यवस्था से कृषि ऋणों की बेहतर पूर्ति की जा रही है.

 

रिजर्व बैंक की निगरानी से आयेगा बदलाव

सहकारी संस्थाओं पर अनियमितताओं पक्षपात के आरोप भी लगाये जाते रहे हैं. लोन अन्य सुविधाएं जरूरतमंद किसानों की अपेक्षा धनी किसानों अधिेकारियों के संबंधियों तथा मित्रों को ही उपलब्ध कराने का आरोप भी लगता रहा है. ऋणों की वसूली में भी यही स्थिति रहती है, जिसके कारण ऋणों की समुचित वसूली नहीं हो पाती है. यूं कहें कि भारत में को-ऑपरेटिव बैंकिंग व्यवस्था वित्तीय साधनों की कमी, वसूली में असफलता, प्रबंधकीय अक्षमता के कारण सफलता से दो कदम पीछे रही है. वहीं, कई राज्यों कर्नाटक आंध्रप्रदेश में सहकारी बैंक अधिक सफल रहे हैं. को-ऑपरेटिव बैंकों को इन राज्यों में अपनाये गये सुधारों पर ध्यान देने की भी जरूरत है. ऐसे भी अब कैबिनेट के फैसले और आरबीआई की निगरानी से को-ऑपरेटिव की बैंकिंग व्यवस्था में बेहतर सुधार और उम्मीद की किरण जगी है.

 

को-ऑपरेटिव बैंक किसानों के क्रेडिट फ्लो का जरिया, नाबार्ड बना रहा टेक्नो फ्रेंडली

सहकारी क्षेत्र को कोर बैंकिंग सोल्यूशन (सीबीएस) प्लेटफॉर्म पर लाने में नाबार्ड काफी मदद कर रहा हैदेश के 16 राज्यों में राज्य और मध्यवर्ती केंद्रीय सहकारी बैंकों में यह परियोजना लागू हो गयी है. इनमें केरल, उत्तराखंड, सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, जम्मू एवं कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, बिहार, कर्नाटक, तमिलनाडु, पुडुचेरी और अंडमान एवं निकोबार सीबीएस परियोजना से जुड़ गये हैं. टीसीएस और विप्रो ने पूरे देश  में इस महत्वाकांक्षी परियोजना को लागू किया है. अब इन पुराने वाणिज्य बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की तकनीकी प्रणाली की तर्ज पर सीबीएस  माहौल में काम करना शुरू कर दिया है और देश के दूरदराज के इलाकों में इन सेवाओं को समान रूप से प्रदान करने के लिए इन संस्थाओं की बराबरी कर रहे हैं. ये बैंक अब बदलते नये माहौल में ग्राहकों को समान रूप से सेवाएं दे रहे हैं. सहकारी बैंकों को कोर बैंकिंग सोल्यूशन के तहत लाने के कई लाभ है. खातों में पारदर्शिता नियमित रूप से उनका मिलान करना तथा  खातों में  हेराफेरी पकड़ने के लिए खाता-बहियों का संतुलन करना. अब ग्रामीण भारत में वित्तीय समावेशन पहल को आगे बढ़ाया जा सकता है. इसके अलावा बैंकों के ग्राहक किसी भी शाखा से बैंकिंग, -ट्रांसफर के माध्यम से देश में कहीं भी राशि भेजने समेत अन्य सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं. वहीं, भारत सरकार को भी आधार संख्या के आधार पर धारकों को प्रोत्साहन / सब्सिडी / अन्य भुगतान करने में सुविधा होगी. टेक्नो फ्रेंडली होने से स्टाफ  सदस्यों को अपने ग्राहकों के साथ संपर्क बढ़ेगा और  बैंकों के लिए नये ग्राहक बनाने में भी मदद मिलेगी, जिससे व्यापार का दायरा भी बढ़ेगा. को-ऑपरेटिव बैंक कई तरह के होते हैं- यथा : राज्य सहकारी बैंक, केंद्रीय सहकारी बैंक, शहरी सहकारी बैंक, मल्टी-स्टेट (बहु-राज्यीय) सहकारी बैंक जैसे PMC (पंजाब महाराष्ट्र को-ऑपरेटिव बैंक), ग्रामीण सहकारी बैंक इनके अलावा भूमि विकास बैंक भी इसमें शामिल हैं. नाबार्ड के डीडीएम (गया) श्री विवेकानंद इस संदर्भ में कहते हैं कि नाबार्ड का सुपरवाइजरी रोल को-ऑपरेटिव बैंक को लेकर रहा है. अब तक को-ऑपरेटिव बैंकों को नाबार्ड की गाइडलाइन को भी फॉलो करना होता रहा है. आरबीआई की निगरानी में आने के बाद सभी तरह के ऑडिट निरीक्षण इनके द्वारा ही होगा. बिहार के संदर्भ में बात करें,तो को-ऑपरेटिव संरचना त्रिस्तरीय है। पहला स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक, दूसरा डिस्ट्रीक्ट सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक और  तीसरा पैक्स. वहीं, आरबीआई की निगरानी के साथ-साथ टेक्नोलॉजी फ्रेंडली होने कारण भी अब कई मामलों में पारदर्शिता रहेगी. वहीं, कोर बैंकिंग सोल्यूशन (सीबीएस) के कारण डेटा के ट्रेंड से कई चीजों का बेहतर तरीके से निबटारा हो सकेगा.

सरकार का बेहतर प्रयास, सुदृढ़ होगी व्यवस्था

को-ऑपरेटिव बैंकों का अब का सिस्टम ऐसा है कि इसका एक सिरा राज्य सरकार से तो दूसरा सिरा आरबीआई के बैंकिंग ऑपरेशन से जुड़ा है. को-ऑपरेटिव पर राज्य सरकार और आरबीआई के दोहरे नियंत्रण के कारण पहले कई तरह की परेशानियां सामने चुकी हैं. आरबीआई लगातार इसका आभास भी दिलाता रहा है. पीएमसी के 2019 की घटना के बाद आरबीआई का रूख  सख्त हुआ और स्थिति में सुधार के लिए विचार किया जाने लगा. अब कैबिनेट के फैसले के बाद मल्टी स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक आरबीआई के नियंत्रण में जायेंगे, जिससे पारदार्शिता रहेगी और वित्तीय अनियमितता की आशंका नहीं के बराबर होगी. दिल्ली विश्वविद्यालय के महाराजा अग्रसेन कॉलेज में डिपार्टमेंट ऑफ कॉमर्स के एसोसिएट प्रोफेसर आलोक पुराणिक इस संदर्भ में कहते हैं कि आरबीआई की निगरानी में आने बाद को-ऑपरेटिव बैंकों की कार्यप्रणाली में निश्चित रूप से  सुधार होगा. अब को-ऑपरेटिव बैंकों में नियुक्ति से लेकर अन्य मसलों पर आरबीआई के दिशानिर्देशों  का पालन करने की बध्यता होगी. आरबीआई को-ऑपरेटिव बैंकों से समय-समय पर अपने हिसाब से रिपोर्ट मांग सकेगा. पिछले 50 साल में आरबीआई का काम बेहतर रहा है. यह एक बेहतर रेगुलेटर का काम करता रहा है. को-ऑपरेटिव बैंकों पर निगरानी से डिपॉजिटर का पैसा हर हाल में सुरक्षित रहेगा, इसकी पुरजोर संभावना है. सरकार का यह फैसला को-ऑपरेटिव बैंकों को बेहतरी की ओर ले जायेगा.

            सार-संपेक्ष में कहें, तो मोदी सरकार ने देशभर के को-ऑपरेटिव बैंकों में जमा आम लोगों-किसानों के पैसों को सुरक्षित बनाने के लिए कानून में बदलाव की मंजूरी  दी है. अब देशभर के को-ऑपरेटिव बैंक आरबीआई के दायरे में जायेंगे, जिनका ऑडिट केंद्रीय बैंक के नियमों के तहत किया जायेगा. पीएमसी बैंक में फर्जीवाड़े के बाद केंद्रीय कैबिनेट ने ऐसी घटनाओं पर रोक लगाने के लिए यह सशक्त कदम उठाया हैनये प्रस्ताव के तहत को-ऑपरेटिव बैंकों का नियमन अब आरबीआई के नियमानुसार किया जायेगा. इनका ऑडिट भी आरबीआई नियमों के तहत होगा. अगर कोई बैंक वित्तीय संकट में फंसता है, तो आरबीआई ही उसके बोर्ड पर निगरानी भी  रखेगा. को-ऑपरेटिव बैंकों को आरबीआई की गाइडलाइन को अपनाने के लिए निश्चित समय-सीमा दी जायेगी. कुल मिलाकर सरकार का यह फैसला जनोपयोगी है.

(लेखक- वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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