"जीवन-राग"
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जी रहे द्वन्द्व में एक ही छंद में
सुर मिलाने से मिलता नहीं है कभी,
धूप में छाँव में ठाँव ही ठाँव में
अब अँगीठी जलाए हुए हैं सभी।
रोटियाँ सिंक रहीं बेटियाँ जल रहीं
मर्म कोई किसी का कहाँ पूछता?
राख की ढेर पर है बसा यह शहर
आदमी आदमी से है नित जूझता।
भाव मन के कहीं पर हैं बिखरे पड़े
चोट खाए हुए गम छिपाए हुए,
दम्भ गलियों का राजा बना फिर रहा
कौन कहता कभी ये सताए हुए?
पेट की आग है श्रम भी है त्याग है
मौत निशिदिन गले से लगाती यहाँ,
फूल की सेज पर बैठ मन सोचता
सुख का सागर जमीं पर मिलेगा कहाँ?
मील सौ मील है ठौर अपना यहाँ
खोज मंजिल की करते रहे जन्म भर,
दूधमुँहे को आँचल से ढक रात भर
माँ की ममता भटकती रही दर बदर।
ऐ चमन के नजारों नजर फेर लो
आज घायल पड़ी है वसंती हवा,
सिसकियाँ ले रही इस धरा को यहाँ
क्या मिला है इसे आँसूओं के सिवा?
रजनीकांत।


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