"अमराई गाथा"
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उपवन गुमशुम बगिया रूठी
अब देख बगल की अमराई,
हरे भरे बढ़ते रसाल से
जाग उठी है तरुणाई ।
झूम रहे सब ठिगने तरुवर
लदी डालियाँ झूम रहीं,
हरी हरी पत्तियाँ खुशी से
माँ धरती को चूम रहीं।
प्यारी कोयल निरख रही है
तरु की फुनगी पर के झूले,
पंचम स्वर में गाने वाली
नहीं समाती हर क्षण फूले।
चंचल मन उपवन से भागा
घुस आया अमराई में,
सोच रहा ये पादप जीते
जन जन की भलाई में।
रजनीकांत।
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