ईश्वर का कृपा कवच

ईश्वर का कृपा कवच 

ऋग्वेद ( 1-1- 9 ) के अनुसार :-

"स नः पितेव सूनवेऽग्ने सूपायनो भव।
 सचस्वा नः स्वस्तये॥" 

 महर्षि दयानंद सरस्वती के वेदभाष्य और आर्य समाज की मान्यताओं के अनुसार इस मंत्र का अर्थ ईश्वर और जीव के बीच के अत्यंत आत्मीय और पवित्र संबंध को दर्शाता है। 
महर्षि दयानंद के अनुसार, यहाँ 'अग्ने' का तात्पर्य भौतिक आग से नहीं, बल्कि ज्ञानस्वरूप, प्रकाशमान और सर्वव्यापक परमेश्वर से है।
स नः पितेव सूनवे: जिस प्रकार एक करुणामय पिता अपने पुत्र (संतान) की उन्नति, सुख और कल्याण के लिए सदैव तत्पर रहता है, उसे प्रेमपूर्वक सही मार्ग दिखाता है और उसकी रक्षा करता है, उसी प्रकार हे परमेश्वर! आप हमारे रक्षक और मार्गदर्शक बनें।
सूपायनो भव: आप हमारे लिए उत्तम ज्ञान, मोक्ष और परमानंद के श्रेष्ठ उपायों को सहजता से प्राप्त कराने वाले (सुलभ) होवें। 
सचस्वा नः स्वस्तये: हे कल्याणकारी प्रभु! आप हमारे सब दुखों का नाश करके, हमें पूर्ण सुख और कल्याण (स्वस्ति) के साथ सदा के लिए युक्त रखें।
महर्षि दयानंद स्पष्ट करते हैं कि सांसारिक पिता की सीमाएं होती हैं, परंतु वह परमात्मा ही हमारा सच्चा, अनादि और सर्वशक्तिमान पिता है। वह जीव को कुमार्ग से बचाकर सन्मार्ग की ओर ले जाता है। इस मंत्र के माध्यम से मनुष्य ईश्वर से प्रार्थना करता है कि वे उसे अविद्या और दुखों से दूर कर आत्मिक बल, उत्तम बुद्धि और सुख प्रदान करें ताकि मानव समाज का कल्याण हो सके।
इस संसार में हमें जन्म देने वाले, हमारा पालन-पोषण करने वाले और हमें अच्छे संस्कार देने वाले पिता वंदनीय हैं। वे हमारे जीवन के मार्गदर्शक होते हैं। किंतु मानवीय जीवन की अपनी सीमाएं हैं। लौकिक या सांसारिक पिता हर समय हमारे साथ शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं रह सकते। समय के साथ वे वृद्ध होते हैं और एक दिन इस नश्वर संसार को छोड़कर चले जाते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि जब संतान किसी गंभीर संकट या मानसिक पीड़ा से गुजर रही होती है, तो सांसारिक पिता चाहकर भी उसकी सहायता करने में पूरी तरह सक्षम नहीं हो पाते। उनकी शक्ति, साधन और आयु सीमित हैं।


सत्यार्थ प्रकाश के प्रथम समुल्लास में महर्षि दयानंद सरस्वती ने ईश्वर के सौ मुख्य नामों की व्याख्या की है, जिसमें 'पिता' नाम भी शामिल है। 
'पिता' शब्द का अर्थ: महर्षि दयानंद लिखते हैं कि 'पिता' शब्द 'पा' धातु (रक्षा करने) से बना है। 
व्याख्या: ईश्वर को 'पिता' इसलिए कहा गया है क्योंकि वह सबका रक्षक है और एक दयालु, उदार पिता की तरह समस्त जीव-मात्र की भलाई, सुख और समृद्धि की कामना करता है। 
 सभी जीवों का रक्षक होने से उसे परमपिता परमेश्वर का नाम पिता है। उस परमेश्वर का नाम 'पितामह' भी है। 
"यः पितामहानां पिता स प्रपितामहः" — जो पिताओं के पितरों का पिता है, इसलिए परमेश्वर का नाम 'प्रपितामह' है। 
जिस प्रकार एक पूर्ण कृपावान माता अपने संतानों का सुख और उन्नति चाहती है, वैसे ही परमेश्वर भी सब जीवों की भलाई चाहता है, इसलिए उसका नाम 'माता' और 'पिता' है। 
  इस मंत्र में हम उसी परमपिता परमेश्वर की चर्चा सुन रहे हैं जो सदैव सब जीवों की भलाई चाहता रहता है। उसी के लिए परिश्रम करता है और उसी के लिए पुरुषार्थ करता है। 
   वह हमारा पिता है, जब उससे इस प्रकार का भाव स्थापित हो जाता है तो भावनाओं में पवित्रता आ जाती है। हम उसके प्रति श्रद्धा से भर जाते हैं। सबसे बड़ी बात यह होती है कि हम पिताओं के पिता परमपिता परमेश्वर की संतान के रूप में अपने आप को देखने लगते हैं । उसके पुत्र के रूप में अपने आप को देखते हैं। यद्यपि परमपिता परमेश्वर हमारा लौकिक और जैविक पिता नहीं है परंतु इसके उपरांत भी वह हमारा सच्चा पिता अवश्य है।
जैसे संसार में माता-पिता हमसे निस्वार्थ प्रेम करते हैं, निस्वार्थ भाव से हमारे कल्याण की योजनाओं में लगे रहते हैं, वैसे ही वह परमपिता परमेश्वर भी बहुत निस्वार्थ भाव से हमारे कल्याण की योजनाओं में लगा रहता है। लोग ईश्वर के नाम पर कई प्रकार से लोगों को डराते धमकाते हैं। उनके भीतर भय स्थापित करते हैं और उसे एक ऐसी डरावनी शक्ति के रूप में स्थापित करते हैं जो हमें अपने प्रति हिंसक दिखाई देती है। कोई काली के रूप में उसे डरावनी शक्ल में प्रस्तुत करता है तो कोई उसे शिव के विनाशकारी तांडव के रूप में प्रस्तुत करता है। परंतु वेद उस दिव्य शक्ति को पिता के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। इतने सुंदर ढंग से और इतने सुंदर ,सहज, सरल संबंध के रूप में स्थापित कर रहा है जिससे हमें डरने की कोई आवश्यकता ही नहीं है। इस संबंध में उसे देखने से हमारे अनेक सांसारिक भय दूर हो जाते हैं।
उस दिव्य शक्ति और दिव्य सत्ता के साथ संबंध स्थापित करने का वेद का यह अनोखा ढंग वेद को संसार की वास्तविक धर्म पुस्तक के रूप में स्थापित करता है।
 'पितेव सूनवे' का अर्थ है—पुत्र के लिए पिता के समान। एक पिता का दायित्व केवल जन्म देना नहीं होता, बल्कि संतान का भरण-पोषण करना, उसे सुसंस्कृत बनाना, उसके भय को दूर करना और उसे जीवन की कठिनाइयों से बचाकर सही मार्ग पर अग्रसर करना होता है। परमपिता परमेश्वर ब्रह्मा के रूप में हमको जन्म देता है और विष्णु के रूप में हमारा पालन -पोषण ,वृद्धि और विकास करता है। जैसे सांसारिक पिता के रहते हुए हमें किसी प्रकार से डरने की कोई आवश्यकता नहीं रहती, वैसे ही उस परमपिता परमेश्वर के साथ अपने वास्तविक सहज सरल संबंध को स्थापित करने से भी हमारे अनेक प्रकार के भय दूर हो जाते हैं। वह न्यायाधीश के रूप में हमें दंड देने के लिए बैठा है - हमारा अंतरात्मा इस बात को भली प्रकार जानता है। परंतु इसके उपरांत भी हमारा अंतरात्मा उसी से मिलने के लिए आतुर रहता है। क्योंकि वह जानता है कि तेरा वास्तविक आसरा परमपिता परमेश्वर ही है।
  हमारा अंतरात्मा यह भी भली प्रकार जानता है कि जैसे हमारा सांसारिक पिता हमारी अनेक प्रकार की गलतियों और नादानियों को सुधारने का प्रयास करता रहता है वैसे ही परमपिता परमेश्वर भी बहुत दयालु और कृपालु है। वह भी हमारी गलतियों और नादानियों को सुधारने का काम करता रहता है। ईश्वर के साथ पिता पुत्र का संबंध स्थापित करने का एक यह लाभ होता है कि हम उस अदृश्य शक्ति से फिर डरते नहीं हैं। हमको ऐसा लगने लगता है कि जैसे एक पिता अपने पुत्रों के अनेक गलत कामों के करने के उपरांत भी उसके प्रति दयालुता का भाव रखता है वैसे ही परमपिता परमेश्वर हमें अनेक गलतियों के करने के उपरांत हुई सुधरने के लिए बार-बार प्रेरित करता रहता है। हमारे मन में ऐसा विश्वास जागृत होता है कि पिता रूप में ईश्वर कभी हमारे विनाश की योजना नहीं बना सकता।

 पिता हमारा एक है ईश्वर दीन दयाल। 
खैर सभी की मांगते उसी से सब नरनार।।

लौकिक पिता और पारलौकिक पिता में अंतर

  पिता हमारे जीवन का मार्गदर्शन होता है। हमारे विचारों का मार्गदर्शक होता है। हमारे चरित्र का निर्माता होता है। संसार के लोगों से हमारे व्यवहार का निर्धारण करने वाला होता है। हमें ऐसी प्रेरणा देने वाला होता है जो जीवन भर हमारे काम आएगी। हमारी प्रत्येक समस्या का समाधान करने वाला होता है और जब हमको कष्ट में फंसे हुए देखता है तो हमको कष्टों से बाहर निकालने के लिए अपनी छाती लगा देता है। हमारे जीवन निर्माण के लिए अपने जीवन को दांव पर लगा देता है। इस सब के उपरांत भी सांसारिक पिता सर्वशक्तिमान नहीं है , जबकि ईश्वर सर्वशक्तिमान है । वह उन संकटों से भी हमारी रक्षा कर सकता है, जिनमें संसार का बड़े से बड़ा योद्धा भी हमारा सहायक नहीं हो सकता। जब संसार के सारे संबंध धोखा दे जाते हैं या किसी बड़ी समस्या के सामने अपने आप को बहुत छोटा अनुभव करने लगते हैं, तब वह महान पिता जो सबका पिता है,हमारी रक्षा के लिए सामने आता है। इसी स्थिति को कुछ लोग ' हारे का हरिनाम ' कहते हैं। इसी को कुछ लोग ' अब तो खुदा ही बेली है ' तो कुछ लोग ' अब तो राम ही अंतिम सहारा है ' या 'अब नाव राम भरोसे है' अथवा ' अब तो सब कुछ भगवान भरोसे ही है ' ऐसा कहते हैं। संसार के साधारण लोग सबके पिता परमपिता परमेश्वर को समस्या के अंतिम चरण में स्मरण करते हैं। उससे पहले उन्हें उसकी याद नहीं आती। जबकि परमपिता परमेश्वर के प्रति श्रद्धालु भाव रखने वाले लोग उसे समस्या के पहले चरण से ही अपना सहायक और रक्षक मानते हैं। हर पल उसकी उपस्थिति का अनुभव करते हैं। चिंतन के इसी अंतर के कारण साधारण लोग साधारण रह जाते हैं और उसके प्रति श्रद्धालु भाव रखने वाले लोग असाधारण बन जाते हैं। यदि आप असाधारण बनना चाहते हैं तो चिंतन में परिवर्तन कीजिए और उस पिता को सर्वत्र अनुभव कीजिए। उसकी कृपा के पात्र बनने का प्रयास कीजिए। ऐसा सोचने से और ऐसा ही आचरण करने से उसकी कृपा का कवच आपको अवश्य प्राप्त होगा। सत्यार्थ प्रकाश के पहले समुल्लास में महर्षि दयानंद जी लिखते हैं ,:-

यन्मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति।
यद्वाचा वदति तत्कर्मणा करोति।
यत्कर्मणा करोति तदभिसम्पद्यते।

 अर्थात मनुष्य मन से जिस बात का चिंतन या विचार (ध्यान) करता है, उसे ही अपनी वाणी से बोलता है।
यद्वाचा वदति तत्कर्मणा करोति: वह अपनी वाणी से जो कुछ बोलता है, उसे ही अपने कर्मों (कार्यों) द्वारा व्यावहारिक रूप में करता है। यत्कर्मणा करोति तदभिसम्पद्यते: और वह अपने कर्मों से जैसा करता है, अंततः वैसा ही परिणाम या फल उसे प्राप्त होता है (या वह वैसा ही बन जाता है)। 
  मन और वाणी का परस्पर बड़ा गहरा संबंध है। मन के चिंतन का वाणी पर सीधा प्रभाव देखा जाता है । फिर वाणी का हमारे कर्म के व्यावहारिक स्वरूप से गहरा संबंध है। सबके पिता को पिता स्वीकार कीजिए। उसके साथ बेपर्दा होकर रहिए। उसके बारे में समझिए ,जानिए , सोचिए, चिंतन कीजिए कि अब मैं जिस परम शक्ति को अपना पिता स्वीकार करने लगा हूं , वह परमपिता परमात्मा सर्वशक्तिमान सर्वव्यापी और शाश्वत है । उसे काल या स्थान की सीमाओं में बांधा नहीं जा सकता। वह अजर और अमर है। उसको बालकपन, यौवन और वृद्धावस्था जैसी अवस्थाओं का सामना नहीं करना पड़ता। वह तो एकरस रहता है। एक रूप रहता है।
इस परमपिता परमेश्वर से हम नित्य प्रार्थना करें कि अपने हृदय की आसुरी प्रवृत्तियों के साथ युद्घ में विजय पाने के लिए हे प्रभो! हम में सात्विक वृत्तियां जागृत हों। क्षमा, सरलता, स्थिरता, निर्भयता, अहंकार शून्यता इत्यादि शुभ भावनाएं हमारी संपत्ति हों। हमारे शरीर स्वस्थ तथा परिपुष्ट हों। मन सूक्ष्म तथा उन्नत हो, जीवात्मा पवित्र तथा सुंदर हो, तुम्हारे संस्पर्श से हमारी सारी शक्तियां विकसित हों। हृदय दया तथा सहानुभूति से भरा रहे। हमारी वाणी में मिठास हो तथा दृष्टि में प्यार हो। विद्या तथा ज्ञान से हम परिपूर्ण हों। हमारा व्यक्तित्व महान तथा विशाल हो। हे प्रभो! अपने आशीर्वादों की वर्षा करो, दीनातिदीनों के मध्य में विचरने वाले तुम्हारे चरणविंदों में हमारा जीवन समर्पित हो। इसे अपनी सेवा में लेकर हमें कृतार्थ करें। प्रात:काल की शुभबेला में हम आपके द्वार पर आये हैं, आपके बताये वेद मार्ग पर चलते हुए मोक्ष की ओर अग्रसर होते रहें, यही प्रार्थना है, इसे स्वीकार करो! स्वीकार करो!! स्वीकार करो!!! ओ३म् शांति: शांति: शांति:।
  उपरोक्त प्रार्थना के शब्द जब किसी ईश्वरभक्त के हृदय से निकले होंगे तो निश्चय ही उस समय उस पर उस परमपिता परमेश्वर की कृपा की अमृतमयी वर्षा हो रही होगी। वह तृप्त हो गया होगा, उसकी वाणी मौन हो गयी होगी, उस समय केवल उसका हृदय ही परमपिता परमेश्वर से संवाद स्थापित कर रहा होगा। इसी को आनंद कहते हैं, और इसी को गूंगे व्यक्ति द्वारा गुड़ खाने की स्थिति कहा जाता है जिसके मिठास को केवल वह गूंगा व्यक्ति ही जानता है, अन्य कोई नही। वह ईश्वर हमारे लिए पूज्यनीय है ही इसलिए कि उसके सान्निध्य को पाकर हमारा हृदय उसके आनंद की अनुभूति में डूब जाता है। उस समय आनंद के अतिरिक्त अन्य कोई विषय न रहने से हमारे जीवन के वे क्षण हमारे लिए अनमोल बन जाते हैं और हम कह उठते हैं-‘हे सकल जगत के उत्पत्ति कत्र्ता परमात्मन! इस अमृत बेला में आपकी कृपा और प्रेरणा से आपको श्रद्घा से नमस्कार करते हुए हम उपासना करते हैं कि हे दीनबंधु! आपकी पवित्र ज्योति जगमगा रही है। सूर्य, चंद्र, सितारे आपके प्रकाश से इस भूमंडल को प्रकाशित कर रहे हैं। भगवन, आप हमारी सदा रक्षा करते हैं। आप एकरस हैं, आप दया के भंडार हैं, दयालु भी हैं, और न्यायकारी भी हैं। आप सब प्राणिमात्र को उनके कर्मों के अनुसार गति प्रदान करते हैं, हम आपको संसार के कार्य में फंसकर भूल जाते हैं, परंतु आप हमारा, कभी त्याग नही करते हो। हम यही प्रार्थना करते हैं कि मन, कर्म, वाणी से किसी को दुख न दें, हमारे संपूर्ण दुर्गुण एवं व्यसनों और दुखों को आप दूर करें और कल्याणकारक गुण-कर्म और शुभ विचार हमें प्राप्त करायें। हमारी वाणी में मिठास हो, हमारे आचार तथा विचार शुद्घ हों, हमारा सारा परिवार आपका बनकर रहे। आप हम सबको मेधाबुद्घि प्रदान करें, और दीर्घायु तक शुभ मार्ग पर हम चलते रहें, हम सुखी जीवन व्यतीत करें, हमें ऐसा सुंदर, सुव्यवस्थित और संतुलित जीवन व्यवहार और संसार प्रदान करो। हमारे कर्म भी उज्ज्वल और स्वच्छ हों। सर्वपालक, सर्वपोषक, सारे जगत के रचने वाले पिता! दुष्ट कर्मों से हमें बचाकर उत्तम बुद्घि और पराक्रम प्रदान कीजिए। हमको केवल मात्र आपका सहारा है, आपका आश्रय है, आपका संरक्षण है। हमारी कर्म तथा ज्ञानेन्द्रियां शुभ देखें और शुभ मार्ग पर चलें, शुभ सोचें तथा निष्काम भाव से प्राणीमात्र की सेवा करते हुए अंत में आपकी ज्योति को प्राप्त हों, संसार के सारे बंधनों से मुक्त होकर वास्तविक मुक्ति वा मोक्ष के अधिकारी हों।'
 वह जो पारलौकिक या परमपिता परमात्मा है, वह सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापी और शाश्वत है। वह काल और स्थान की सीमाओं से परे है। वह कल भी था, आज भी है और हमेशा रहेगा। वह कभी बूढ़ा नहीं होता, न ही कभी असमर्थ होता है। जब हम सांसारिक रूप से खुद को अकेला या असहाय पाते हैं, तब भी वह अदृश्य रूप से हमारे भीतर और बाहर विद्यमान रहता है। इस मंत्र का भाव हमें इसी सत्य का बोध कराता है कि भले ही परिस्थितियां कैसी भी हों, हमारा वास्तविक रक्षक परमात्मा सदैव हमारे साथ है।

सूपायनो भव: सहज सुलभता की प्रार्थना

मंत्र में एक सुंदर शब्द प्रयोग किया गया है—'सूपायनो भव'। इसका अर्थ है कि आप हमारे लिए 'सूपायन' अर्थात् सहजता से प्राप्त होने वाले या सुलभ हो जाइए। अक्सर लोग सोचते हैं कि ईश्वर को पाना बहुत कठिन है, इसके लिए घोर तपस्या, जंगलों में वास या जटिल अनुष्ठान करने पड़ते हैं। परंतु यह मंत्र ईश्वर की सुलभता की प्रार्थना करता है।
जैसे एक छोटे बच्चे को अपने पिता के पास जाने के लिए किसी माध्यम, अनुमति या विशेष समय की आवश्यकता नहीं होती; वह जब चाहे रोते हुए या हंसते हुए अपने पिता की गोदी में बैठ सकता है, ठीक वैसे ही भक्त भी परमात्मा से प्रार्थना करता है कि प्रभु! मुझे अपनी शरण में लेने के लिए आप मेरे लिए उतने ही सुलभ हो जाइए। इसके लिए केवल मन में सच्ची पुकार, निष्कपट भाव और पूर्ण आत्मसमर्पण की आवश्यकता होती है। जब मनुष्य का अहंकार गल जाता है, तो ईश्वर उसके लिए अत्यंत सुलभ हो जाते हैं।

सचस्वा नः स्वस्तये: परम कल्याण की कामना

मंत्र के अंतिम भाग में कहा गया है—'सचस्वा नः स्वस्तये'। 'सचस्वा' का अर्थ है हमारे साथ जुड़े रहिए, हमारे साथ रहिए और 'स्वस्तये' का अर्थ है हमारे कल्याण या मंगल के लिए। 'स्वस्ति' शब्द केवल भौतिक सुख-सुविधाओं तक सीमित नहीं है। इसमें शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक शांति, बौद्धिक प्रखरता और आत्मिक उन्नति—सब कुछ समाहित है।
परमात्मा से यह प्रार्थना करना कि 'आप हमारे कल्याण के लिए हमारे साथ रहिए' वास्तव में एक गहरी मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक आवश्यकता है। जब हमें यह अनुभव होने लगता है कि ब्रह्मांड को चलाने वाली महाशक्ति हमारे साथ है, तो हमारे भीतर का अवसाद, अकेलापन, व्यग्रता और असुरक्षा की भावना समूल नष्ट हो जाती है। हम जीवन के बड़े से बड़े तूफानों का सामना बिना विचलित हुए कर सकते हैं, क्योंकि हमें पता होता है कि हमारी जीवन-नाव का खेवनहार स्वयं हमारा परमपिता है।

आधुनिक संदर्भ में मंत्र की प्रासंगिकता

आज के आधुनिक युग में, जहाँ मनुष्य तकनीक के माध्यम से पूरी दुनिया से जुड़ा हुआ है, विडंबना यह है कि वह अंदर से उतना ही अकेला महसूस करता है। आज डिप्रेशन, मानसिक तनाव और अकेलेपन की समस्या वैश्विक रूप ले चुकी है। लोग भीड़ में रहकर भी खुद को बेसहारा पाते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि मनुष्य ने अपने उस मूल केंद्र—परमात्मा से अपना संबंध तोड़ लिया है।
ऋग्वेद का यह मंत्र आज के भटके हुए मनुष्य को वापस अपने मूल घर और वास्तविक संबंध की ओर लौटने का मार्ग दिखाता है। यह हमें सिखाता है कि जब भी जीवन में घोर निराशा के बादल छाएं, जब संसार के सारे सहारे टूटते हुए नजर आएं, तब आंखें बंद करके उस परमेश्वर को पुकारना चाहिए। यह भाव मन में बैठाना अत्यंत आवश्यक है कि "मैं अकेला नहीं हूँ, परमात्मा की अनंत करुणा और संरक्षण की छाया सदैव मेरे ऊपर है।"

निष्कर्ष

संक्षेप में कहें तो, ऋग्वेद का यह अद्भुत मंत्र जीवन की परम सच्चाई से हमारा साक्षात्कार कराता है। यह हमें एक ऐसी आत्मीयता प्रदान करता है जो संसार के किसी भी भौतिक संबंध से बढ़कर है। ईश्वर को पिता मानकर उनके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो जाना ही सच्ची भक्ति है। यही दिव्य जीवन की साधना है। जब हम इस भाव को आत्मसात कर लेते हैं, तब हमारा संपूर्ण जीवन एक उत्सव बन जाता है और हम हर पल उस ईश्वरीय आनंद और सुरक्षा का अनुभव करने लगते हैं। यह मंत्र युगों-युगों से मानवता को यह संबल देता आया है कि हम कभी अनाथ या अकेले नहीं हैं, बल्कि हम उस अविनाशी परमपिता की अमर संतानें हैं।
भर्तृहरिकृत- वैराग्यशतक, श्लोक 31 में कहां गया है:-

भोगे रोगभयं कुले च्युतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं,
 मौने दैन्यभयं बले रिपुभयं रूपे जराया भयम्।

      शास्त्रे वादभयं गुणे खलभयं काये कृतान्ताद्भयं,
     सर्वं वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्।।

भावार्थ– विषय भोगों में रोगों का भय है, वंश में आचार भ्रष्टता या सन्तान विच्छेद का भय है, धन में राजा का भय है, मौन रहने में दीनता का भय है, बल प्राप्त करने पर शत्रुओं का भय है, रूप-सौन्दर्य में बुढ़ापे का भय है, शास्त्र पढ़ने पर पराजित होने का भय है, गुण प्राप्त करने में दुष्टों द्वारा व्यर्थ की निन्दा का भय है, शरीर में मृत्यु का भय है, इस प्रकार पृथ्वी पर सारी वस्तुएं भय से युक्त हैं, केवल एक वैराग्य ही निर्भय बनाने वाला है।
   संसार में सर्वत्र भय हमारी प्रतीक्षा में खड़ा है। भर्तृहरि जी का उपरोक्त श्लोक बता रहा है कि जहां भी जाओगे वहीं आपको भय का सामना करना पड़ेगा। भय से बचने का फिर उपाय क्या है ?
  इससे बचने के लिए एक स्थान है जहां आप निर्भय हो जाओगे। वह है परमपिता परमेश्वर का आसरा पकड़ लेना। शरणागति प्राप्त कर लेना। उसकी कृपा का कवच ओढ़ लेना। जब भी परमपिता परमेश्वर के सानिध्य को प्राप्त करो अर्थात संध्या अथवा ध्यान में बैठो तो अपने चारों ओर एक ऐसे दिव्य तेज का अनुभव करो जो आपके शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा को मजबूत कर रहा है। आपके आत्मबल को बढ़ा रहा है। उस दिव्य तेज को धारण करके उठो। आपको परमपिता परमेश्वर की कृपा का कवच प्राप्त हो जाएगा। यह कवच आपकी हर क्षेत्र में सहायता और रक्षा करेगा। वेद की भाषा में आपको परमेश्वर का युवराज बना देगा आपके भीतर एक अलग ही ऊर्जा प्रवाहित होती हुई दिखाई देगी और आप परमेश्वर के युवराज के रूप में कार्य करने का के लिए मैदान में उतर जाओगे। 

अथर्व० 20 /108/2) में कहा गया है :-

त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शतक्रतो बभूविथ ।
अधा ते सुम्नमीमहे ।।

अर्थ: हे सबको बसाने वाले ! हे सबमें बसने वाले ! सैंकड़ों प्रज्ञाओं और बलों से युक्त ! तू ही हमारा पिता,पालक और उत्पादक है। तू ही माता के समान स्नेही और शिक्षक है,अतः हम तुझसे सुख की याचना करते हैं।
वेद में सर्वत्र एक ईश्वर का ही वर्णन है। उसी की स्तुति,प्रार्थना और उपासना का उपदेश है।ईश्वर ही इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का एकमात्र सम्राट है। उसी एक पिता परमेश्वर के गुण गाते रहिए। आपको निश्चय ही एक दिन उसकी कृपा का कवच प्राप्त हो जाएगा।
डॉ राकेश कुमार आर्य 
(लेखक आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तर प्रदेश की न्याय सभा के प्रधान न्यायाधीश और आर्य प्रतिनिधि सभा जनपद गौतम बुद्ध नगर के जिला अध्यक्ष हैं )

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