दिवाली पर हर मिठाई, ले रही अंगड़ाई

दिवाली पर हर मिठाई, ले रही अंगड़ाई

कुमार महेंद्र
गोल-मटोल लड्डू जी देखो,
पीला कुरता पहन मुस्काए।
'कम खाओ, कम खाओ' कहकर,
तोंद वालों को और चिढ़ाए।
रसगुल्ले और राजभोग पर,
चाशनी में मस्ती छाई।
दिवाली पर हर मिठाई, ले रही अंगड़ाई।।


चमचम दमके ऐसे जैसे,
स्वर्गलोक की परी उतर आई।
गुलाब जामुन सोच रहा है,
किसने मेरी शामत बुलाई?
स्वाद निराला मेरा जग में,
रंग देखकर ठुकराना मत भाई।
दिवाली पर हर मिठाई, ले रही अंगड़ाई।।


चाँदी का वर्क लपेटे बैठी,
महारानी काजू कतली।
भाव सुनाते ही भैया की,
जेबें पड़ जातीं ढीली।
सोने के भाव बिक रही है,
फिर भी देखो शान निराली।
दिवाली पर हर मिठाई, ले रही अंगड़ाई।।


कड़ाही में हलवा इतराता,
देसी घी का तिलक लगाए।
पेड़ा और आगरे का पेठा,
अपनी महिमा खूब सुनाए।
रस में डूबी गोल जलेबी,
देख जीभ ललचाई।
दिवाली पर हर मिठाई, ले रही अंगड़ाई।।


थाल सजाकर रख दो भैया,
सबकी अपनी अलग मिठास।
मिल-बाँटकर खाएँ सब,
जीवन में लाएँ उमंग-उल्लास।
मीठे बोलों से जग जीतें,
मन में मधुरिम प्रीत समाई।
दिवाली पर हर मिठाई, ले रही अंगड़ाई।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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