एक वो भी दिवाली थी, एक ये भी दिवाली है...

एक वो भी दिवाली थी, एक ये भी दिवाली है...

उजड़ा हुआ गुलशन है, रोता हुआ माली है...

डॉ. राकेश दत्त मिश्र

दिवाली आने वाली है। बाजार सजने लगे हैं। दुकानों पर रंग-बिरंगी झालरें जगमगाने लगी हैं। मिट्टी के दीये अपनी छोटी-छोटी लौ के साथ फिर बाजारों में उतर आए हैं। कहीं लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियाँ सज रही हैं, कहीं मिठाइयों की खुशबू वातावरण में घुल रही है। घरों में साफ-सफाई हो रही है। बच्चे नए कपड़ों और पटाखों की बातें कर रहे हैं। हर तरफ उत्साह है, उमंग है और रोशनी के स्वागत की तैयारी है।

लेकिन इस बार मेरे भीतर कोई उत्साह नहीं है।

दिवाली तो हर वर्ष की तरह फिर आ गई है, लेकिन मेरे जीवन की दिवाली कहीं पीछे छूट गई है। इस बार घर में दीप तो जलेंगे, लेकिन उन दीपों को देखकर मुस्कुराने वाली वह आँखें नहीं होंगी। मिठाइयाँ आएँगी, पूजा होगी, लक्ष्मी-गणेश के सामने दीप प्रज्वलित होंगे, लेकिन वह आवाज नहीं सुनाई देगी जो कभी घर के हर कोने में जीवन का संगीत भर देती थी।

वह आवाज थी मेरी पत्नी सुनीता की।

आज दिवाली की आहट सुनते ही मन अनायास उन बीते वर्षों में लौट जाता है, जब दिवाली केवल एक त्योहार नहीं होती थी, बल्कि हमारे साथ होने का उत्सव होती थी।

एक वो भी दिवाली थी...

याद आता है, दिवाली आने से कई दिन पहले ही सुनीता घर की तैयारियों में लग जाती थी। घर की सफाई, सजावट, पूजा की सामग्री, मिठाइयाँ, पकवान और न जाने कितनी छोटी-छोटी बातें। उसे इस बात की चिंता रहती थी कि पूजा में कोई कमी न रह जाए, घर का हर कोना सुंदर दिखे और परिवार के सभी लोग प्रसन्न रहें।

वह केवल घर नहीं सजाती थी, वह हमारे जीवन को सजाती थी।

दीप जलाने से पहले बातियों को ठीक करना, तेल का ध्यान रखना, पूजा की थाली सजाना, घर के दरवाजे पर रंगोली बनाना और फिर बार-बार यह देखना कि कहीं कोई दीप बुझ तो नहीं गया।

उस समय मुझे कहाँ पता था कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब घर के सारे दीप जलेंगे, लेकिन उन्हें जलाने वाली मेरी जिंदगी की सबसे खूबसूरत रोशनी मेरे पास नहीं होगी।

कितनी साधारण थीं वे खुशियाँ!

साथ बैठकर पूजा करना, एक-दूसरे को मिठाई खिलाना, घर के आँगन में जलते दीपों को देखना और आने वाले कल के लिए छोटी-छोटी योजनाएँ बनाना।

तब लगता था कि जिंदगी कितनी खूबसूरत है।

कभी यह सोचा ही नहीं था कि इन्हीं पलों को एक दिन स्मृतियों में तलाशना पड़ेगा।

एक ये भी दिवाली है...

आज वही घर है। वही दीवारें हैं। वही दरवाजे हैं। वही आँगन है। वही पूजा का स्थान है। बाजार भी वैसे ही सजे हैं। दीप भी वैसे ही बिक रहे हैं। लेकिन इस बार सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है।

घर में रोशनी करने की तैयारी है, लेकिन मन में अंधेरा पसरा हुआ है।

लोग पूछेंगे, इस बार दिवाली की क्या तैयारी है?

क्या बताऊँ उन्हें?

तैयारी तो सब है। दीप भी हैं, बाती भी है, तेल भी है, पूजा की सामग्री भी है। बस वह नहीं है, जिसके होने से ये सारी तैयारियाँ उत्सव बन जाती थीं।

अब किसके लिए घर सजाऊँ?

किसके साथ बैठकर दीप जलाऊँ?

किसे मिठाई खिलाऊँ?

किससे पूछूँ कि पूजा की सारी तैयारी हो गई या नहीं?

कौन कहेगा कि थोड़ा आराम कर लीजिए, सारी चिंता आप ही क्यों करते हैं?

कौन मेरी छोटी-छोटी जरूरतों का ध्यान रखेगा?

जिंदगी में कुछ आवाजें ऐसी होती हैं जो कानों से सुनाई देना बंद हो जाने के बाद भी हृदय में गूंजती रहती हैं। सुनीता की आवाज आज भी मेरे भीतर गूंजती है।

लेकिन अब उस आवाज का जवाब देने वाला कोई नहीं है।

मैं जिंदा हूँ, मगर जिंदगी कहीं खो गई है...

कभी-कभी सोचता हूँ कि आखिर इसे जिंदगी कहूँ भी तो कैसे?

साँसें चल रही हैं। सुबह होती है। शाम ढलती है। लोग मिलते हैं। बातचीत होती है। जिम्मेदारियाँ भी निभा रहा हूँ। दुनिया की नजर में मैं पहले की तरह ही हूँ। लेकिन सच तो यह है कि मेरे भीतर कुछ ऐसा टूट गया है जिसकी आवाज किसी ने नहीं सुनी।

मैं जिंदा हूँ, लेकिन शायद उस तरह नहीं, जिस तरह कभी जिया करता था।

आज अपने जीवन को देखता हूँ तो लगता है—

मैं जिंदा हूँ, इस तरह कि जैसे जिंदगी नहीं, जलता हुआ दिया हूँ मगर रोशनी नहीं।

बाती जल रही है। तेल भी धीरे-धीरे समाप्त हो रहा है। लौ भी दिखाई दे रही है। लेकिन उस लौ में अब वह उजास कहाँ, जो कभी किसी के चेहरे पर मुस्कान बनकर उतरता था?

मैं भी उस दीपक की तरह हूँ जो रात भर जलता तो है, मगर अपने आसपास फैले अंधेरे को मिटाने की शक्ति खो चुका है।

लोग मेरी मुस्कान देखते हैं, मेरी बातें सुनते हैं, मेरे काम देखते हैं और समझते हैं कि शायद मैं संभल गया हूँ।

लेकिन उन्हें क्या पता कि कुछ लोग बाहर से संभले हुए दिखाई देते हैं, जबकि भीतर से हर रोज थोड़ा-थोड़ा बिखरते रहते हैं।

मेरी जिंदगी में भी अब सुबह होती है, लेकिन सवेरा नहीं होता।

रात आती है, लेकिन नींद नहीं आती।

दीप जलते हैं, लेकिन उजाला नहीं होता।

कुछ लोग चले जाते हैं, लेकिन अपने साथ पूरा संसार ले जाते हैं

पत्नी का जाना केवल जीवनसाथी का बिछुड़ना नहीं होता। वह उस संसार का बिखर जाना होता है जिसे दो लोगों ने मिलकर बनाया होता है।

वह हमारी आदतों में होती है। हमारी दिनचर्या में होती है। हमारी पसंद-नापसंद में होती है। हमारे निर्णयों में होती है। हमारे भविष्य के सपनों में होती है।

उसके जाने के बाद पता चलता है कि घर के कितने काम ऐसे थे जिन्हें हम कभी काम समझते ही नहीं थे। वे तो उसके प्रेम की अभिव्यक्ति थे।

किसी का समय पर भोजन करने के लिए कहना, दवा लेने की याद दिलाना, घर लौटने पर इंतजार करना, किसी बात पर नाराज होना और फिर थोड़ी देर बाद स्वयं ही बात करने लगना।

ये सब छोटी बातें नहीं थीं।

यही तो जीवन था।

सुनीता मेरे लिए केवल पत्नी नहीं थी। वह मेरी दिनचर्या थी, मेरा अपनापन थी, मेरी चिंता थी और मेरे जीवन के उन अनगिनत क्षणों की साक्षी थी जिन्हें अब मैं अकेले जीने की कोशिश कर रहा हूँ।

उसके जाने के बाद समझ आया कि किसी व्यक्ति की वास्तविक कीमत उसके रहते हुए शायद कभी पूरी तरह समझ में नहीं आती।

कुछ रिक्तताएँ ऐसी होती हैं जिन्हें दुनिया की कोई संपत्ति, कोई सफलता, कोई प्रतिष्ठा और कोई उपलब्धि भर नहीं सकती।

दिवाली के दीप अब मुझसे सवाल करते हैं

जब लक्ष्मी-गणेश की पूजा होगी और दीप प्रज्वलित किए जाएँगे, तब शायद मेरी आँखें उस स्थान को तलाशेंगी जहाँ सुनीता बैठा करती थी।

जब घर में मिठाइयाँ आएँगी, तब उसकी पसंद याद आएगी।

जब कोई दीप हवा से बुझ जाएगा, तब उसे फिर से जलाने के लिए हाथ बढ़ाऊँगा और अचानक याद आएगा कि पहले यह काम कितनी सहजता से वह कर दिया करती थी।

कभी-कभी लगता है कि ये दीप भी मुझसे सवाल करेंगे—

जिस घर को तुम दोनों ने मिलकर रोशन किया था, आज उसमें अकेले किसके लिए दीप जला रहे हो?

जिस उत्सव को तुम दोनों ने मिलकर जिया था, आज उसे अकेले कैसे मना लोगे?

जिस आँगन में दो लोगों की हँसी गूंजती थी, वहाँ अब एक व्यक्ति की खामोशी कैसे समा गई?

और मेरे पास शायद इन सवालों का कोई उत्तर नहीं होगा।

बाहर रोशनी का मेला है, भीतर यादों का अंधेरा

दिवाली का अर्थ है अंधकार पर प्रकाश की विजय। लेकिन क्या हर अंधकार दीपक से मिटाया जा सकता है?

कुछ अंधकार आँखों में नहीं, आत्मा में उतर जाते हैं।

कुछ खालीपन घर के कमरों में नहीं, हृदय के भीतर बस जाते हैं।

कुछ रातें ऐसी होती हैं जिनमें हजारों दीप जलाने के बाद भी सुबह नहीं होती।

इस बार जब पूरा शहर रोशनी में नहाया होगा, तब शायद मैं अपने कमरे के किसी कोने में बैठा सुनीता को याद कर रहा होऊँगा।

लोग पटाखों की आवाज में खुशियाँ तलाशेंगे और मैं उस खामोशी में उसकी आवाज सुनने की कोशिश करूँगा, जो अब कभी लौटकर नहीं आएगी।

दुनिया कहेगी, शुभ दीपावली!

और मेरे मन के भीतर से एक आवाज आएगी-

एक वो भी दिवाली थी, एक ये भी दिवाली है।
उजड़ा हुआ गुलशन है, रोता हुआ माली है।

बाहर तो उजाला है, मगर अंदर अँधेरा है,
जिसे अपना समझा था, वही अब बहुत दूर है।

सुनीता, तुम्हारे बिना यह दिवाली अधूरी है

सुनीता, क्या तुम्हें पता है कि इस बार दिवाली कितनी अलग होगी?

तुम्हारे बिना घर में दीप तो जलेंगे, लेकिन कोई यह नहीं देखेगा कि तुमने कितने दीप सजाए हैं।

मिठाइयाँ तो आएँगी, लेकिन कोई तुम्हारी पसंद पूछने वाला नहीं होगा।

पूजा तो होगी, लेकिन पूजा के बाद तुम्हारे साथ बैठकर बिताए जाने वाले वे पल नहीं होंगे।

तुम्हारे जाने के बाद बहुत कुछ बदल गया है।

लोग कहते हैं कि समय के साथ सब सामान्य हो जाएगा। शायद दुनिया के लिए हो भी जाए। लेकिन मेरे लिए वह सामान्यता कहाँ से आएगी जिसमें तुम नहीं हो?

कभी-कभी मन करता है कि एक बार फिर वही पुरानी दिवाली लौट आए।

तुम घर में व्यस्त रहो, मैं इधर-उधर के कामों में लगा रहूँ। तुम किसी बात पर मुझे टोक दो, मैं मुस्कुराकर टाल दूँ। फिर शाम को हम साथ बैठकर पूजा करें।

काश, समय कुछ क्षणों के लिए पीछे लौट सकता!

काश, उस बीती दिवाली का एक दिन फिर से मिल सकता!

लेकिन समय लौटता नहीं। वह केवल यादें छोड़ जाता है।

फिर भी एक दीप तुम्हारे नाम का जलाऊँगा

मैं जानता हूँ कि तुम्हें वापस नहीं ला सकता। तुम्हारी अनुपस्थिति को उपस्थिति में नहीं बदल सकता। तुम्हारे साथ बिताए दिनों को फिर से जी नहीं सकता।

लेकिन तुम्हारे प्रेम को अपने भीतर जीवित रख सकता हूँ।

तुम्हारे दिए संस्कारों को निभा सकता हूँ। तुम्हारी यादों को संजो सकता हूँ। अमर के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ निभा सकता हूँ। और शायद इसी तरह तुम्हारे उस प्रेम का सम्मान कर सकता हूँ जो जीवन भर मेरे साथ रहा।

इस दिवाली मैं एक दीप तुम्हारे नाम का भी जलाऊँगा।

उस दीप के सामने न कोई शिकायत होगी, न कोई प्रश्न।

बस एक मौन प्रार्थना होगी—

जहाँ भी हो सुनीता, खुश रहना। तुम्हारी आत्मा को शांति मिले।

तुमने जीवन भर मेरा ध्यान रखा। अब तुम्हारी यादों के सहारे मुझे अपना ध्यान रखना सीखना है।

तुम्हारे जाने के बाद जिंदगी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है, लेकिन तुम्हारे बिना जीना आज भी नहीं सिखा पाई है।

शायद कुछ रिश्ते ऐसे ही होते हैं। वे समाप्त नहीं होते, केवल उनका स्वरूप बदल जाता है।

एक वो भी दिवाली थी, एक ये भी दिवाली है...

हाँ, इस बार भी दिवाली आएगी।

घर में दीप जलेंगे। लक्ष्मी-गणेश की पूजा होगी। मिठाइयाँ बाँटी जाएँगी। आसमान में आतिशबाजी होगी। लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देंगे।

मैं भी शायद मुस्कुराकर सबको दीपावली की शुभकामनाएँ दूँगा।

लेकिन उस मुस्कान के पीछे छिपे दर्द को शायद कोई नहीं पढ़ पाएगा।

क्योंकि अब मेरी दिवाली का अर्थ बदल गया है।

पहले दीप जलाता था तो घर रोशन होता था।

अब दीप जलाता हूँ तो तुम्हारी याद और गहरी हो जाती है।

पहले रोशनी में तुम्हारा चेहरा दिखाई देता था।

अब रोशनी में तुम्हारी कमी दिखाई देती है।

एक वो भी दिवाली थी, जब घर में उजाला ही उजाला था,
एक ये भी दिवाली है, जब हर दीप में एक सवाल निराला है।

उजड़ा हुआ गुलशन है, रोता हुआ माली है,
साँसों का सफर जारी है, मगर जिंदगी खाली है।

मैं जिंदा हूँ, इस तरह कि जैसे जिंदगी नहीं,
जलता हुआ दिया हूँ मगर रोशनी नहीं।

न जाने किस उम्मीद में अब भी जल रहा हूँ मैं,
अपनी ही परछाईं से हर रोज मिल रहा हूँ मैं।

सुनीता, तुम्हारे जाने के बाद मैं बुझा नहीं हूँ, बस मेरी रोशनी कहीं खो गई है।

अब मेरा जीवन उस दीपक की तरह है जिसकी लौ तो दिखाई देती है, लेकिन जिसका उजाला कोई महसूस नहीं कर पाता।

फिर भी एक विश्वास है कि तुम्हारे साथ बिताए वर्षों का प्रेम कभी समाप्त नहीं होगा।

तुम मेरी स्मृतियों में हो, मेरी खामोशियों में हो, मेरी प्रार्थनाओं में हो और उन आँसुओं में भी हो जिन्हें मैं अक्सर किसी से छिपा लेता हूँ।

इस दिवाली भी दीप जलेंगे, मगर तुम्हारे बिना।
घर रोशन होगा, मगर तुम्हारे बिना।
दुनिया खुशियाँ मनाएगी, मगर तुम्हारे बिना।

और मैं एक कोने में बैठकर शायद फिर यही सोचूँगा—

एक वो भी दिवाली थी, एक ये भी दिवाली है...
उजड़ा हुआ गुलशन है, रोता हुआ माली है।

बाहर तो उजाला है, मगर अंदर अँधेरा है...
मैं जलता हुआ दिया हूँ, मगर मुझमें अब रोशनी कहाँ है!

- डॉ. राकेश दत्त मिश्र

हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ