हमीदी कॉम्प्लेक्स में भव्य मुशायरे का आयोजन

हमीदी कॉम्प्लेक्स में भव्य मुशायरे का आयोजन, शायरों एवं कवियों ने बांधा समां
मुजफ्फरपुर स्थित हमीदी कॉम्प्लेक्स में डॉ. अंसारी आसी अदबी साहित्यिक संगम के तत्वावधान में एक भव्य मुशायरे का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता सैयद एम. हसन ने की, जबकि मंच का कुशल संचालन श्रवण कुमार ने किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ शायरा एवं कवयित्री सविता राज की ग़ज़ल के सस्वर पाठ से हुआ। उनकी ग़ज़ल के अशआर—
"गोद में बच्चे लिए हर रोज़ ही,
स्वप्न कुछ गढ़ती रही हैं बेटियाँ।"
ने श्रोताओं की खूब वाहवाही बटोरी।
इसके पश्चात कवि श्रवण कुमार ने अपनी ग़ज़ल के माध्यम से महफ़िल में उत्साह का रंग भर दिया—
"आशा के दीप हरदम मन में जलाए रखना,
बदलेगा फिर ज़माना, हिम्मत बनाए रखना।"
वहीं आलम सिद्दीकी ने अपने प्रभावशाली अंदाज़ में कहा—
"अब मुझे आँख दिखाता है वही सौदागर,
मिलने आया था कभी आँखों में आँसू लेकर।"
उनकी प्रस्तुति ने मुशायरे को नई ऊँचाई प्रदान की।
शायर अली अहमद मंज़र ने अपनी ग़ज़ल के माध्यम से मोहब्बत और इंसानियत का पैग़ाम दिया—
"इंसान जो नफ़रत को मिटाने निकल आए,
हर दिल में मोहब्बत के ख़ज़ाने निकल आए।"
उनकी ग़ज़ल पर श्रोता झूम उठे। वहीं महफ़ूज़ आरिफ़ ने अपने शेर—
"जीतने वाले हार जाएंगे,
हम उन्हें आईना दिखाएंगे।"
से खूब तालियाँ बटोरीं।
शायरा डॉ. आरती कुमारी ने अपनी भावपूर्ण ग़ज़ल के अशआर प्रस्तुत किए—
"कहानी की तरह तुमको सुना सकती नहीं सबको,
तुम्हें गीतों के जैसे गुनगुना कर साथ रखना है।"
उनकी इस प्रस्तुति को श्रोताओं ने खूब सराहा।
कार्यक्रम के आयोजक डॉ. सिबगतुल्लाह हमीदी ने भी अपनी रचना के माध्यम से जीवन में सत्य और संघर्ष का संदेश दिया—
"कहा, सच की राह को चुनकर देख,
काँटों पर तू चलकर देख।"
उनकी प्रस्तुति ने महफ़िल में समां बाँध दिया।
इस अवसर पर शायरा एवं कवयित्री डॉ. आरती कुमारी के उर्दू ग़ज़ल संग्रह 'मुन्तज़िर है दिल' का लोकार्पण भी किया गया। यह ग़ज़ल संग्रह उर्दू निदेशालय से स्वीकृत है।
कार्यक्रम में उपस्थित साहित्यप्रेमियों ने सभी रचनाकारों की प्रस्तुतियों की सराहना की। अंत में डॉ. सिबगतुल्लाह हमीदी ने सभी अतिथियों, शायरों, कवियों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।
इस प्रकार साहित्य, संवेदना और आपसी सौहार्द से परिपूर्ण यह मुशायरा यादगार बन गया।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ