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सबके अपने- अपने हित

सबके अपने- अपने हित

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
सबके अपने- अपने हित, लक्ष्य होते हैं,
कुछ ख्वाब अधूरे रहते, कुछ पूरे होते हैं।
कुछ की मंजिल निज स्वार्थ तक सीमित,
राष्ट्र हितों पर भी, कुछ न्योछावर होते हैं।


धार के विपरीत तैरना, योग्यता होती,
बाढ़ में विपरीत चाहना, मूर्खता होती।
दो और दो का योग, सदा चार नही है,
छल कपट से बने रहो, राजनीति होती।


सीधा सच्चा सहज सरल, नेता बन नहीं पाता,
सबके हित साधने वाला, यहाँ चल नहीं पाता।
निज स्वार्थ में सभी लिप्त, हित पर चोट लगेगी,
ज़हरीले नागों के बीच, जीवन पल नहीं पाता।


विषधर के बीच रहना, तो नेवला बनना होगा,
जंगल में जीवित रहना, तो भेड़िया बनना होगा।
मारो मत निर्दोषों को पर, घुड़कना तो होगा ही,
राजनीति के चक्रव्यूह में, अर्जुन बनना होगा।


छल कपट और छद्म नीतियाँ, विपक्ष की चालें,
लूट खसोट और भ्रष्टाचार में, लिप्त विपक्ष वाले।
अपने भी कब पाक साफ हैं, कैसे विश्वास करें,
जिसकी पूँछ पकड़कर देखो, नाग ज़हरीले काले।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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