हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने को लेकर आर्य समाज की संगोष्ठी हुई संपन्न
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ग्रेटर नोएडा। यहां पर चले चार दिवसीय यजुर्वेद पारायण यज्ञ के अंतिम दिन आर्य प्रतिनिधि सभा जनपद गौतम बुद्ध नगर के तत्वावधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने को लेकर आर्य समाज की संगोष्ठी संगठन की भाषा प्रचारिणी सभा के सौजन्य से संपन्न हुई। इस संगोष्ठी का आयोजन आर्य समाज मुर्शदपुर के प्रधान राजेंद्र सिंह आर्य और उनके अन्य साथियों के द्वारा कराया गया। इस यज्ञ के ब्रह्मा आचार्य विक्रम शास्त्री रहे। जबकि मुख्य वक्ता के रूप में आचार्य कुंवरपाल शास्त्री ने निरंतर लोगों का मार्गदर्शन किया।
हिंदी के संबंध में हुई इस संगोष्ठी में अपने विचार व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि महर्षि दयानंद जी के मुख्य विद्या गुरु प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती थे जिनसे उन्होंने मथुरा में सन् 1860 से 1863 तक आर्ष संस्कृत व्याकरण एवं वेदादि शास्त्रों आदि का अध्ययन किया था। स्वामी दयानन्द जी वार्तालाप, उपदेश व प्रवचन आदि में संस्कृत का ही प्रयोग करते थे। हिन्दी बोलने व लिखने का उनको अभ्यास नहीं था। उनको हिन्दी बोलने वा हिन्दी में उपदेश करने का परामर्श बंगाल में ब्राह्म समाज के नेता श्री केशव चन्द्र सेन ने दिया। देश के अधिकांश लोगों द्वारा बोली व समझी जाने वाली भाषा हिन्दी होने के कारण ऋषि दयानन्द जी ने इस प्रस्ताव को तत्काल स्वीकार कर लिया और इसके बाद हिन्दी में उपदेश देने का अभ्यास कर हिन्दी में ही उपदेश करना आरम्भ कर दिया था। उनके अनेक ग्रन्थों में से प्रमुख ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि व आर्याभिविनय हैं जो सभी हिन्दी में ही हैं। उन्होंने अनेक लघु ग्रन्थ भी लिखे हैं और चारों वेदों पर संस्कृत के साथ-साथ हिन्दी में भाष्य करने का भी उपक्रम किया जिसके अन्तर्गत उन्होंने सम्पूर्ण यजुर्वेद भाष्य किया।.jpeg)
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संगोष्ठी की मुख्य वक्ता के रूप में अपने विचार व्यक्त करते हुए कणिका आर्या ने कहा कि यह अत्यंत दुर्भाग्य का विषय है कि आज तक भारत की कोई 'राष्ट्रभाषा' घोषित नहीं की गई, क्योंकि देश देश का तत्कालीन नेतृत्व कभी इस समस्या के प्रति गंभीर नहीं रहा। यह और भी दुख का विषय है कि जहां अन्य देशों की अपनी राष्ट्रभाषा है, वहां हमारे नेतृत्व ने कभी अपनी राष्ट्रभाषा होने के संबंध में गंभीरता से चिंतन नहीं किया। इसीलिए हिंदी भाषा आज तक राजभाषा बनी हुई है। 1950 में जब देश का संविधान लागू हुआ तो 1965 की जनवरी तक हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया था परंतु 1965 में भी ऐसा नहीं हो पाया। उन्होंने कहा कि 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा द्वारा सर्वसम्मति से हिंदी को देश की राजभाषा के रूप में स्वीकृति प्रदान की गई थी। इस ऐतिहासिक दिन की याद में प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हम हिंदी दिवस के रूप में मनाते हैं। संविधान के भाग 17 के अनुच्छेद 343 से 351 तक में इन राजभाषा संबंधी प्रावधानों को विस्तृत रूप से दर्जा दिया गया है।जिसमें अनुच्छेद 351 के तहत केंद्र सरकार को यह कर्तव्य सौंपा गया कि वह हिंदी भाषा का इस प्रकार विकास और प्रसार करे ताकि वह भारत की मिश्रित संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके।
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे आर्य प्रतिनिधि सभा जनपद गौतम बुद्ध नगर के अध्यक्ष डॉ राकेश कुमार आर्य ने कहा कि संविधान सभा में भारत की राष्ट्रभाषा को लेकर निरंतर चिंतन चला था। जिसमें नेहरू जी की इच्छा रही थी कि हिंदी में सभी भाषाओं के शब्दों को मिलाकर एक हिंदुस्तानी नाम की भाषा विकसित कर ली जाए। इसका अभिप्राय था कि हिंदी की कोई व्याकरण नहीं होगी। ना ही कोई उसका वैज्ञानिक आधार होगा। नेहरू जी के अनुसार एक खिचड़ी भाषा को पूरे देश में लागू कर दिया जाएगा। यही विचार गांधी जी का था। जबकि सावरकर जी जैसे लोग इस बात पर जोर दे रहे थे कि स्वामी दयानंद जी महाराज के सत्यार्थ प्रकाश में लिखी संस्कृतनिष्ठ हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाया जाए और यही प्रस्ताव पारित हुआ। जिसके लिए देवनागरी लिपि को मान्यता दी गई।

उन्होंने कहा कि आर्य समाज ने 1886 में डीएवी आंदोलन खड़ा किया था। जिसके द्वारा उस समय अपना पाठ्यक्रम निश्चित करते हुए हिंदी में गणित और विज्ञान की पुस्तकों को तैयार किया गया था। जबकि उससे पहले स्वामी दयानंद जी सत्यार्थ प्रकाश सहित अपने कई ग्रंथों का प्रकाशन हिंदी में करवा चुके थे। 1902 में जब गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना हुई तो वहां भी हिंदी को प्राथमिकता दी गई। डॉ आर्य ने कहा कि आर्य समाज ने हिंदी रक्षा आंदोलन चलाया। स्वामी श्रद्धानंद जी महाराज ने आर्य मुसाफिर, आर्य मित्र, आर्य जगत, भारतोदय जैसे पत्रों का हिंदी में संपादन किया और जो समाचार पत्र या पत्रिका उर्दू में छापे जा रहे थे उनको हिंदी में प्रकाशित करने के लिए कठोर परिश्रम किया।
इस प्रकार आर्य समाज का हिंदी कक्षा में विशेष योगदान रहा है आज विश्व में 90 देशों में लगभग 600 विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जाती है। जबकि भारत में डीएवी की 900 संस्थाओं में इस पर कार्य हो रहा है।
उन्होंने कहा कि हिंदी विश्व की तीसरी सबसे बड़ी भाषा है। परंतु यदि सही आंकड़ों पर विचार किया जाए तो हिंदी ही एकमात्र ऐसी भाषा है जिसे दुनिया में सबसे अधिक समझा व बोला जाता है। इसलिए हिंदी की अपार संभावनाएं हैं ।परंतु राजनीतिक उदासीनता और राजनीतिक लोगों के अपने पूर्वाग्रह हैं जो इसके विकास में बाधक बनते हैं। जिसके लिए आर्य समाज को विशेष सावधान रहने की आवश्यकता है। क्योंकि यह संगठन ऐसा है जो सबसे अधिक हिंदी भक्त है।
संगोष्ठी का सफल संचालन कर रहे भाषा प्रचारिणी सभा के जिलाध्यक्ष ब्रह्मचारी आर्य सागर ने कहा कि संविधान सभा में पुरुषोत्तम दास टंडन आर वी धूलेकर हिंदी के सबसे उग्र समर्थकों में से थे।
संविधान सभा के शुरुआती दिनों (10 दिसंबर 1946) में जब उन्होंने हिंदी में बोलना शुरू किया और कुछ सदस्यों ने इसका विरोध किया, तो धुलेकर ने कड़े शब्दों में कहा था, "जो लोग भारत का संविधान बनाने बैठे हैं और हिंदी नहीं जानते, वे इस सभा के सदस्य बनने के पात्र नहीं हैं। उन्हें यहाँ से चले जाना चाहिए।" उनका मानना था कि विदेशी भाषा अंग्रेजी को तुरंत हटाकर देवनागरी लिपि वाली हिंदी को स्थापित किया जाना चाहिए। उन्होंने आंकड़ों के आधार पर बताया कि विदेशों में भारत की राजभाषा हिंदी को लेकर काफी उत्सुकता है। परंतु हम स्वयं अपनी राष्ट्रभाषा के प्रति उदासीनता का प्रदर्शन करते हैं। जब अन्य देशों की राष्ट्रभाषा हो सकती है तो भारत की राष्ट्रभाषा क्यों नहीं हो सकती? इस पर हमको समय रहते हुए सावधान होकर सोचने की आवश्यकता है। उन्होंने उपस्थित मातृशक्ति का आवाहन किया कि वह अपने बच्चों को हिंदी के अंक सिखाएं। यह बहुत ही दुर्भाग्य का विषय है कि आज बच्चों को हिंदी का ट्यूशन लेने के लिए भी कहीं ना कहीं जाना पड़ता है। यदि यह स्थिति निरंतर बनी रही तो हम अपनी राष्ट्रभाषा से कट जाएंगे। उन्होंने कहा कि राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन ,सेठ गोविंद दास, बालकृष्ण शर्मा नवीन, अलगू राय शास्त्री के हिंदी प्रेम और संविधान सभा में उनके द्वारा किए गए प्रयास को हम भुला नहीं सकते। गांधी जी ने वर्ष 1918 में ही इंदौर के हिंदी साहित्य सम्मेलन में हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का समर्थन किया था। परंतु, गांधी जी जिस 'हिंदी' की बात करते थे, वह केवल साहित्यिक या शुद्ध संस्कृतनिष्ठ हिंदी नहीं थी। वे 'हिंदुस्तानी' के सबसे बड़े पैरोकार थे।
कार्यक्रम में आचार्य दशरथ कुमार द्वारा भी अपने विचार व्यक्त किए गए। उन्होंने कहा कि हिंदी संस्कृत की उत्तराधिकरिणी भाषा है। जिसका एक वैज्ञानिक व्याकरण है। इसके प्रत्येक शब्द का कोई ना कोई वैज्ञानिक अर्थ है। परंतु इसमें जिस प्रकार विदेशी भाषाओं के शब्दों की भरमार कर दी गई है उससे इसका साहित्यिक स्वरूप विकृत हुआ है। आर्य समाज के लोगों को चाहिए कि हिंदी के शुद्ध साहित्यिक स्वरूप को यथावत बनाए रखने के लिए विशेष कार्य किया जाए। आचार्य श्री ने कहा कि यह केवल कहने से काम नहीं चलेगा बल्कि इसके लिए संकल्प लेने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि हम सभी हिंदी में हस्ताक्षर करना आरंभ करें। हिंदी के लिए काम करने पर विचार करें और हिंदी में लिखना, पढ़ना व बोलना अपने लिए गौरव की बात समझें। जब तक हम अपने आप अपनी भाषा का सम्मान करना नहीं सीखेंगे तब तक उसे वह सम्मान प्राप्त नहीं होगा जिसका उसे अधिकार प्राप्त है।
इस अवसर पर आर्य समाज के विद्वान सन्यासी सत्य मुनि जी महाराज ने गुरुकुल मुर्शदपुर के सभी ब्रह्मचारियों को शॉल भेंट की। इसके अतिरिक्त जीतने भर भी गणमान्य लोग वहां पर उपस्थित थे उन सबको भी उन्होंने सम्मानित किया। सत्य मुनि जी महाराज ने भी राष्ट्रभाषा के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि पूरे देश की ही नहीं बल्कि सारे संसार की जितनी भर भी भाषाएं हैं उन सब की जननी संस्कृत है। जब हमारे पास इस प्रकार के प्रमाण हैं तो हमें अपनी हिंदी के प्रति विशेष समर्पण व्यक्त करना चाहिए। इस अवसर पर सरपंच रामेश्वर सिंह देव मुनि जी महाराज रंगीलाल आर्य, मास्टर प्रताप सिंह आर्य, वेद प्रचारिणी सभा के जिलाध्यक्ष विजेंद्र सिंह आर्य, जिला उप प्रधान महावीर सिंह आर्य, जिला मंत्री पंडित धर्मवीर आर्य, सुभाष चंद्र शर्मा, देवदत्त शर्मा, प्रधान बलबीर सिंह आर्य, हेम सिंह आर्य, गजराज सिंह आर्य, सुनील कुमार आर्य, जयप्रकाश आर्य, जीतराम आर्य, बाबू राम आर्य, चमन शास्त्री,अजय आर्य एडवोकेट, राम प्रसाद आर्य, यश आर्य, प्रधान रघुवर सिंह, आर्य समाज घोड़ी बछेड़ा के प्रधान रविंद्र आर्य, मंत्री सतीश आर्य , नागेश आर्य आदि सहित बड़ी संख्या में आर्यजन और मातृशक्ति की उपस्थिति रही।
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