कुंठित मन की पीर, कोई न हर पायेगा,
ग़ैरों की ख़ुशियों से, व्यथित हो जायेगा।हक मार कर दूजों का, जो प्रसन्न रहता,
कर्तव्य की बात, नज़र नहीं वह आयेगा।
सच जब तक, सच कहना ना सीख सकेगा,
बस खुद में ही घुट घुट कर रह जायेगा।
कुंठित मन में बस निराश भाव ही पलते देखे,
सकारात्मक सोच, यदि वह सीख न पायेगा।
कब लगे प्रतिबंध, कभी विचारों पर किसी के,
व्यक्त किये कुछ, मन में बाकी रह जायेगा।
अंतरिक्ष के रहस्य, सूरज में भी शीतलता है,
कब भाव कवि का, सार कोई समझ पायेगा?
कुंठित मन लेकर, ख्वाबों को कौन बढ़ा पायेगा,
खुद ही व्याकुल व्यथित, मौन खड़ा रह जायेगा।
धूप- छाँव ऋतुओं का, आवागमन चलता रहता,
मन उदास कुंठित प्रसन्न, सब यूँ चलता जायेगा।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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