"उपेक्षा: अस्तित्व का मौन हनन"

"उपेक्षा: अस्तित्व का मौन हनन"

पंकज शर्मा 
प्रिय मित्रों आलोचना का प्रचंड शोरे-ग़ुल मनुष्य के भीतर चेतना का संचार करता है, क्योंकि वह उसके अस्तित्व की स्वीकृति है। किंतु उपेक्षा का निस्तब्ध मौन अति जानलेवा होता है; यह आत्मा के स्पंदन को स्तब्ध कर जीवंत चेतना को घुट-घुट कर मरने पर विवश कर देता है। अस्तित्व की यही अस्वीकृति मनुष्य की सबसे भयावह आभ्यंतरिक मृत्यु है।

इस नीरव उपेक्षा को अपनी दुर्बलता न बनने दें, अपितु इसे अंतर्मुखी होकर आत्म-बोध का आधार बनाएँ। जब संसार आपके वजूद को नकारने लगे, तब अपने भीतर के प्रकाश को जगाकर स्वतःज्ञ ही एक नया सवेरा रचें। स्वयं की प्रासंगिकता को पहचानकर हर उपेक्षा को अपनी अदम्य संकल्प-शक्ति में रूपांतरित करना ही जीवन का सच्चा दर्शन है।

. "सनातन"
*(एक सोच , प्रेरणा एवं संस्कार)*
पंकज शर्मा "कमल सनातनी" *जीवन सूत्र - 25/10/2026*
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