बिछड़े सभी बारी-बारी

विजय कुमार
यह कहानी हमारे मित्र अविनाश की है वो जब कभी अपने जीवन के पुराने पन्ने पलटता था, तो उसे लगता था कि शायद मनुष्य अपनी जिंदगी का लेखक नहीं होता। वह केवल घटनाओं के बीच उपस्थित रहता है और समय अपनी सुविधा से उसके जीवन की कहानी लिखता चला जाता है। कुछ लोग उसकी जिंदगी में बहुत थोड़ी देर के लिए आते हैं, कुछ वर्षों तक साथ चलते हैं और कुछ इतने गहरे उतर जाते हैं कि उनके चले जाने के बाद भी उनकी उपस्थिति समाप्त नहीं होती।
अविनाश के जीवन में भी कुछ चेहरे ऐसे ही आए थे-कुछ मौसम की तरह आए और चले गए, कुछ स्मृति बन गए और एक ऐसा चेहरा भी था, जिसके जाने के बाद उसे लगा कि उसके भीतर का एक पूरा संसार ही उजड़ गया है।
बचपन और किशोरावस्था की सीमा पर खड़े अविनाश के जीवन में एक दिन मधु आई थी। वह उसी मुहल्ले में रहती थी। उम्र ऐसी थी जिसमें प्रेम का अर्थ समझने के लिए किसी किताब की जरूरत नहीं होती। किसी के आने की आहट से धड़कन बढ़ जाए, किसी को दूर से देखकर चेहरे पर मुस्कान आ जाए और मिलने के लिए कोई बहाना खोज लिया जाए-शायद यही उस उम्र का प्रेम था।
दोनों दूध लेने के बहाने मिला करते थे। दूध खरीदना जितना जरूरी नहीं था, उससे कहीं अधिक जरूरी वे कुछ पल थे जिनमें दोनों एक-दूसरे को देख लेते थे।
उन दिनों मोबाइल नहीं थे, संदेश नहीं थे, सोशल मीडिया नहीं था। इंतजार था और इंतजार के साथ एक अनकहा सुख था। अविनाश को लगता था कि दुनिया बहुत बड़ी नहीं है। बस कुछ गलियाँ हैं, कुछ परिचित चेहरे हैं और उन गलियों में कहीं मधु है।
लेकिन जीवन कभी-कभी सबसे मासूम सपनों को बिना किसी चेतावनी के तोड़ देता है।
एक दिन खबर मिली कि मधु के पिता का स्थानांतरण हो गया है। घर खाली हुआ और मधु चली गई। न कोई अंतिम मुलाकात हुई, न कोई वादा, न कोई विदाई। अविनाश के पास केवल कुछ यादें रह गईं और उन यादों के बीच बार-बार लौटता हुआ वही प्रश्न-वह चली क्यों गई?
बहुत वर्षों बाद उसे समझ में आया कि जीवन में हर बिछोह मृत्यु के कारण नहीं होता। कुछ लोग जीवित रहते हुए भी हमारी दुनिया से निकल जाते हैं। हम उन्हें खोज सकते हैं, उनका पता लगा सकते हैं, उनसे मिल भी सकते हैं, लेकिन जो समय उनके साथ बीतना था, वह फिर कभी वापस नहीं आता।
समय आगे बढ़ा और अविनाश के जीवन पर परिवार के निर्णयों की छाया पड़ने लगी। उसके पिता ने उसकी शादी उसकी इच्छा के अनुरूप नहीं, बल्कि अपनी पसंद से एक गाँव की लड़की सुनैना से कर दी। विवाह हो गया। जीवन अपनी गति से चलने लगा। लेकिन हर रिश्ता प्रेम से शुरू हो, यह जरूरी नहीं। कुछ रिश्ते जिम्मेदारी से शुरू होते हैं और समय उन्हें आदत में बदल देता है।
अविनाश ने भी अपने हिस्से का जीवन निभाया। वर्षों तक उसने अपने कर्तव्यों को निभाया, परिवार को संभाला और अपने भीतर की बहुत-सी आवाजों को चुप रखा। पंद्रह वर्ष कब बीत गए, उसे स्वयं पता नहीं चला।
फिर एक दिन मृत्यु ने दरवाजा खटखटाया और सुनैना अचानक चली गई।
अविनाश बहुत देर तक मृत्यु को समझने की कोशिश करता रहा। उसे लगा कि मनुष्य जिस व्यक्ति के साथ वर्षों तक रहता है, उसे अपना समझने लगता है। लेकिन मृत्यु के सामने “अपना” और “पराया” जैसे सारे शब्द कितने छोटे हो जाते हैं। जिस व्यक्ति के साथ कल तक जीवन था, आज वही केवल स्मृति रह जाता है।
इसी बीच उसके कार्यालय में काम करने वाली राधा उसके जीवन में एक भावनात्मक सहारा बनकर आई थी। कुछ वर्षो तक दोनों के बीच एक संबंध रहा। वह रिश्ता भी धीरे-धीरे समय की धूल में दब गया। राधा चली गई और अविनाश फिर अपने जीवन के साथ अकेला रह गया।
उसे कभी-कभी लगता था कि शायद उसका जीवन रिश्तों का नहीं, विदाइयों का जीवन है।
कोई आता है।
कुछ समय साथ चलता है।
उसके भीतर अपनी जगह बनाता है।
और फिर किसी न किसी कारण से चला जाता है।
वह सोचता-क्या यही जीवन है?
क्या मनुष्य का भाग्य केवल इतना है कि वह जिनसे प्रेम करता है, उनसे अंततः बिछड़ना ही पड़ता है?
लेकिन जिंदगी के पास शायद उसके प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं था।
फिर अचानक एक समय आया।
अविनाश के जीवन में अनामिका आई।
पहली बार उसे लगा कि शायद अब उसकी भटकन समाप्त हो गई है। अनामिका के साथ जीवन में वह सहजता थी जिसे पाने के लिए वह वर्षों से अनजाने में भटक रहा था। दोनों धीरे-धीरे एक-दूसरे की आदत, एक-दूसरे की चिंता और एक-दूसरे की दुनिया बन गए।
फिर उनके जीवन में एक और रिश्ता आया-उनका बेटा अमरीश ।
अमरीश के जन्म के साथ अनामिका और अविनाश का संसार जैसे पूरा हो गया था। बच्चे की पहली मुस्कान, उसकी छोटी-छोटी जरूरतें, उसकी पढ़ाई, उसके भविष्य की चिंता और उसके लिए देखे गए सपने-इन सबने उनके जीवन को एक नई दिशा दी।
अब जीवन केवल दो लोगों का नहीं था।
उनके सामने एक नन्हा भविष्य था, जिसके लिए उन्हें वर्तमान को सँवारना था।
अविनाश ने धीरे-धीरे समझा कि पिता बनना केवल बच्चे को जन्म देना नहीं, बल्कि उसके सपनों की रक्षा करने की जिम्मेदारी उठाना भी है।
अनामिका और अमरीश ने उसके जीवन में एक ऐसी पूर्णता ला दी थी जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
घर अब केवल दीवारों और छत का नाम नहीं था।
घर का अर्थ था-अनामिका की आवाज, अमरीश की हँसी और उन दोनों के बीच बसा हुआ एक छोटा-सा संसार।
वर्ष बीतते गए।
जीवन में परेशानियाँ आईं, चिंताएँ आईं, असफलताएँ आईं, लेकिन अविनाश चलता रहा।
कभी किसी फिल्मी गीत की पंक्ति की तरह वह मन ही मन कहता-
“जिंदगी का साथ निभाता चला गया,
हर फिक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया।”
शायद वह सचमुच फिक्र को धुएँ में उड़ाता नहीं था। वह उन्हें अपने भीतर दबाकर आगे बढ़ता था, क्योंकि उसे पता था कि उसके रुक जाने से केवल उसका जीवन नहीं रुकेगा-अमरीश का भविष्य भी रुक जाएगा।
इसलिए वह हर कठिनाई के सामने खड़ा रहा।
थकता था, मगर रुकता नहीं था।
टूटता था, मगर झुकता नहीं था।
क्योंकि घर में एक बच्चा था, जिसकी आँखों में उसके भविष्य के सपने थे।
फिर अचानक एक वक्त ऐसा आया जब अविनाश के जीवन से उसका सबसे बड़ा सहारा छीन लिया।
अनामिका भी अचानक चली गई।
जिस व्यक्ति के साथ उसने जीवन का अर्थ पाया था, वही एक दिन उसके जीवन से चली गई।
अविनाश को लगा जैसे किसी ने उसके घर से केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि घर की आवाज ही उठा ली हो।
कमरे वही थे।
दीवारें वही थीं।
सामान वही था।
घड़ी भी उसी तरह चल रही थी।
लेकिन समय जैसे रुक गया था।
अनामिका के जाने के बाद पहली बार उसे अपने दुःख से अधिक अमरीश का चेहरा दिखाई दिया।
उसने देखा-एक बच्चा अपनी माँ को खो चुका है।
और उसी क्षण अविनाश ने अपने आँसुओं को रोक लिया।
उसका अपना दुःख बहुत बड़ा था, लेकिन अमरीश का दुःख उससे भी बड़ा था।
वह चाहता तो अपने कमरे में बंद होकर टूट सकता था।
चाहता तो दुनिया से शिकायत कर सकता था।
चाहता तो ईश्वर से हजार सवाल कर सकता था।
लेकिन वह जानता था कि अमरीश को अभी पिता चाहिए।
उसे माँ की कमी कोई पूरी नहीं कर सकता था, लेकिन पिता का हाथ तो चाहिए।
उस दिन अविनाश ने अपने भीतर एक कठिन निर्णय लिया-
अब वह अपने लिए नहीं, अमरीश के लिए जिएगा।
यह कहना आसान था, निभाना कठिन।
क्योंकि हर सुबह अनामिका की अनुपस्थिति उसे फिर से तोड़ देती थी।
नाश्ते की मेज पर एक खाली जगह।
घर में एक शांत कमरा।
त्योहारों की एक अधूरी खुशी।
किसी परिचित वस्तु पर अचानक अनामिका की याद।
और रात में वह सन्नाटा जिसमें कभी दोनों देर तक बातें किया करते थे।
हर चीज उसे भीतर तक चीरती थी।
लेकिन जैसे ही उसकी नजर अमरीश पर पड़ती, वह अपने आँसू पोंछ लेता।
वह सोचता-
“मुझे अभी नहीं टूटना है।”
“अमरीश को मेरी जरूरत है।”
“उसके भविष्य के लिए मुझे खड़ा रहना है।”
और यही जिम्मेदारी धीरे-धीरे उसके जीने का कारण बन गई।
अब उसकी अपनी इच्छाएँ छोटी होती जा रही थीं और अमरीश के सपने बड़े।
वह अपने अकेलेपन को लेकर जितना दुखी होता, अमरीश की पढ़ाई और भविष्य को लेकर उतना ही सजग हो जाता।
उसे महसूस हुआ कि शायद भगवान ने उसके जीवन से अनामिका को तो छीन लिया, लेकिन अमरीश को उसके पास छोड़कर यह संदेश भी दिया है कि-
“तुम्हारी यात्रा अभी पूरी नहीं हुई।”
अमरीश अब केवल उसका बेटा नहीं था।
वह अनामिका की जीवित स्मृति था।
उसकी आँखों में उसे अनामिका की झलक दिखाई देती थी।
उसकी मुस्कान में उसकी माँ का अक्स।
उसकी बातों में अनामिका की आवाज।
और शायद इसी कारण अमरीश की देखभाल करते हुए अविनाश को ऐसा लगता था जैसे वह केवल बेटे को नहीं पाल रहा, बल्कि अनामिका की छोड़ी हुई सबसे अनमोल निशानी को संभाल रहा है।
एक रात वह अकेला बैठा अपने जीवन के पुराने पन्ने पलट रहा था।
मधु ।
सुनैना ।
राधा ।
अनामिका।
और फिर अमरीश ।
उसने महसूस किया कि उसकी जिंदगी में हर बिछोह के बाद कोई न कोई जिम्मेदारी उसे फिर खड़ा करती रही।
मधु के जाने के बाद वह बड़ा हुआ।
सुनैना के जाने के बाद उसने जीवन की कठोरता स्वीकार की।
राधा के जाने के बाद उसने अकेलेपन को समझा।
और अनामिका के जाने के बाद उसने जाना कि अकेले जीना और किसी के लिए जीना दो अलग-अलग बातें हैं।
अब वह अमरीश के लिए जी रहा था।
अपने लिए नहीं।
अपनी अधूरी इच्छाओं के लिए नहीं।
अपनी शिकायतों के लिए नहीं।
बल्कि उस बच्चे के भविष्य के लिए, जिसकी आँखों में उसकी माँ की छवि और पिता की उम्मीद दोनों थीं।
धीरे-धीरे अविनाश को समझ में आने लगा कि मनुष्य को हमेशा जीने के लिए बड़ी वजहों की जरूरत नहीं होती।
कभी-कभी एक छोटा-सा हाथ ही पर्याप्त होता है।
एक आवाज-
“पापा...”
और आदमी अपने सारे दर्द को कुछ देर के लिए भूल जाता है।
यही अमरीश था।
अविनाश के जीवन का वह छोटा-सा दीपक, जो अनामिका के चले जाने के बाद अंधेरे घर में जलता रह गया था।
अब भी कभी-कभी रात में अविनाश आकाश की ओर देखता है और सोचता है-क्या अनामिका कहीं से अमरीश को देख रही होगी?
क्या उसे पता होगा कि उसका बेटा ठीक है?
क्या उसे यह दिखाई देता होगा कि उसका पिता टूटकर भी उसके लिए खड़ा है?
इन प्रश्नों का उत्तर कोई नहीं देता।
लेकिन अविनाश को अब उत्तर की आवश्यकता भी नहीं थी।
उसने अपने जीवन को एक नए अर्थ में स्वीकार कर लिया था।
शायद प्रेम का सबसे कठिन रूप यही है-
जब प्रिय व्यक्ति सामने न हो, तब भी उसके लिए जीते रहना।
अनामिका उसके साथ नहीं थी, लेकिन उसके सपने अमरीश में जीवित थे।
उसकी सुनैना अमरीश में जीवित थी।
उसकी स्मृतियाँ घर की हर दीवार में थीं।
और उसका प्रेम अविनाश के भीतर था।
इसलिए अब वह अपने भाग्य को कोसता नहीं था।
हाँ, कभी-कभी रोता था।
कभी शिकायत भी करता था।
लेकिन फिर अमरीश को देखता और चुप हो जाता।
उसे लगता-शायद जिंदगी ने उससे बहुत कुछ छीन लिया है, लेकिन अभी एक जिम्मेदारी बाकी है।
अभी एक भविष्य बनाना बाकी है।
अभी एक बच्चे को उसके मुकाम तक पहुँचाना बाकी है।
अभी अनामिका के सपनों को पूरा करना बाकी है।
और शायद यही कारण है कि अविनाश आज भी चल रहा है।
थका हुआ।
टूटा हुआ।
अकेला।
लेकिन चलता हुआ।
क्योंकि उसे अब अपने जीवन से कोई बड़ी मांग नहीं है।
बस एक इच्छा है-
अमरीश की आँखों में वह भविष्य देख सके, जिसे अनामिका ने उसके लिए सपना था।
एक दिन शायद अमरीश अपने पैरों पर खड़ा होगा।
शायद वह अपने पिता के कंधे पर हाथ रखकर कहेगा-
“पापा, अब आप आराम कीजिए।”
उस दिन शायद अविनाश पहली बार खुलकर रो सकेगा।
और शायद उस रोने में दुःख से अधिक संतोष होगा।
क्योंकि तब वह कह सकेगा-
“अनामिका, देखो... तुम्हारा अमरीश ठीक है।”
उस दिन शायद उसकी जिंदगी की सबसे लंबी यात्रा पूरी होगी।
लेकिन तब तक वह चलता रहेगा।
हर फिक्र को सचमुच धुएँ में उड़ाते हुए नहीं, बल्कि हर फिक्र को जिम्मेदारी में बदलते हुए।
क्योंकि अब उसे पता है-
बिछड़े सभी बारी-बारी।
कोई बचपन में छूटा।
कोई जीवन के बीच में।
कोई समय के साथ।
और कोई मृत्यु के हाथों।
लेकिन हर किसी ने उसके भीतर कुछ छोड़ दिया।
मधु ने प्रेम छोड़ा।
सुनैना ने जीवन का कठोर सत्य छोड़ा।
राधा ने स्मृति छोड़ी।
अनामिका ने प्रेम की पूर्णता और अमरीश को छोड़ा।
और अमरीश ने उसे जीने की वजह दे दी।
इसलिए कहानी अभी खत्म नहीं हुई।
शायद जिंदगी ने अविनाश से कहा है-
“तुम्हें अभी जाना नहीं है।
तुम्हें अभी एक बच्चे का भविष्य लिखना है।”
और अविनाश चुपचाप उठता है।
आँखों की नमी पोंछता है।
अमरीश की ओर देखता है।
और फिर जिंदगी का साथ निभाता चला जाता है।
क्योंकि कभी-कभी मनुष्य अपने लिए नहीं जीता।
किसी की स्मृति के लिए जीता है।
किसी के सपने के लिए जीता है।
और कभी-कभी केवल एक बच्चे की आँखों में अपना पूरा संसार देखकर जीता चला जाता है।
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