साहित्य जगत की शान थे डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव, हिंदी साहित्य, शोध और संपादन के क्षेत्र में छोड़ी अमिट छाप

शताब्दी जन्मदिवस विशेष: 28 अक्टूबर

साहित्य जगत की शान थे डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव, हिंदी साहित्य, शोध और संपादन के क्षेत्र में छोड़ी अमिट छाप

दुर्गेश मोहन 

पटना। भारतीय साहित्य जगत में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनकी विद्वत्ता, साधना, साहित्यिक दृष्टि और सृजनशीलता समय की सीमाओं को पार कर आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहती है। डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव ऐसे ही बहुआयामी प्रतिभा के धनी साहित्यकार, प्रखर आलोचक, शोधकर्ता, कवि और संपादक थे। उन्होंने हिंदी साहित्य को समृद्ध करने के साथ-साथ भारतीय ज्ञान-परंपरा, संस्कृत, पाली, प्राकृत, अपभ्रंश, जैन दर्शन और बौद्ध धर्म से संबंधित साहित्य के अध्ययन एवं प्रचार-प्रसार में भी उल्लेखनीय योगदान दिया। उनकी विद्वत्ता का दायरा केवल पुस्तकों और शोधपत्रों तक सीमित नहीं था, बल्कि वे साहित्य को भारतीय जीवन, संस्कृति, संवेदना और मानवीय मूल्यों की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम मानते थे।

28 अक्टूबर को उनकी जन्मशती के अवसर पर उनका साहित्यिक जीवन, उनका विराट कृतित्व और हिंदी भाषा के प्रति उनका समर्पण एक बार फिर स्मरण किया जा रहा है। डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव का जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्ची साहित्य-साधना केवल रचनाएं लिखने तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह ज्ञान के संरक्षण, विचारों के परिष्कार, नई पीढ़ी के निर्माण और समाज की सांस्कृतिक चेतना को जागृत करने का भी माध्यम होती है।

धौनी से साहित्य जगत तक का प्रेरणादायी सफर

डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव का जन्म 28 अक्टूबर, 1926 को शुंभेश्वर नाथ के घर धौनी, दुमका में हुआ था। बचपन से ही उन्हें अध्ययन, चिंतन और साहित्य के प्रति अनुराग प्राप्त हुआ। उनके साहित्यिक संस्कारों के निर्माण में उनके ताऊ पंडित रामेश्वर पाठक तथा पंडित नरसिंह मोहन मिश्र का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा। इन्हीं प्रेरणास्रोतों के माध्यम से उनकी प्रतिभा को दिशा मिली और साहित्य के प्रति उनकी अभिरुचि निरंतर विकसित होती गई।

उन्होंने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियां प्राप्त कीं। वे एमए की तीन उपाधियों से विभूषित थे तथा उन्होंने पीएचडी की उपाधि भी प्राप्त की। उनकी शैक्षणिक उपलब्धियां केवल डिग्रियों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने अपने अध्ययन को गंभीर शोध, साहित्यिक विवेचन और भारतीय ज्ञान-परंपरा की व्याख्या में रूपांतरित किया।

उनका गृहस्थ जीवन धर्मपत्नी लता रंजन के साथ सुखपूर्वक आगे बढ़ा। पारिवारिक जीवन की जिम्मेदारियों के निर्वहन के साथ-साथ साहित्य के प्रति उनकी निष्ठा सदैव बनी रही। उनकी जीवनयात्रा में अध्ययन, अध्यापन, शोध, लेखन, संपादन और साहित्यिक संवाद का विशेष स्थान था।

बिहार राष्ट्रभाषा परिषद में 26 वर्षों की साहित्यिक सेवा

डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव के साहित्यिक जीवन का एक महत्त्वपूर्ण अध्याय बिहार राष्ट्रभाषा परिषद से जुड़ा रहा। उन्होंने लगभग 26 वर्षों तक परिषद की पत्रिका के संपादक तथा उपनिदेशक, शोध के रूप में अपनी सेवाएं दीं। इस अवधि में उन्होंने साहित्यिक सामग्री के चयन, शोधपरक लेखों के प्रकाशन, पुस्तकों के मूल्यांकन और हिंदी साहित्य के विकास से संबंधित अनेक महत्त्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया।

संपादन उनके लिए केवल सामग्री को व्यवस्थित करने का कार्य नहीं था, बल्कि साहित्यिक गुणवत्ता, विचारों की स्पष्टता और भाषा की गरिमा को स्थापित करने का एक गंभीर दायित्व था। वे रचनाओं की विषयवस्तु, भाषा, दृष्टिकोण और शोधपरक महत्त्व को ध्यान में रखते हुए साहित्यिक मूल्यांकन करते थे। अन्वेषण, विवेचन, मूल्यांकन, संवर्धन तथा साहित्य के प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही।

उनकी संपादकीय दृष्टि में विद्वत्ता के साथ-साथ साहित्यिक शुचिता का भी विशेष महत्त्व था। वे मानते थे कि साहित्यकार का व्यक्तित्व और चरित्र उसकी रचनात्मक विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं। इसी संदर्भ में आचार्य शिवपूजन सहाय की साहित्यिक एवं सामाजिक मान्यताओं का उल्लेख करते हुए उन्होंने साहित्य-सेवा में शुचिता और चरित्र की सर्वोच्चता को रेखांकित किया था।

डॉ. सूरिदेव ने अपने संपादन-कर्म से अनेक लेखकों, शोधकर्ताओं और साहित्यप्रेमियों को मंच प्रदान किया। उनके माध्यम से साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित सामग्री को गंभीर अध्ययन और विमर्श की दिशा मिली। उनका यह योगदान हिंदी साहित्य के संस्थागत विकास की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण माना जाना चाहिए।

भारतीय ज्ञान-परंपरा के गंभीर अध्येता

डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव की विद्वत्ता का विस्तार हिंदी साहित्य से कहीं अधिक व्यापक था। संस्कृत, पाली, प्राकृत और अपभ्रंश जैसी भाषाओं के साहित्य के साथ-साथ जैन धर्म और बौद्ध धर्म के अध्ययन में भी उनकी गहरी रुचि थी। भारतीय दर्शन, प्राचीन साहित्य और सांस्कृतिक विरासत के प्रति उनकी दृष्टि शोधपरक तथा विश्लेषणात्मक थी।

उन्होंने प्राचीन भारतीय साहित्य को केवल ऐतिहासिक धरोहर के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसमें निहित जीवन-दर्शन, सांस्कृतिक चेतना और मानवीय अनुभूतियों को समझने का प्रयास किया। उनके अध्ययन में भाषा, साहित्य, दर्शन और संस्कृति के बीच एक स्वाभाविक संबंध दिखाई देता है।

उनकी पीएचडी का विषय ‘वासुदेव हिंदी: भारतीय जीवन और संस्कृति की बृहत कथा’ बताया गया है। यह विषय भारतीय जीवन और संस्कृति के व्यापक परिप्रेक्ष्य में हिंदी साहित्य के अध्ययन की उनकी दृष्टि को सामने लाता है। उनके शोध और लेखन का उद्देश्य ज्ञान को सीमित अकादमिक दायरे से बाहर निकालकर पाठकों के लिए उपयोगी तथा बोधगम्य बनाना भी था।

उनकी विद्वत्ता का एक उल्लेखनीय पक्ष यह था कि वे प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करते हुए उनके साहित्यिक सौंदर्य, सांस्कृतिक संदर्भ और मानवीय संदेश को एक साथ देखने का प्रयास करते थे। इसीलिए उनका साहित्य केवल जानकारी प्रदान करने वाला साहित्य नहीं, बल्कि पाठक को विचार करने और अपनी सांस्कृतिक विरासत को नए दृष्टिकोण से समझने के लिए प्रेरित करने वाला साहित्य भी था।

‘मेघदूत : एक अनुचिंतन’ में प्रकृति और मानवीय संवेदना का अद्भुत समन्वय

डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव की महत्त्वपूर्ण कृतियों में ‘मेघदूत : एक अनुचिंतन’ का विशेष स्थान है। महाकवि कालिदास के अमर काव्य ‘मेघदूत’ पर केंद्रित यह कृति उनकी गंभीर अध्ययनशीलता, सूक्ष्म साहित्यिक दृष्टि और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का परिचय देती है।

कालिदास के ‘मेघदूत’ में विरह, प्रेम, प्रकृति, कल्पना और मानवीय अनुभूतियों का अद्भुत समन्वय मिलता है। डॉ. सूरिदेव ने इस काव्य के सौंदर्य को समझने के लिए उसके साहित्यिक तथा भावात्मक पक्षों पर विचार किया। उनके विवेचन में प्रकृति केवल दृश्य-सौंदर्य का माध्यम नहीं, बल्कि मनुष्य के अंतर्मन की अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने वाली सजीव शक्ति के रूप में उपस्थित होती है।

इस कृति के संबंध में आचार्य नलिन विलोचन शर्मा ने भूमिका लिखी थी, जो इसके साहित्यिक महत्त्व का उल्लेखनीय संदर्भ है।

डॉ. सूरिदेव ने प्रकृति और मानवीय वेदना के संबंध को जिस संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया, वह उनकी साहित्यिक दृष्टि की विशेषता है। उन्होंने कालिदास की काव्य-दृष्टि के संदर्भ में लिखा कि कवि ने मेघदूत के प्रकृति-सौंदर्य में मानव की करुण अनुभूतियों का दर्शन किया और प्रकृति की अनंत छवियों के माध्यम से मनुष्य की चिरसंचित वेदनाओं का गुंफन किया है।

उनके विवेचन में विरह से व्याकुल यक्ष का संदेशवाहक मेघ केवल एक प्राकृतिक दृश्य नहीं रह जाता, बल्कि वह विश्व की चिरंतन व्यथा और मानवीय संवेदना का प्रतीक बन जाता है। मेघ के माध्यम से कवि ने प्रेम, प्रतीक्षा, स्मृति और विरह को ऐसी अभिव्यक्ति प्रदान की है, जो समय और स्थान की सीमाओं से परे जाकर पाठक के हृदय को स्पर्श करती है।

डॉ. सूरिदेव की यह व्याख्यात्मक दृष्टि बताती है कि वे प्राचीन काव्य का अध्ययन केवल उसके कथ्य या शिल्प के आधार पर नहीं करते थे, बल्कि उसके भीतर छिपे जीवन-दर्शन और मानवीय अनुभवों को भी सामने लाते थे। यही विशेषता उन्हें एक गंभीर आलोचक और साहित्य-मर्मज्ञ के रूप में प्रतिष्ठित करती है।

‘बहुत है’ : गीतों में किशोर मन की सहज अभिव्यक्ति

डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव केवल गंभीर शोधकर्ता और आलोचक ही नहीं, बल्कि संवेदनशील कवि भी थे। उनकी काव्य-प्रतिभा का परिचय ‘बहुत है’ शीर्षक गीत-संग्रह से मिलता है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इस संग्रह की रचनाएं 1956 से 1963 के बीच लिखी गईं और इसमें 56 गीत संकलित हैं। इसकी भूमिका डॉ. विमल कुमार ने लिखी थी।

यह संग्रह किशोर मन की सहज भावनाओं, प्रकृति के आकर्षण, प्रेम की कोमलता और जीवन की सरल अनुभूतियों को अभिव्यक्त करता है। इसकी भाषा में सहजता है और भावों में स्वाभाविक प्रवाह। यही कारण है कि यह पाठकों के हृदय तक सीधे पहुंचने की क्षमता रखता है।

इस संग्रह का एक गीत साहित्यप्रेमियों के लिए विशेष रूप से स्मरणीय है—

“चांद चांदनी के होठों से लेता लोल लहर का चुम्बन,
सौरभ का सागर दे जाता सरिता सांसों को आमंत्रण।
खिलती कलियों से हंसकर जब, मधुकर करता बात बहुत है,
आती उनकी याद बहुत है।”

इन पंक्तियों में प्रकृति का सौंदर्य, कल्पना की कोमलता और अनुभूतियों का मधुर प्रवाह दिखाई देता है। चांद, चांदनी, लहर, सौरभ, सरिता, कलियां और मधुकर जैसे प्राकृतिक बिंबों के माध्यम से कवि ने जीवन की भावनात्मक दुनिया को साकार किया है।

इन पंक्तियों की विशेषता यह है कि प्रकृति यहां निर्जीव दृश्य नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना से परिपूर्ण संसार है। चांदनी के होंठ, लहर का चुंबन और कलियों से मधुकर का संवाद काव्य-कल्पना को जीवंत बना देते हैं। यह सहजता ही गीतों की लोकप्रियता और स्थायी प्रभाव का आधार बनती है।

डॉ. सूरिदेव का मानना था कि प्रत्येक कवि के भीतर एक दर्शन होता है, चाहे वह प्राचीन हो अथवा आधुनिक। वह दर्शन उसकी रचनाओं के माध्यम से अभिव्यक्त होता है। उनकी यह मान्यता उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की गहराई को प्रकट करती है। उनके लिए कविता केवल शब्दों का सुंदर संयोजन नहीं, बल्कि जीवन को देखने और समझने की एक विशिष्ट दृष्टि थी।

विविध विधाओं में समृद्ध साहित्यिक योगदान

डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव का साहित्यिक अवदान अनेक विधाओं में फैला हुआ था। उन्होंने आलोचना, शोध, कविता, संपादन, अनुवाद, बाल साहित्य और स्मृति-ग्रंथों के संपादन जैसे क्षेत्रों में कार्य किया। उनकी प्रमुख कृतियों और संपादकीय कार्यों में ‘वासुदेव हिंदी: भारतीय जीवन और संस्कृति की बृहत कथा’, ‘मेघदूत : एक अनुचिंतन’, ‘गीत-संगम’, ‘बहुत है’, ‘प्राकृत से हिंदी’, ‘सिंहासन बत्तीसी’ का संस्कृत से हिंदी रूपांतरण तथा ‘पाटलिपुत्र की धरोहर’ जैसी रचनाओं का उल्लेख किया जाता है।

इसके अतिरिक्त रामजी मिश्र मनोहर से संबंधित अभिनंदन ग्रंथ, ‘जीवन दर्पण’, आचार्य शिवपूजन सहाय की ‘दैनंदिनी’ के प्रथम खंड, ‘स्मृति शेष आर्य पुत्र : पंडित राम नारायण शास्त्री’ तथा अन्य स्मृति-ग्रंथों के संपादन से भी उनका नाम जुड़ा रहा।

इन कृतियों के माध्यम से उन्होंने साहित्यिक परंपरा के संरक्षण, प्राचीन ग्रंथों की उपलब्धता, विद्वानों के योगदान के दस्तावेजीकरण और हिंदी पाठकों तक विविध ज्ञान-सामग्री पहुंचाने में योगदान दिया।

‘प्राकृत से हिंदी’ जैसे कार्य उनकी भाषिक रुचि और भारतीय भाषाओं के बीच संवाद स्थापित करने की प्रवृत्ति को दर्शाते हैं। संस्कृत से हिंदी में रूपांतरण का उनका प्रयास भी भारतीय साहित्य की समृद्ध परंपरा को व्यापक पाठक-वर्ग तक पहुंचाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण था।

उनके साहित्यिक कार्यों का मूल्यांकन करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि उन्होंने केवल मौलिक लेखन ही नहीं किया, बल्कि अनेक ऐसे ग्रंथों और साहित्यिक व्यक्तित्वों को भी पाठकों के सामने लाने का प्रयास किया, जिनका अध्ययन हिंदी साहित्य और भारतीय संस्कृति को समझने के लिए उपयोगी है।

बाल साहित्य के माध्यम से ज्ञान और मनोरंजन का संगम

डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव के साहित्यिक व्यक्तित्व का एक आकर्षक पक्ष उनका बाल साहित्य भी था। वे मानते थे कि बच्चों के लिए साहित्य ऐसा होना चाहिए, जिसमें मनोरंजन के साथ ज्ञान, कल्पनाशीलता और नैतिक बोध का समावेश हो।

‘पिटारी की रानी’, ‘बेताल का बदला’ और ‘काठ की तलवार’ जैसी बाल रचनाओं के माध्यम से उन्होंने बाल पाठकों की रुचि को ध्यान में रखते हुए साहित्य सृजन किया। बाल साहित्य में सरल भाषा, रोचक कथानक और कल्पना की स्वतंत्रता का विशेष महत्त्व होता है। इन तत्त्वों के माध्यम से बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित होती है तथा वे अपने आसपास के संसार को समझना सीखते हैं।

बच्चों के लिए लेखन को सामान्यतः साहित्य की सरल विधा मान लिया जाता है, जबकि वास्तव में यह अत्यंत जिम्मेदारी का कार्य है। बाल मन की संवेदनशीलता को समझते हुए ऐसी रचनाएं लिखना, जो बच्चों को आकर्षित भी करें और उनके बौद्धिक विकास में सहायक भी हों, विशेष रचनात्मक क्षमता की मांग करता है।

डॉ. सूरिदेव ने बाल साहित्य को अपने व्यापक साहित्यिक दायित्व का हिस्सा बनाया। यह उनके व्यक्तित्व की उस उदारता को दर्शाता है, जिसमें गंभीर शोध और आलोचना के साथ-साथ बच्चों की कल्पनाशील दुनिया के लिए भी स्थान था।

संपादन की विशिष्ट परंपरा और साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ाव

डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव का संपादकीय जीवन भी उनके साहित्यिक व्यक्तित्व का महत्त्वपूर्ण अंग था। ‘साहित्य’, ‘परिषद पत्रिका’, ‘अभिनव प्रत्यक्ष’ और ‘धर्मायण’ जैसी पत्रिकाओं से उनके संपादकीय कार्य का संबंध रहा। उन्होंने संपादन को साहित्यिक संस्कारों के प्रसार, विचारों के आदान-प्रदान और शोधपरक सामग्री के संरक्षण का माध्यम बनाया।

उन्हें संपादन की कला और दृष्टि के विकास में आचार्य शिवपूजन सहाय तथा आचार्य नलिन विलोचन शर्मा से प्रेरणा मिली थी। इन विद्वानों की साहित्यिक परंपरा में भाषा की शुद्धता, विचारों की गंभीरता और रचना की गुणवत्ता को महत्त्व दिया जाता था। डॉ. सूरिदेव ने भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।

उनके पास बिहार सहित देश के अन्य क्षेत्रों के विद्वानों की पुस्तकें समीक्षा के लिए आती थीं। इससे उनकी साहित्यिक प्रतिष्ठा और आलोचनात्मक दृष्टि पर विद्वानों के विश्वास का परिचय मिलता है। पुस्तक-समीक्षा को वे केवल प्रशंसा या आलोचना तक सीमित रखने के बजाय कृति के गुण-दोष, विषयवस्तु, प्रस्तुति और साहित्यिक महत्त्व को समझने का माध्यम मानते थे।

उन्होंने अनेक स्मारिकाओं और ग्रंथों के संपादन में भी योगदान दिया। ऐसे कार्यों का महत्त्व इसलिए बढ़ जाता है, क्योंकि वे किसी साहित्यिक संस्था, व्यक्तित्व या परंपरा से संबंधित सामग्री को व्यवस्थित रूप में सुरक्षित रखते हैं। यह साहित्यिक इतिहास के निर्माण में सहायक होता है।

उनका योगदान इस अर्थ में भी उल्लेखनीय है कि उन्होंने साहित्यिक संस्थानों में काम करते हुए शोध, आलोचना और संपादन के बीच एक सार्थक संबंध स्थापित किया। उनके लिए साहित्य का विकास सामूहिक प्रयास का परिणाम था, जिसमें लेखक, संपादक, समीक्षक और पाठक सभी की भूमिका होती है।

संस्कृत साधना और ‘अक्षर भारती’

डॉ. सूरिदेव की संस्कृत के प्रति गहरी रुचि थी। ‘अक्षर भारती’ नामक उनकी संस्कृत-साधना से संबंधित रचना को भी उनके साहित्यिक योगदान के संदर्भ में स्मरण किया जाता है। संस्कृत और अन्य प्राचीन भारतीय भाषाओं के अध्ययन में उनकी रुचि यह दर्शाती है कि वे भारतीय साहित्य की जड़ों को समझने के लिए मूल स्रोतों तक पहुंचने के पक्षधर थे।

उनके लिए भारतीय ज्ञान-परंपरा का अध्ययन केवल अतीत की प्रशंसा करना नहीं था, बल्कि उसके विचारों, भाषिक उपलब्धियों और सांस्कृतिक मूल्यों को समझना भी था। वे प्राचीन साहित्य की व्याख्या करते हुए उसकी प्रासंगिकता को वर्तमान पाठक तक पहुंचाने का प्रयास करते थे।

हिंदी साहित्य को समृद्ध करने के लिए भारतीय भाषाओं और उनके साहित्यिक इतिहास का अध्ययन आवश्यक है। डॉ. सूरिदेव का जीवन इस आवश्यकता को रेखांकित करता है। उन्होंने भाषाओं के पारस्परिक संबंधों और साहित्यिक परंपराओं के अध्ययन के माध्यम से हिंदी के व्यापक स्वरूप को समझने की दिशा में कार्य किया।

जैन दर्शन के ज्ञाता और विद्वानों के बीच प्रतिष्ठित व्यक्तित्व

डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव जैन धर्म और दर्शन के भी गंभीर अध्येता थे। उन्होंने जैन दर्शन से संबंधित शोधपरक विषयों में रुचि ली और विद्वत् सम्मेलनों में अपने विचार प्रस्तुत किए। उनके एक पत्र में दिल्ली में जैन दर्शन से संबंधित शोधपूर्ण आलेख पढ़ने का उल्लेख मिलता है। उनके अनुसार, उस कार्यक्रम की अध्यक्षता ऑक्सफोर्ड से जुड़े विद्वान प्रोफेसर मतीलाल कर रहे थे।

आलेख-वाचन के बाद प्रोफेसर मतीलाल ने उनके कार्य की प्रशंसा करते हुए ‘वेरी नाइस’ कहा था। डॉ. सूरिदेव ने इस प्रसंग को अपने पत्र में उल्लेखित किया। यह प्रसंग उनके शोधकार्य के प्रति प्राप्त विद्वत् सराहना का संकेत देता है।

जैन दर्शन, बौद्ध धर्म और भारतीय दार्शनिक परंपराओं के अध्ययन में भाषाओं तथा मूल ग्रंथों का ज्ञान अत्यंत उपयोगी होता है। डॉ. सूरिदेव की संस्कृत, पाली, प्राकृत और अपभ्रंश में रुचि ने उनके अध्ययन को व्यापक आधार प्रदान किया। उनकी विद्वत्ता का यही बहुआयामी स्वरूप उन्हें साहित्यिक और दार्शनिक विमर्श के क्षेत्र में विशिष्ट बनाता है।

सम्मान और पुरस्कारों से अलंकृत साहित्यिक जीवन

डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव की दीर्घ साहित्यिक साधना को विभिन्न संस्थाओं और प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा सम्मानित किया गया। उन्हें साहित्य, संस्कृत, हिंदी सेवा और जैन धर्म से संबंधित कार्यों के लिए अनेक सम्मान प्राप्त हुए।

उनके सम्मानों में भारतवर्षीय दिगंबर जैन महासभा की बिहार शाखा से प्राप्त सम्मान, बिहार के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. अखलाक उर रहमान द्वारा संस्कृत सम्मान तथा तत्कालीन राज्यपाल सुंदर सिंह भंडारी द्वारा सरस्वती विद्या मंदिर के शिलान्यास समारोह में सम्मानित किए जाने का उल्लेख मिलता है।

जैन धर्म के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड भी प्रदान किया गया। पटना सिटी की रंगमंच संस्था के संस्थापक एवं निदेशक विश्वनाथ शुक्ल ‘चंचल’ द्वारा उन्हें संस्कृति सौरभ सम्मान दिए जाने का भी उल्लेख है।

उनके जीवन का एक विशेष सम्मान हिंदी सेवा के क्षेत्र में प्राप्त हुआ। उपलब्ध विवरण के अनुसार, 30 मई, 2017 को राष्ट्रपति भवन में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा उन्हें वर्ष 2015 के विवेकानंद पुरस्कार के अंतर्गत हिंदी सेवा सम्मान से सम्मानित किया गया था।

इन सम्मानों का महत्त्व केवल व्यक्तिगत उपलब्धियों तक सीमित नहीं है। वे इस बात के भी परिचायक हैं कि साहित्यिक शोध, भाषा-सेवा, सांस्कृतिक अध्ययन और संपादन जैसे क्षेत्रों में निरंतर कार्य करने वाले विद्वानों का योगदान समाज के लिए कितना महत्त्वपूर्ण होता है।

साहित्यिक व्यक्तित्व की विशेषता : ज्ञान, विनम्रता और साधना

डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव का व्यक्तित्व अनेक विशेषताओं का संगम था। वे कवि थे, लेकिन केवल भावनाओं के संसार में सीमित नहीं थे। वे आलोचक थे, लेकिन केवल रचनाओं के गुण-दोष गिनाने तक उनकी भूमिका सीमित नहीं थी। वे शोधकर्ता थे, लेकिन उनका शोध केवल अकादमिक उपलब्धि अर्जित करने का साधन नहीं था। वे संपादक थे, लेकिन संपादन उनके लिए केवल संस्थागत जिम्मेदारी नहीं, बल्कि साहित्यिक संस्कृति के निर्माण का कार्य था।

उनकी रचनाओं और साहित्यिक गतिविधियों में भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान, भाषाओं के प्रति अनुराग और साहित्य की सामाजिक भूमिका के प्रति सजगता दिखाई देती है। उन्होंने साहित्य को जीवन से जोड़कर देखा और इस बात पर बल दिया कि साहित्य मनुष्य की अनुभूतियों, विचारों और नैतिक चेतना को समृद्ध करता है।

उनकी दृष्टि में साहित्य की उपयोगिता तत्कालीन लोकप्रियता से कहीं अधिक व्यापक थी। कोई रचना अपने समय के पाठकों को आनंद प्रदान करती है, लेकिन उसकी वास्तविक शक्ति तब सामने आती है, जब वह आने वाली पीढ़ियों को भी सोचने, समझने और अनुभव करने के लिए प्रेरित करे।

डॉ. सूरिदेव की साहित्यिक यात्रा इसी स्थायी प्रभाव की आकांक्षा से जुड़ी हुई थी। उनके शोध, आलोचना, गीत, अनुवाद और संपादन के कार्यों में ज्ञान के प्रति समर्पण तथा साहित्यिक मूल्यों के प्रति निष्ठा दिखाई देती है।

11 नवंबर 2018 को हुआ निधन, लेकिन साहित्यिक विरासत आज भी जीवित

डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव का निधन 11 नवंबर, 2018 को पटना में हुआ। उनके निधन से हिंदी साहित्य और भारतीय ज्ञान-परंपरा के अध्ययन के क्षेत्र में एक अनुभवी विद्वान का अवसान हुआ। उनका जाना साहित्यिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति थी।

लेकिन किसी साहित्यकार का जीवन केवल उसकी भौतिक उपस्थिति तक सीमित नहीं होता। उसकी रचनाएं, विचार, संपादकीय कार्य और ज्ञान-साधना उसे पाठकों तथा भावी पीढ़ियों के बीच जीवित रखते हैं। डॉ. सूरिदेव के साथ भी यही सत्य जुड़ा है। उनका साहित्यिक योगदान आज भी उन लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है, जो हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति, प्राचीन साहित्य और शोधपरक लेखन के क्षेत्र में काम करना चाहते हैं।

उनकी जन्मशती का अवसर केवल एक महान साहित्यकार को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि उनके कार्यों के पुनर्पाठ और मूल्यांकन का भी अवसर है। उनकी पुस्तकों को नई पीढ़ी तक पहुंचाना, उनके शोधपरक योगदान पर चर्चा करना, उनकी कविताओं और गीतों का अध्ययन करना तथा उनके संपादकीय कार्यों को संरक्षित करना साहित्य जगत की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

आज जब साहित्यिक दुनिया में त्वरित लोकप्रियता और तात्कालिक चर्चाओं को अधिक महत्त्व मिलने लगा है, तब डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव जैसे साहित्यकारों का जीवन हमें गंभीर अध्ययन, निरंतर साधना और बौद्धिक ईमानदारी का संदेश देता है। उन्होंने अपने कर्म से यह सिद्ध किया कि साहित्यिक प्रतिष्ठा का वास्तविक आधार निरंतर अध्ययन, विषय की गहरी समझ, भाषा के प्रति सम्मान और समाज के प्रति उत्तरदायित्व है।

साहित्य जगत की शान थे डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव

डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव का जीवन और कृतित्व हिंदी साहित्य की समृद्ध परंपरा का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने साहित्य को अनेक दिशाओं से समृद्ध किया। शोध और आलोचना के माध्यम से प्राचीन साहित्य की नई व्याख्याएं प्रस्तुत कीं, गीतों के माध्यम से संवेदनाओं को अभिव्यक्ति दी, बाल साहित्य के माध्यम से नई पीढ़ी से संवाद किया तथा संपादन के जरिए साहित्यिक विचारों और रचनाओं को व्यापक मंच प्रदान किया।

उनकी बहुआयामी प्रतिभा, साहित्य के प्रति समर्पण, भारतीय ज्ञान-परंपरा के प्रति अनुराग और विद्वानों के बीच प्रतिष्ठा उन्हें विशिष्ट स्थान प्रदान करती है। वे उन साहित्यकारों में थे, जिनका योगदान केवल उनकी प्रकाशित पुस्तकों में ही नहीं, बल्कि साहित्यिक संस्थाओं, पत्रिकाओं, शोध-परंपरा और भावी लेखकों के लिए निर्मित बौद्धिक वातावरण में भी देखा जा सकता है।

उनकी स्मृति में ये पंक्तियां मानो उनके व्यक्तित्व और साहित्यिक साधना को भावपूर्ण अभिव्यक्ति देती हैं-

“राज मालूम हुआ, अस्ल बयानी क्या है,
दिल में वो आग है, लफ्जों में समा भी न सकूं।”

डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव आज हमारे बीच सशरीर उपस्थित नहीं हैं, लेकिन उनकी साहित्य-साधना, उनकी रचनाएं और उनके विचार उन्हें सदैव जीवित रखेंगे। उनकी जन्मशती पर उन्हें स्मरण करना हिंदी साहित्य की उस गौरवशाली परंपरा को नमन करना है, जिसमें ज्ञान, संवेदना, संस्कृति और सृजन का अद्भुत समन्वय मिलता है।

निस्संदेह, डॉ. श्रीरंजन सूरिदेव साहित्य जगत की शान थे और रहेंगे। उनका जीवन साहित्य के प्रति समर्पण का उदाहरण है तथा उनका कृतित्व आने वाली पीढ़ियों को अध्ययन, शोध, सृजन और भाषा-सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता रहेगा।
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