(विजयादशमी — 2026)
नवरात्र की आराधना से,
मन में दिव्य प्रकाश है।
शक्ति, भक्ति और साधना का,
दिशि-दिशि में उल्लास है।
आह्वान है जनमानस में,
नवचेतना के संचार का।
दशहरा पर्व है, शक्ति के श्रृंगार का।।
सत्य की विजय-पताका फहरे,
धर्म का सम्मान हो।
न्याय, दया और प्रेम से,
जग का नव निर्माण हो।
गूँजे यश सनातन संस्कृति का,
विस्तार हो सद्विचार का।
दशहरा पर्व है, शक्ति के श्रृंगार का।।
राम के बाणों ने किया,
रावण का दंभ चकनाचूर।
सत्य के आगे टिक न पाया,
अभिमान में था चूर।
संकल्प करें मिटाने का,
अन्याय के अंधकार का।
दशहरा पर्व है, शक्ति के श्रृंगार का।।
महिषासुर का दर्प हरने,
माँ भवानी अवतरित हुईं।
दुष्टों का संहार करके,
धर्म-रक्षा हेतु उदित हुईं।
अवसर है नमन करने का,
शक्ति के अवतार का।
दशहरा पर्व है, शक्ति के श्रृंगार का।।
रावण केवल पुतला नहीं,
मन का अहंकार जलाएँ।
लोभ, कपट और द्वेष मिटाकर,
प्रेम-सुधा बरसाएँ।
हृदय में गूँजे विजय-गान,
आत्मबल की हुंकार का।
दशहरा पर्व है, शक्ति के श्रृंगार का।।
शस्त्र-पूजन के साथ जगाएँ,
ज्ञान-विवेक का मान।
साहस, सेवा, सत्य-संकल्प से,
बढ़े राष्ट्र की शान।
संकल्प लें हम सब मिलकर,
सशक्त राष्ट्र के विस्तार का।
दशहरा पर्व है, शक्ति के श्रृंगार का।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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दशहरा पर्व है, शक्ति के श्रृंगार का
कुमार महेंद्रनवरात्र की आराधना से,
मन में दिव्य प्रकाश है।
शक्ति, भक्ति और साधना का,
दिशि-दिशि में उल्लास है।
आह्वान है जनमानस में,
नवचेतना के संचार का।
दशहरा पर्व है, शक्ति के श्रृंगार का।।
सत्य की विजय-पताका फहरे,
धर्म का सम्मान हो।
न्याय, दया और प्रेम से,
जग का नव निर्माण हो।
गूँजे यश सनातन संस्कृति का,
विस्तार हो सद्विचार का।
दशहरा पर्व है, शक्ति के श्रृंगार का।।
राम के बाणों ने किया,
रावण का दंभ चकनाचूर।
सत्य के आगे टिक न पाया,
अभिमान में था चूर।
संकल्प करें मिटाने का,
अन्याय के अंधकार का।
दशहरा पर्व है, शक्ति के श्रृंगार का।।
महिषासुर का दर्प हरने,
माँ भवानी अवतरित हुईं।
दुष्टों का संहार करके,
धर्म-रक्षा हेतु उदित हुईं।
अवसर है नमन करने का,
शक्ति के अवतार का।
दशहरा पर्व है, शक्ति के श्रृंगार का।।
रावण केवल पुतला नहीं,
मन का अहंकार जलाएँ।
लोभ, कपट और द्वेष मिटाकर,
प्रेम-सुधा बरसाएँ।
हृदय में गूँजे विजय-गान,
आत्मबल की हुंकार का।
दशहरा पर्व है, शक्ति के श्रृंगार का।।
शस्त्र-पूजन के साथ जगाएँ,
ज्ञान-विवेक का मान।
साहस, सेवा, सत्य-संकल्प से,
बढ़े राष्ट्र की शान।
संकल्प लें हम सब मिलकर,
सशक्त राष्ट्र के विस्तार का।
दशहरा पर्व है, शक्ति के श्रृंगार का।।
कुमार महेंद्र
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