संघ, सत्ता और सनातन समाज: हिंदू संगठन की मूल अवधारणा से सर्वनियंत्रक राज्य की चुनौती तक
लेखक: डॉ. राकेश दत्त मिश्र
अत्यंत आदरणीय संतों, धर्माचार्यों और सनातन परंपरा के विद्वानों के मन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी, हिंदुत्व और सनातन धर्म के पारस्परिक संबंधों को लेकर अनेक जिज्ञासाएँ उठती रही हैं। आज सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हिंदू समाज के संगठन का वास्तविक उद्देश्य क्या है? क्या इसका उद्देश्य समाज में आत्मीयता, सद्भाव, राष्ट्रीय चेतना और एकता का प्रसार करना है, अथवा धीरे-धीरे समाज के धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन को एक केंद्रीय विचारधारा के अधीन लाने का प्रयास भी इसका हिस्सा बनता जा रहा है? यह प्रश्न किसी एक संगठन की आलोचना तक सीमित नहीं है, बल्कि भारतीय समाज की स्वायत्तता, सनातन धर्म की बहुलता, संतों और आचार्यों की प्रतिष्ठा तथा राज्य की शक्तियों की सीमा से जुड़ा हुआ है। इस विषय पर विचार करते समय आवश्यक है कि हम इतिहास को भावनाओं के बजाय तथ्यों के आधार पर समझें और वर्तमान परिस्थितियों का मूल्यांकन किसी संगठन के प्रति अंधसमर्थन अथवा अंधविरोध के बिना करें।
भारत में अंग्रेजी सत्ता का विस्तार केवल सैन्य शक्ति के माध्यम से नहीं हुआ था, बल्कि इसके पीछे व्यापारिक हित, राजनीतिक संधियाँ, भारतीय राज्यों के आपसी विवाद और औपनिवेशिक शासन की अनेक रणनीतियाँ भी थीं। ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में व्यापार करने आई थी, लेकिन धीरे-धीरे उसने राजनीतिक और सैन्य शक्ति अर्जित कर ली। प्लासी के युद्ध, बक्सर के युद्ध, सहायक संधियों और विभिन्न राज्यों के विलय की नीतियों ने अंग्रेजों की सत्ता का विस्तार किया। 1857 का विद्रोह इस विदेशी शासन के विरुद्ध एक व्यापक चुनौती बनकर सामने आया। इसमें सैनिकों, किसानों, स्थानीय शासकों और अनेक क्षेत्रों के लोगों ने भाग लिया। यद्यपि सभी के उद्देश्य समान नहीं थे, फिर भी इस संघर्ष ने अंग्रेजी शासन की नींव को हिला दिया। 1858 में ईस्ट इंडिया कंपनी से शासन ब्रिटिश क्राउन के हाथों में चला गया और भारत के बड़े हिस्से पर ब्रिटिश सत्ता का प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष नियंत्रण स्थापित हो गया। अनेक देशी रियासतें बनी रहीं, लेकिन उनकी स्वतंत्रता विभिन्न संधियों और राजनीतिक व्यवस्थाओं से सीमित थी। इसी ऐतिहासिक परिस्थिति में भारतीय राष्ट्रीय चेतना ने अनेक रूपों में विकास किया। क्रांतिकारी आंदोलन, कांग्रेस की राजनीति, सामाजिक सुधार, धार्मिक पुनर्जागरण और विभिन्न प्रांतीय आंदोलनों ने स्वतंत्रता की भावना को आगे बढ़ाया। इसलिए भारत की स्वतंत्रता का इतिहास किसी एक संगठन, एक विचारधारा अथवा एक व्यक्ति का इतिहास नहीं, बल्कि अनेक धाराओं के योगदान से निर्मित राष्ट्रीय संघर्ष का इतिहास है।
इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की। डॉ. हेडगेवार का जीवन उस समय विकसित हुआ, जब देश में स्वतंत्रता आंदोलन, क्रांतिकारी गतिविधियाँ और समाज-संगठन के अनेक प्रयोग चल रहे थे। उनका संपर्क कांग्रेस और राष्ट्रवादी गतिविधियों से रहा था। उन्होंने अनुभव किया कि राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष के साथ-साथ समाज के भीतर अनुशासन, संगठन, आत्मीयता और सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना विकसित करना भी आवश्यक है। संघ की मूल अवधारणा में हिंदू समाज के संगठन और राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण पर बल दिया गया। यहाँ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि समाज को संगठित करना और समाज पर नियंत्रण स्थापित करना क्या एक ही बात है? मेरे विचार में इन दोनों के बीच स्पष्ट अंतर है। संगठन का उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों के बीच विश्वास, सहयोग, अनुशासन और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व की भावना पैदा करना हो सकता है, लेकिन जब कोई संगठन यह मानने लगे कि समाज के प्रत्येक धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रश्न पर अंतिम निर्णय देने का अधिकार भी उसी के पास है, तब संगठन और नियंत्रण के बीच की सीमा समाप्त होने लगती है। किसी संगठन की सामाजिक प्रतिष्ठा उसे समाज की प्रत्येक संस्था पर अधिकार प्रदान नहीं कर सकती। डॉ. हेडगेवार की मूल प्रेरणा को समझने के लिए उनके लेखन, संघ के प्रारंभिक दस्तावेजों और समकालीन परिस्थितियों का अध्ययन आवश्यक है, लेकिन इतना निश्चित है कि संघ का प्रारंभिक स्वरूप आज के व्यापक राजनीतिक परिदृश्य से अलग था।
सनातन धर्म की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक उसकी विविधता है। यहाँ शैव, वैष्णव, शाक्त, स्मार्त, वेदांत की विभिन्न धाराएँ, भक्ति परंपराएँ, संतमत, लोकदेवताओं की उपासना और अनेक क्षेत्रीय धार्मिक परंपराएँ सदियों से विकसित होती रही हैं। इन परंपराओं में अनेक मतभेद हैं, लेकिन इन्हीं विविधताओं ने भारतीय धार्मिक जीवन को समृद्ध बनाया है। हिंदू समाज को किसी एक केंद्रीय संस्था अथवा एक ही विचारधारा के अधीन मान लेना इस ऐतिहासिक विविधता की उपेक्षा होगी। तीर्थयात्राएँ, धार्मिक मेले, पर्व, कुंभ, संत-समागम और सामुदायिक सेवा ने लोगों को अनेक अवसरों पर एक-दूसरे से जोड़ा है। दूसरी ओर जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता जैसी समस्याएँ भी भारतीय समाज के इतिहास का हिस्सा रही हैं, जिन्हें स्वीकार करके ही उनके समाधान की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। समाज की एकता का अर्थ यह नहीं कि उसकी विविधता मिटा दी जाए, बल्कि इसका अर्थ यह होना चाहिए कि विभिन्न परंपराएँ अपने मतभेदों के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान करें और व्यापक सामाजिक हित के लिए सहयोग करें। कोई भी संगठन हिंदू समाज को संगठित करने का प्रयास कर सकता है, लेकिन उसे संपूर्ण सनातन समाज का एकमात्र निर्णायक प्राधिकारी मान लेना अलग बात है। संतों, आचार्यों, मठों, मंदिरों और परंपरागत धार्मिक संस्थाओं की अपनी ऐतिहासिक प्रतिष्ठा है। उनका मार्गदर्शन समाज के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, परंतु किसी संगठनात्मक पद अथवा राजनीतिक शक्ति से स्वतः धार्मिक प्रामाणिकता प्राप्त नहीं हो जाती।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की संगठनात्मक पद्धति शाखा, अनुशासन, स्वयंसेवा और सामूहिक गतिविधियों पर आधारित रही है। समय के साथ संघ से जुड़े संगठनों ने शिक्षा, सेवा, छात्र जीवन, श्रमिक गतिविधियों, सामाजिक कार्यों और राजनीति सहित अनेक क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति विकसित की। संघ परिवार का यह विस्तार भारतीय सार्वजनिक जीवन में उसके बढ़ते प्रभाव का कारण बना। समर्थक इसे राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक सेवा और संगठनात्मक क्षमता के विकास के रूप में देखते हैं, जबकि आलोचक इसके व्यापक वैचारिक प्रभाव और राजनीति तथा सामाजिक संस्थाओं के बीच बढ़ते संबंधों पर प्रश्न उठाते हैं। इन दोनों दृष्टिकोणों का मूल्यांकन तथ्यों और परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। किसी संगठन का सामाजिक गतिविधियों में भाग लेना स्वाभाविक है, लेकिन संगठनात्मक प्रभाव को समाज के प्रत्येक क्षेत्र में निर्णायक अधिकार समझ लेना उचित नहीं होगा। किसी स्वयंसेवक को धार्मिक प्रश्नों पर अपना मत रखने का पूरा अधिकार है, किंतु केवल संगठनात्मक शक्ति के आधार पर किसी विशेष पूजा-पद्धति, धार्मिक परंपरा अथवा आध्यात्मिक व्याख्या को समूचे हिंदू समाज पर लागू करने का दावा नहीं किया जा सकता। धर्म के क्षेत्र में ज्ञान, साधना, परंपरा और आचार्यत्व का अपना महत्व है। साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि किसी संत अथवा आचार्य की प्रतिष्ठा का अर्थ यह नहीं है कि वे नागरिक अधिकारों और कानून से ऊपर हैं। भारतीय व्यवस्था में धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और संवैधानिक मर्यादाओं के बीच संतुलन आवश्यक है।
संघ के तीसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर के बाद बालासाहब देवरस के कार्यकाल में सामाजिक समरसता और अस्पृश्यता का प्रश्न विशेष रूप से चर्चा में आया। देवरस ने अस्पृश्यता को अनुचित बताते हुए उसके उन्मूलन की आवश्यकता पर बल दिया। यह प्रश्न किसी एक संगठन का आंतरिक विषय नहीं है, बल्कि समूचे भारतीय समाज की नैतिक जिम्मेदारी है। सामाजिक समरसता का वास्तविक अर्थ तभी पूरा होगा, जब प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान, अवसर और गरिमा मिले। शिक्षा, रोजगार, सार्वजनिक संसाधनों और धार्मिक स्थलों तक पहुँच में समानता सुनिश्चित करना आवश्यक है। परंतु सामाजिक सुधार का अर्थ यह भी नहीं होना चाहिए कि कोई बाहरी संगठन समाज की प्रत्येक परंपरा पर अपना एकाधिकार स्थापित कर ले। सुधार का आधार संवाद, मानवीय गरिमा, संवैधानिक अधिकार और सामाजिक अनुभव होना चाहिए। जहाँ परंपरा के नाम पर भेदभाव होता है, वहाँ सुधार आवश्यक है और जहाँ किसी समुदाय की वैध धार्मिक स्वतंत्रता है, वहाँ उसका सम्मान भी उतना ही आवश्यक है। सामाजिक न्याय और धार्मिक स्वायत्तता को परस्पर विरोधी मानने के बजाय उनके बीच संतुलन स्थापित करना ही विवेकपूर्ण मार्ग है।
विश्व हिंदू परिषद की स्थापना 1964 में हुई और उसके विकास में संतों, धार्मिक नेतृत्व तथा संगठनात्मक कार्यकर्ताओं के बीच संपर्क और समन्वय की भूमिका महत्वपूर्ण रही। इस संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि संतों का आध्यात्मिक मार्गदर्शन और किसी संगठन का प्रशासनिक समन्वय दो अलग-अलग कार्य हैं। संत अपने आध्यात्मिक अनुभव, शास्त्रीय अध्ययन और परंपरागत ज्ञान के आधार पर मार्गदर्शन देते हैं, जबकि संगठन सामाजिक कार्यक्रमों, संवाद और सामूहिक गतिविधियों की व्यवस्था कर सकते हैं। समन्वय करने वाली संस्था को मार्गदर्शन देने वाले सभी आचार्यों से ऊपर स्वयं को स्थापित नहीं करना चाहिए। यदि किसी धार्मिक संगठन का उद्देश्य समाज में सद्भाव और सांस्कृतिक चेतना का विकास करना है, तो उसे विभिन्न परंपराओं के बीच संवाद को प्रोत्साहित करना चाहिए और अपने संगठनात्मक विचारों को संपूर्ण धर्म की अनिवार्य व्याख्या के रूप में प्रस्तुत करने से बचना चाहिए। इसी के साथ संत-समाज की भी जिम्मेदारी है कि वह केवल विरोध तक सीमित न रहे, बल्कि शिक्षा, संस्कृत एवं भारतीय भाषाओं के अध्ययन, धार्मिक संपत्तियों के पारदर्शी प्रबंधन, मंदिरों के संरक्षण और नई पीढ़ी के प्रशिक्षण के लिए ठोस संस्थागत प्रयास करे।
भारत में आधुनिक शिक्षा के विकास के साथ भारतीय ज्ञान-परंपरा और पश्चिमी शिक्षा के संबंधों पर लंबे समय से बहस होती रही है। औपनिवेशिक शासन ने शिक्षा की भाषा, प्रशासनिक प्रशिक्षण और ज्ञान की प्राथमिकताओं में महत्वपूर्ण परिवर्तन किए। स्वतंत्रता के बाद भी भारतीय दर्शन, न्याय, मीमांसा, व्याकरण, आयुर्वेद, गणित, खगोलशास्त्र, धर्मशास्त्र और पारंपरिक राज्यचिंतन के अध्ययन को आधुनिक विज्ञान तथा समकालीन सामाजिक आवश्यकताओं के साथ किस प्रकार जोड़ा जाए, यह एक बड़ी चुनौती बनी रही। संघ तथा उससे जुड़े संगठनों ने शिक्षा के क्षेत्र में विभिन्न संस्थाएँ विकसित की हैं, इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि इस दिशा में कोई कार्य ही नहीं हुआ। फिर भी यह प्रश्न अवश्य पूछा जाना चाहिए कि क्या भारतीय ज्ञान-परंपरा के गंभीर और स्वतंत्र अध्ययन के लिए पर्याप्त संस्थागत व्यवस्था विकसित हुई है? भारतीय ज्ञान का पुनरुत्थान केवल अतीत के गौरव का वर्णन करने से संभव नहीं है। इसके लिए मूल ग्रंथों का अध्ययन, आलोचनात्मक शोध, भाषाई दक्षता, आधुनिक विज्ञान से संवाद और स्वतंत्र बौद्धिक संस्थाओं की आवश्यकता है। यदि कोई संगठन भारतीय विचार की रक्षा करना चाहता है, तो उसे ऐसे विद्या-केंद्रों को प्रोत्साहित करना चाहिए जो उसके अपने विचारों की भी स्वतंत्र समीक्षा कर सकें। जिस ज्ञान-व्यवस्था में प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता नहीं होगी, वह अंततः प्रचार तक सीमित हो सकती है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय राजनीति के संबंधों को समझने के लिए भारतीय जनसंघ तथा भारतीय जनता पार्टी की यात्रा का अध्ययन भी आवश्यक है। भारतीय जनसंघ की स्थापना 1951 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में हुई और संघ से जुड़े अनेक कार्यकर्ताओं ने उसके संगठनात्मक विकास में भूमिका निभाई। जनसंघ ने सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय एकता और अपनी राजनीतिक दृष्टि के आधार पर कांग्रेस के विकल्प के रूप में स्थान बनाने का प्रयास किया। 1977 में आपातकाल के बाद विभिन्न विपक्षी दलों के एकीकरण से जनता पार्टी बनी, जिसमें जनसंघ के नेता भी शामिल हुए। जनता पार्टी के विघटन के बाद 1980 में भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई। भाजपा ने अपने शुरुआती दौर में गांधीवादी समाजवाद को भी अपने राजनीतिक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया। बाद के वर्षों में उसकी राजनीति में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, आर्थिक नीतियों, राष्ट्रीय सुरक्षा और विकास संबंधी मुद्दों का अलग-अलग अनुपात में समावेश हुआ। इस यात्रा में संगठनात्मक आवश्यकताएँ, चुनावी रणनीतियाँ, सामाजिक गठबंधन, आर्थिक नीतियाँ और नेतृत्व के निर्णय सभी शामिल रहे। यह कहना कि भाजपा के सभी नेता मूलतः समाजवादी हैं अथवा हिंदुत्व उनके लिए केवल राजनीतिक समर्थन जुटाने की तकनीक है, एक वैचारिक आलोचना हो सकती है, लेकिन इसे सभी नेताओं की आंतरिक मंशा का प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। फिर भी यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि व्यापक राजनीतिक सफलता प्राप्त करने के बाद कोई दल अपनी मूल वैचारिक प्रतिबद्धताओं और शासन की व्यावहारिक आवश्यकताओं के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित करता है। क्या चुनावी राजनीति धीरे-धीरे विचारधारा को सत्ता प्राप्त करने की रणनीति में बदल देती है? क्या राजनीतिक दल अपने मूल सामाजिक उद्देश्यों को बनाए रख पाते हैं? इन प्रश्नों का उत्तर नारों से नहीं, बल्कि नीतियों, कानूनों, संस्थागत व्यवहार और सामाजिक परिणामों के अध्ययन से मिलेगा।
समाजवाद और पूँजीवाद की अवधारणाओं पर विचार करते समय भी सावधानी आवश्यक है। समाजवाद की अनेक धाराएँ रही हैं। कुछ सार्वजनिक स्वामित्व पर बल देती हैं, कुछ सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी राज्य को महत्व देती हैं, जबकि लोकतांत्रिक समाजवाद राजनीतिक स्वतंत्रता और सामाजिक समानता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। इसी प्रकार पूँजीवाद भी अनेक रूपों में विकसित हुआ है। उदार बाजार व्यवस्था, नियमनयुक्त अर्थव्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा के साथ चलने वाली मिश्रित अर्थव्यवस्थाएँ एक जैसी नहीं हैं। भारत ने स्वतंत्रता के बाद मिश्रित अर्थव्यवस्था का मॉडल अपनाया और 1991 के आर्थिक सुधारों के बाद बाजार तथा निजी निवेश की भूमिका का विस्तार हुआ, जबकि राज्य की जिम्मेदारियाँ अनेक क्षेत्रों में बनी रहीं। इसलिए समाजवाद का एकमात्र अर्थ शासक दल द्वारा समाज के सभी संसाधनों पर नियंत्रण स्थापित करना नहीं है। हालांकि इतिहास में ऐसी व्यवस्थाएँ अवश्य रही हैं, जहाँ समाजवाद के नाम पर राज्य की शक्ति अत्यधिक केंद्रीकृत हो गई और नागरिक स्वतंत्रताएँ सीमित हुईं। भारत के संदर्भ में महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या राज्य की शक्ति का विस्तार नागरिकों की स्वतंत्रता और सामाजिक संस्थाओं की स्वायत्तता को प्रभावित कर रहा है? यदि कोई सरकार शिक्षा, धर्म, अर्थव्यवस्था, मीडिया और सार्वजनिक विमर्श पर अत्यधिक नियंत्रण स्थापित करने लगे, तो उसके प्रभावों की समीक्षा आवश्यक है। लेकिन यह समीक्षा ठोस नीतियों, कानूनी प्रावधानों, न्यायिक निर्णयों और प्रमाणित घटनाओं के आधार पर होनी चाहिए, न कि केवल किसी राजनीतिक दल के वैचारिक नाम के आधार पर।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने राष्ट्रीय राजनीति में व्यापक प्रभाव स्थापित किया है। उनके समर्थक इसे निर्णायक नेतृत्व, राष्ट्रीय गौरव, विकास और प्रशासनिक क्षमता के रूप में देखते हैं, जबकि आलोचक सत्ता के केंद्रीकरण, संस्थागत स्वतंत्रता, असहमति के प्रति दृष्टिकोण और सामाजिक ध्रुवीकरण को लेकर प्रश्न उठाते हैं। लोकतंत्र में किसी भी सरकार का मूल्यांकन केवल उसके समर्थकों अथवा विरोधियों के कथनों से नहीं किया जा सकता। इसके लिए संसद, न्यायपालिका, निर्वाचन व्यवस्था, संघीय ढाँचे, मीडिया, नागरिक अधिकारों और प्रशासनिक संस्थाओं के कामकाज का परीक्षण आवश्यक है। संघ और भाजपा के संबंधों को लेकर भी यही कसौटी लागू होनी चाहिए। क्या संघ सरकार की नीतियों को प्रभावित करता है? किन विषयों पर दोनों के बीच सहमति अथवा मतभेद दिखाई देते हैं? क्या सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन राजनीतिक सत्ता से पर्याप्त वैचारिक स्वतंत्रता बनाए रखते हैं? क्या राजनीतिक सत्ता संगठन की प्राथमिकताओं को प्रभावित करती है? इन प्रश्नों पर तथ्यपूर्ण चर्चा होनी चाहिए। किसी व्यक्ति की क्षमता अथवा मंशा के बारे में बिना ठोस प्रमाण के निर्णय देना उचित नहीं है। इसके स्थान पर अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि संघ और भाजपा के संबंधों में वैचारिक स्वतंत्रता, संगठनात्मक स्वायत्तता और राजनीतिक उत्तरदायित्व की वास्तविक स्थिति क्या है।
इस पूरे विमर्श का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष धर्म और राज्य के संबंध का है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने के अधिकार से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को निर्धारित संवैधानिक सीमाओं के अधीन अपने धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार देता है। ये अधिकार असीमित नहीं हैं। सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और अन्य संवैधानिक प्रावधानों के अधीन उनकी सीमाएँ निर्धारित होती हैं। राज्य सामाजिक सुधार तथा धार्मिक संस्थाओं से जुड़े कुछ लौकिक और प्रशासनिक विषयों में कानून बना सकता है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि राज्य का धर्म से संबंधित किसी भी विषय में कोई अधिकार नहीं है। लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि राज्य अपनी कानूनी शक्तियों को धार्मिक जीवन पर अनावश्यक नियंत्रण स्थापित करने का माध्यम न बनाए। मंदिरों की संपत्ति, प्रशासनिक पारदर्शिता, सार्वजनिक धन, सामाजिक भेदभाव और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े प्रश्नों पर कानून की भूमिका हो सकती है, परंतु किसी विशिष्ट धार्मिक परंपरा की पूजा-पद्धति, आध्यात्मिक व्याख्या अथवा आचार्य-परंपरा में हस्तक्षेप करते समय संवैधानिक सीमाओं और धार्मिक स्वतंत्रता का गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए। एक ओर राज्य को धर्म के प्रत्येक पक्ष का अंतिम निर्णायक बना देना अनुचित होगा, तो दूसरी ओर धार्मिक संस्थाओं को कानून और नागरिक अधिकारों से पूरी तरह ऊपर मान लेना भी उचित नहीं है। भारतीय व्यवस्था का उद्देश्य इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करना होना चाहिए।
सनातन धर्म की परंपरा में संतों और आचार्यों का महत्व उनके आध्यात्मिक अनुभव, ज्ञान, चरित्र, साधना और परंपरागत योगदान से बनता है। राजनीतिक शक्ति और आध्यात्मिक प्रतिष्ठा के बीच अंतर बनाए रखना आवश्यक है। किसी राजनीतिक नेता के पास प्रशासनिक अधिकार हो सकते हैं, लेकिन उससे स्वतः आध्यात्मिक प्रामाणिकता प्राप्त नहीं होती। इसी प्रकार किसी आचार्य की आध्यात्मिक प्रतिष्ठा का अर्थ यह भी नहीं कि उन्हें राज्य के सभी नागरिकों पर कानूनी अधिकार प्राप्त हो जाता है। संतों और आचार्यों की स्वायत्तता की रक्षा का अर्थ उनके धार्मिक मार्गदर्शन, संस्थागत स्वतंत्रता और वैध परंपरागत अधिकारों का सम्मान करना है। इसके साथ ही उनके संस्थानों में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और कानून के पालन की व्यवस्था भी आवश्यक है। यदि संत-समाज केवल इस बात पर बल देता रहे कि राज्य को धर्म में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, लेकिन शिक्षा, सामाजिक सेवा, धार्मिक संपत्तियों के प्रबंधन और युवा पीढ़ी के प्रशिक्षण के लिए पर्याप्त संस्थाएँ विकसित न करे, तो उसकी सामाजिक भूमिका सीमित रह जाएगी। आवश्यक है कि धार्मिक नेतृत्व अपनी आध्यात्मिक प्रतिष्ठा को संस्थागत क्षमता में भी परिवर्तित करे। इसके लिए संस्कृत और भारतीय भाषाओं के अध्ययन केंद्र, शास्त्रार्थ मंच, शोध संस्थान, धर्म और संविधान पर अध्ययन कार्यक्रम, पारदर्शी मंदिर प्रबंधन मॉडल तथा सामाजिक सेवा संस्थाओं की स्थापना की जा सकती है।
किसी भी व्यवस्था की आलोचना करना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन उसके स्थान पर अधिक न्यायपूर्ण, स्वतंत्र और प्रभावी व्यवस्था का निर्माण करना कठिन कार्य है। यदि किसी संगठन की नीतियों से असहमति है, तो केवल उसके विरुद्ध नारे लगाना पर्याप्त नहीं होगा। यदि किसी सरकार की शक्ति के केंद्रीकरण पर आपत्ति है, तो यह स्पष्ट करना होगा कि शक्तियों का संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जा सकता है। यदि भारतीय ज्ञान-परंपरा की उपेक्षा की चिंता है, तो उसके लिए विद्यालय, विश्वविद्यालय, शोध संस्थान, प्रकाशन, छात्रवृत्ति और प्रशिक्षण कार्यक्रम विकसित करने होंगे। यदि संतों की स्वायत्तता की रक्षा करनी है, तो धार्मिक संस्थाओं के प्रशासन, कानूनी अधिकारों और राज्य के साथ संबंधों पर ठोस नीतिगत प्रस्ताव तैयार करने होंगे। यदि हिंदू समाज की एकता का उद्देश्य जातिगत भेदभाव समाप्त करना और परस्पर सम्मान बढ़ाना है, तो उसके लिए सामाजिक कार्यक्रमों, शिक्षा और समान अवसरों की व्यवस्था करनी होगी। यदि राजनीतिक सत्ता के केंद्रीकरण का विरोध करना है, तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता, स्थानीय स्वशासन, संघीय व्यवस्था, स्वतंत्र मीडिया और नागरिक अधिकारों को मजबूत करने के उपाय प्रस्तुत करने होंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वैकल्पिक व्यवस्था किसी एक व्यक्ति, एक संप्रदाय अथवा एक राजनीतिक समूह के पूर्ण नियंत्रण पर आधारित नहीं होनी चाहिए। भारतीय परंपरा की विविधता को ध्यान में रखते हुए ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है, जिसमें अलग-अलग विचारधाराएँ, धार्मिक परंपराएँ और सामाजिक संस्थाएँ अपने वैध क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से काम कर सकें तथा सार्वजनिक हित के प्रश्नों पर संवाद कर सकें।
आज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामने भी आत्ममंथन का प्रश्न है कि बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में उसकी मूल सामाजिक भूमिका क्या होनी चाहिए। क्या उसका प्रमुख कार्य समाज में आत्मीयता, अनुशासन, सेवा और राष्ट्रीय चेतना को प्रोत्साहित करना है? क्या उसे राजनीतिक सत्ता से पर्याप्त वैचारिक दूरी बनाए रखते हुए समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद का माध्यम बनना चाहिए? क्या वह अपने प्रभाव का उपयोग स्वतंत्र ज्ञान-केंद्रों, सामाजिक सुधार और नागरिक उत्तरदायित्व को मजबूत करने में कर सकता है? ये प्रश्न संघ के विरोध के लिए नहीं, बल्कि किसी भी प्रभावशाली संगठन की आत्मसमीक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। यदि कोई संगठन स्वयं को समाज की सेवा के लिए समर्पित मानता है, तो उसे समाज की विविधता का सम्मान करना चाहिए। उसे आलोचना को शत्रुता नहीं समझना चाहिए और न ही अपनी संगठनात्मक सफलता को समाज पर अंतिम अधिकार का प्रमाण मानना चाहिए। इसी प्रकार संघ की आलोचना करने वालों को भी उसके सामाजिक कार्यों, ऐतिहासिक योगदान और समर्थकों की वास्तविक प्रेरणाओं का निष्पक्ष मूल्यांकन करना चाहिए। विचारों का संघर्ष तभी उपयोगी होता है, जब उसका उद्देश्य सत्य की खोज और बेहतर व्यवस्था का निर्माण हो। यदि आलोचना केवल घृणा पैदा करे और समर्थन केवल प्रश्न पूछने से रोके, तो दोनों ही समाज को कमजोर करते हैं।
अंततः सनातन समाज के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कौन-सा संगठन सबसे शक्तिशाली है, कौन-सा राजनीतिक दल सबसे लोकप्रिय है अथवा किस विचारधारा का प्रभाव सबसे व्यापक है। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारतीय समाज अपनी विविध परंपराओं, स्वतंत्र विचार और सामाजिक संस्थाओं की स्वायत्तता को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक लोकतंत्र में आगे बढ़ सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ऐतिहासिक यात्रा, जनसंघ और भाजपा का राजनीतिक विकास तथा वर्तमान शासन की नीतियाँ इस प्रश्न के अलग-अलग पक्ष हैं। इनके बीच संबंध अवश्य हैं, लेकिन इन्हें एक ही सूत्र में बाँधकर सभी घटनाओं और व्यक्तियों की मंशा के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। सनातन धर्म की परंपरा हमें यह समझने का अवसर देती है कि सत्य की खोज अनेक मार्गों से हो सकती है और मतभेद का अस्तित्व आवश्यक रूप से शत्रुता का प्रमाण नहीं है। समाज की एकता का अर्थ विचारों की एकरूपता भी नहीं है। इसलिए संतों, आचार्यों, सामाजिक संगठनों और राजनीतिक नेतृत्व के सामने यह जिम्मेदारी है कि वे अपनी-अपनी मर्यादाओं को पहचानें। राजनीतिक सत्ता नागरिक अधिकारों और धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करे, धार्मिक संस्थाएँ अपने वैध क्षेत्र में स्वायत्त रहते हुए सामाजिक उत्तरदायित्व निभाएँ और सामाजिक संगठन समाज को जोड़ने का कार्य करें, न कि उसे अपने विचारों के अधीन करने का प्रयास करें।
सनातन समाज को केवल विरोध की भाषा नहीं, बल्कि निर्माण की भाषा भी विकसित करनी होगी। उसे ऐसे स्वतंत्र विद्या-केंद्र, सामाजिक संस्थान और वैचारिक मंच बनाने होंगे जो किसी राजनीतिक दल, संगठन अथवा एकल संप्रदाय के पूर्ण नियंत्रण से मुक्त रहकर कार्य कर सकें। किसी संगठन की निंदा कर देना परिवर्तन नहीं है। परिवर्तन तब होगा, जब समाज अपनी बौद्धिक क्षमता, नैतिक शक्ति और संस्थागत स्वायत्तता को विकसित करेगा। हिंदू समाज की एकता का वास्तविक अर्थ किसी एक केंद्र के अधीन होना नहीं, बल्कि विविध परंपराओं के बीच आत्मीयता, न्याय और पारस्परिक सम्मान स्थापित करना है। राज्य की शक्ति का उद्देश्य नागरिकों की स्वतंत्रता की रक्षा करना होना चाहिए, उनके विवेक को अपने नियंत्रण में लेना नहीं। धर्म का उद्देश्य मनुष्य को सत्य, करुणा और आत्मानुशासन की दिशा में प्रेरित करना होना चाहिए, राजनीतिक प्रभुत्व का साधन बनना नहीं। यदि भारत को अपनी सभ्यतागत शक्ति को आधुनिक लोकतंत्र के साथ समन्वित करना है, तो उसे न अंधानुकरण करना होगा और न अंधविरोध। उसे अध्ययन करना होगा, प्रश्न पूछने होंगे, संस्थाएँ बनानी होंगी और अपनी परंपराओं के भीतर से विवेकपूर्ण समाधान विकसित करने होंगे। यही संतों की जिज्ञासा का सार्थक समाधान हो सकता है और यही सनातन समाज के स्वतंत्र, सशक्त तथा उत्तरदायी भविष्य की दिशा भी। -डॉ. राकेश दत्त मिश्र
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