माता दुर्गा
अरुण दिव्यांशहोत प्रात पूर्व व्योम मंडल में ,
वायु मार्ग कुछ विचरते देखा ।
गज सवार माॅं आदिशक्ति को ,
माॅं धरणी पे ही उतरते देखा ।।
जन जन के जगने से पहले ,
घर घर में प्रवेश करते देखा ।
बढ़ी घर घर की ये रौनकता ,
माॅं मुखारबिंद चमके देखा ।।
निशा आई जब नींद नशा में ,
मातृ स्वरूप पिघलते देखा ।
निशा नींद नशा ये नाश हुई ,
नव स्वरूप निखरते देखा ।।
नवरात्रि नवदुर्गा स्वरूप को ,
नित्य नव रात्रि बनाते देखा ।
नवरात्रि नौ रात्रि नव रात्रि में ,
नव स्वरूप अपनाते देखा ।।
शैलपुत्री ब्रह्मचारिणी चंद्रघंटा ,
कुष्मांडा स्कंदमाता का धाम ।
कात्यायनी और ये कालरात्रि ,
महागौरी सिद्धिदात्री प्रणाम ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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