राजनीति और असभ्य भाषा का प्रयोग

राजनीति और असभ्य भाषा का प्रयोग

जय प्रकाश कुवंर
भारतवर्ष में आज कल जो,
राजनीतिक लड़ाईयां लड़ी जा रहीं हैं।
उसकी पटकथा देश हित ध्यान में रख कर नहीं,
व्यक्ति और पार्टी के लिए गढ़ी जा रहीं हैं।।
गद्दी में बैठे हुए व्यक्ति के लिए,
हर विरोधी को मलाल है।
कैसे उसे गद्दी से उतार फेंका जाए,
हरेक के जेहन में बस एक ही ख्याल है।।
उसका हर काम अब बुरा लगता है,
विरोधियों के भाषा में वह जनता को ठगता है।
विरोध की भाषा हर हद पार गयी है,
भारत जैसे सभ्य देश में,
यह सब असभ्य भाषा अच्छा नहीं लगता है।।
दलित और पिछड़ा शब्द लड़ने का,
एक अचूक रामबाण बन गया है।
हरेक अस्त्र फेल कर जाये तो,
इनके इस्तेमाल से लगता सब कुछ हल हो गया है।।
राज है तो राजनीति भी रहेगी,
पर इतनी ओछी राजनीति नहीं होनी चाहिए।
बुढ़े, जवान अगर ऐसा खेल खेल रहे हैं,
पर अगली पीढ़ी के लिए कुछ तो ख्याल होना चाहिए।।
ओछी राजनीति से देश कमजोर होगा,
गद्दी के लिए हम ऐसे बंटते रहे,
तो देश का कभी भी भला नहीं होगा।
इस सोने की चिड़िया पर,
हर ताकतवर देश का नजर लगा रहता है,
हमारे लड़ाई झगड़े और फुट से,
हमारे दुश्मनों को ही लाभ होगा।।
जय प्रकाश कुवंर
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